रोंगटे खड़े करती है आपातकाल की याद

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मुगलों के शासन में धार्मिक आधार पर प्रताड़ना और अंग्रेजों के शासन में शोषण को भूलकर भारत के लोगों को ढ़ाई दशक तक लोकतंत्र का जश्न मना लेने के बाद प्रताड़ना की पराकाष्ठा देखने को मिली। इसे यादकर आज भी लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। नई पीढ़ी को तो विश्वास ही नहीं होता है कि स्वतंत्र भारत में ऐसा हुआ होगा। लेकिन, यह सच्चाई है कि स्वतंत्र भारत में 1975 से 1977 तक जनता को सत्ता की ऐसी मदांधता झेलनी पड़ी थी कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय लिखा गया। 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक की 21 महीने की अवधि, स्वतंत्र भारत के इतिहास के लिए यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल था। इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को जेल में डालना, अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदी, प्रेस को प्रतिबंधित करना लोकतंत्र के लिए सबसे शर्मनाक अवधि थी। संपूर्ण क्रांति के नायक लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने इसे ‘भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि’ की संज्ञा दी थी।
तत्कालीन कांग्रेसी सरकार के अलोकतांत्रिक गतिविधियों का विरोध करने के लिए राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं उसके अनुषांगिक संगठनों को प्रतिबंधित कर उसके स्वयंसेवकों को जो यातनाएं दी गई, उसे याद कर लोग आज भी अचंभित होते हैं। आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए आगे आए जनसंघ को सबसे अधिक यातनाएं झेलनी पड़ी। इसके एक लाख से अधिक सदस्यों को गिफ्तार कर लिया गया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर दमनात्मक कार्यवाही के पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि इसका बड़ा संगठनात्मक आधार सरकार के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन करने की शक्ति रखता था। इसलिए पुलिस इस संगठन पर टूट पड़ी थी। उसके हजारों कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघचालक श्री बाला साहेब देवरस को पूना के यरवदा जेल में बंद रखा गया। संघ ने भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रतिबंध को चुनौती दी। लाखों स्वयंसेवकों ने प्रतिबंध के खिलाफ और मौलिक अधिकारों के हनन के खिलाफ शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन में भाग लिया। उदाहरण के तौर पर बुन्देलखंड क्षेत्र में संघ के प्रथम पीढ़ी के स्वयं सेवक, शिक्षाविद और समाजसेवी पं. गणेश प्रसाद मिश्र दद्दा जी के खिलाफ दो-दो प्रदेश से गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ था। इस दौरान उन्हें डेढ़ साल तक भूमिगत रहना पड़ा। केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार की तानाशाही ऐसी थी कि सभी विपक्षी दलों के नेताओं और सरकार के आलोचकों के गिरफ्तार करने और सलाखों के पीछे भेजने के बाद पूरा देश अचंभित होने की स्थिति में आ गया था। लोकनायक जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, नानाजी देशमुख, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष बाल आपटे, अरुण जेटली समेत विपक्ष के तमाम नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। देश के हर क्षेत्र में यह तांडव चला। इस तरह देश के सभी राज्यों में केंद्र सरकार की तानाशाही के खिलाफ आंदोलन मुखर होता गया। राज्य की विधानसभाओं से विपक्षी विधायकों ने इस्तीफा देना शुरू किया।
वर्ष 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की जीत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनके प्रतिद्वंद्वी राजनारायण द्वारा दी गई चुनौती के बाद से देश में राजनीतिक उथल पुथल का दौर शुरू हुआ। याचिका में राजनारायण ने इंदिरा गांधी पर सरकारी मशीनरी और संसाधनों के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में माना कि इंदिरा गांधी ने सरकारी मशीनरी और संसाधनों का दुरुपयोग किया। इसलिए उनका सांसद चुना जाना अवैध माना। साथ ही अगले 6 साल तक कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। ऐसी स्थिति में इंदिरा गांधी के पास प्रधानमंत्री पद छोड़ने के आलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। अदालत ने नया प्रधानमंत्री चुनने के लिए कांग्रेस तीन हफ्तों का वक्त दिया था। इस समय देश में ‘इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया’ का माहौल बना दिया गया था। ऐसे माहौल में इंदिरा के होते किसी और को प्रधानमंत्री कैसे बनाया जा सकता था? साथ ही इंदिरा अपनी पूरी पार्टी में किसी पर भी विश्वास नहीं करती थीं।
कुछ ख़ास सिपहसलारों ने इंदिरा गांधी को समझाया कि यदि उन्होंने प्रधानमंत्री का पद किसी और को दिया तो फिर वह व्यक्ति इसे नहीं छोड़ेगा और पार्टी पर पकड़ ख़त्म हो जाएगी। इंदिरा गांधी ने तय किया कि वे इस्तीफा देने के बजाय तीन हफ़्तों की मिली मोहलत का फायदा उठाते हुए इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगी। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले पर पूर्ण रोक लगाने से इंकार कर दिया।
इसी बीच बिहार और गुजरात में कांग्रेस के खिलाफ छात्रों का आंदोलन उग्र हो रहा था। बिहार में इसका नेतृत्व लोकनायक जयप्रकाश नारायण कर रहे थे। इस आंदोलन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की सशक्त भागीदारी रही। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अगले दिन यानी 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण की रैली थी, जिसमें उन्होंने इंदिरा गांधी पर लोकतंत्र का गला घोंटने का आरोप लगाते हुए रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता के अंश “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” का नारा बुलंद किया था। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने विद्यार्थियों, सैनिकों और पुलिस वालों से अपील कि वे लोग इस दमनकारी निरंकुश सरकार के आदेशों को ना मानें, क्योंकि कोर्ट ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद से हटने को कहा है। इसी रैली के आधार पर इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाने का फैसला किया था। इंदिरा गांधी के खिलाफ पूरे देश में जन आक्रोश बढ़ रहा था। इसमें छात्र और संपूर्ण विपक्ष एकजुट हो गए थे। कोर्ट के आदेश ने इंदिरा गांधी की हालात को पंगु बना दिया था, क्योंकि इंदिरा गांधी अब संसद में वोट नहीं डाल सकती थी और उनको कांग्रेस पार्टी के किसी नेता पर भरोसा भी नहीं था।
इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने का सबसे बड़ा बहाना जयप्रकाश नारायण द्वारा दिया गया संपूर्ण क्रांति का था। छात्र संगठनों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने देशव्यापी आंदोलन छेड़ रखा था, जिसके कारण युवाशक्ति को जेलों में ठूंसकर अमानवीय यातनाएं दी गई। तत्कालीन छात्र संगठनों से जुड़े शिक्षकों एवं प्राध्यापकों को बेवजह मीसा कानून में बंद कर दिया गया। छात्रों ने स्वयं के कैरियर की परवाह न करते हुए जेल में रहकर राष्ट्रवाद की ज्वाला को प्रज्जवलित किए रखी। इंदिरा गांधी ने 26 जून 1975 की सुबह राष्ट्र के नाम अपने संदेश में कहा कि जिस तरह का माहौल देश में एक व्यक्ति अर्थात जयप्रकाश नारायण के द्वारा बनाया गया है, उसमें यह जरूरी हो गया है कि देश में आपातकाल लगाया जाए। इसके साथ ही भारतीय संविधान की धारा 352 के तहत आपातकाल की घोषणा तत्कालीन राष्ट्रपति ने की थी। आपातकाल लागू होने के साथ ही विरोध की लहर लगातार तेज हो गई। अंततः प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी। चुनाव में आपातकाल लागू करने का फ़ैसला जनता को नागबार लगा।

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