जगत को िदया ‘एक नाम सतनाम’ का संदेश

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  • अशोक प्रवृद्ध
    दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्म व समाज सुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबन्धु आदि गुणों से समाहित दिव्य व्यक्तित्व के स्वामी सिख धर्म के संस्थापक व सिखों के प्रथम गुरु गुरु नानकदेव (कार्तिक पूर्णिमा, विक्रम संवत 1527 तदनुसार 1469 ईस्वी – आश्विन कृष्ण 10, संवत 1597 तदनुसार 22 सितम्बर 1539) का जन्म पंजाब प्रान्त में रावी नदी के किनारे स्थित लाहौर जिले के तलवण्डी (वर्तमान पाकिस्तान) नामक स्थान में कार्तिक पूर्णिमा, विक्रम संवत 1527 तदनुसार 1469 को एक खत्री (क्षत्रिय) कुल में हुआ था। कुछ विद्वान इनकी जन्मतिथि 15 अप्रैल, 1469 मानते हैं। किन्तु अधिकांश विद्वान कार्तिक पूर्णिमा को ही नानक का जन्म दिन मानते हैं, और यही तिथि प्रचलित भी है। इन्हें नानक, नानक देव जी, बाबा नानक और नानकशाह आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है। नानक को पंजाब और सिंध का पैगंबर कहा गया है। तलवण्डी में जन्मे नानक की अत्यंत प्रसिद्धि के कारण तलवण्डी का नाम नानक के नाम पर आगे चलकर ननकाना पड़ गया। बाल्यकाल से ही नानक में प्रखर बुद्धि के स्वामी होने के लक्षण तो दिखाई देने लगे थे, परन्तु किशोरावस्था में कदम रखते ही सांसारिक विषयों से वे उदासीन रहने लगे।
    विद्यालय छूटने के बाद इनका अधिकांश समय आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में ही व्यतीत होने लगा। नानक की इकलौती बहन का नाम नानकी था, जो उनसे पांच वर्ष बड़ी थीं। सन 1475 ईस्वी में नानकी की शादी हुई तो वह सुल्तानपुर चली गई। नानक अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे, और नानकी भी उन पर स्नेह, प्यार और दुलार लुटाती थी इसलिए नानक भी अपनी बहन के साथ सुल्तानपुर चले गए और अपना अधिकांश बचपन अपनी बड़ी बहन बेबे नानकी के साथ बिताया। नानक ने बहनोई जैराम के माध्यम से सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) के नवाब दौलतखान लोधी के यहाँ शाही भण्डार के देखरेख करने अर्थात मोदी की नौकरी प्रारम्भ की। नवाब युवा नानक से काफी प्रभावित थे। यहीं पर बाद में नानक को तेरा शब्द के माध्यम से अपने कर्तव्य, अपनी मंजिल का आभास हुआ था।
    नानक सुल्तानपुर में नित्य स्नान और ध्यान करने के लिए समीप की एक नदी में जाया करते थे। एक दिन वह वहाँ गये और अपने सखा मर्दाना के साथ नदी के किनारे बैठे थे तो अचानक उन्होंने नदी में डुबकी लगा दी और तीन दिनों तक लापता हो गए। सभी लोग उन्हें डूबा हुआ समझ रहे थे, लेकिन वे ईश्वर से साक्षात्कार कर तीन दिन बाद वापस लौटे तो वे एक असामान्य मनुष्य बनकर लौटे और एक ओंकार सतिनाम- नामक एक महान संदेश रुपी बीज इस जगत को दिया, जो आज एक बड़ा वटबृक्ष बन चुका है। इस घटना के उपरान्त 1507 ईस्वी में नानक अपने परिवार के देख -रेख का जिम्मा अपने श्वसुर को सौंपकर मरदाना, लहना, बाला और रामदास नामक चार साथियों को लेकर तीर्थयात्रा के लिए निकल पडे़। ये चारों ओर घूम- घूमकर उपदेश करने लगे। उन्होंने एक ओंकार सतनाम- इस ईश्वरीय संदेश को पूरी दुनिया में फैलाने के लिए उपमहाद्वीप में प्रमुख रूप से चार आध्यात्मिक यात्राएं कीं। नानक स्थान- स्थान पर घूमते, पंडितों और मुस्लिम पुजारियों के साथ विवाद करते रहे। उन्होंने गया, हरिद्वार और अन्य तीर्थ स्थलों के पंडों से वाद-विवाद किया। उन्होंने अपने जीवन के लगभग 24 वर्ष इन यात्राओं में बिताए और पैदल ही लगभग 28,000 किमी की यात्रा की।
    1521 तक इन्होंने भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य मुख्य स्थानों का भ्रमण किया। इन यात्राओं को पंजाबी में उदासियाँ कहा जाता है। उनके पुत्रों में से श्रीचन्द आगे चलकर उदासी सम्प्रदाय के प्रवर्तक हुए। गुरु नानक देव एक नए धर्म सिख धर्म का स्थापना कर धर्म संस्थापक व सिखों के पहले गुरु बने। अपनी शिक्षाओं के माध्यम से उन्होंने नए धर्म यानी सिख धर्म के तीन स्तंभों – नाम जपना, किरत करणी और वन्द चकना की स्थापना की। उनकी शिक्षाएं व भक्ति का तरीका दूसरों से अलग होने के कारण सभी धर्मों के लोग उनका और उनकी शिक्षाओं का सम्मान करते हैं।

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