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बुंदेलखंड में हीरा एवं सिंचाई परियोजना में लाखों वृक्ष काटे जाने का मुद्दा (3): वृक्षारोपण के लिए बनाएं नई एजेंसी

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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पेड़ों की सालाना कीमत 74500 रुपए बताते हुए केंद्र सरकार को इनकी अहमियत का अहसास कराया है। ऐसे में केन-बेतवा लिंक परियोजना और बकस्वाहा हीरा परियोजना में बेशकीमती पेड़ों की सफल शिफ्टिंग का मॉडल पूरे देश के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

  • आशीष खरे


कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की किल्लत के कारण देश में पेड़ों की कटाई पर उपजी जागरूकता को किसी निर्णायक नतीजे पर पहुंचाना चाहिए। आगामी समय में देश में नई परियोजनाओं में लाखों-करोड़ों पेड़ों का कटना तय है, और यह भी तय सा ही है कि देश के विकास में उन परियोजनाओं की भूमिका इतनी अहम होती है, कि सरकारें समझौता करने की स्थिति में नहीं होती हैं।

आक्रोशित लोग अदालतों का दरवाजा खटखटाते हैं और फिर परियोजनाएं भी अटकती हैं। तो ऐसे में आवश्यक होगा कि हम देश की व्यवस्था इतनी दुरुस्त करें कि लोगों के मन में वृक्षारोपण को लेकर शंका न रहे, इस दिशा में नवाचार को तुरंत लागू करना चाहिए। बुंदेलखंड में इन दिनों बकस्वाहा हीरा परियोजना को लेकर विरोध हो रहा है। इस परियोजना के तहत लगभग 2.15 लाख पेड़ काटे जाना है। वहीं राज्य सरकार को हीरा निकाले जाने से 50 सालों में लगभग 77,500 करोड़ रुपए का राजस्व मिलने की उम्मीद है। बाद यहां खत्म नहीं होती है।

इसी क्षेत्र में प्रस्तावित केन-बेतवा लिंक परियोजना में 20-25 लाख पेड़ों की बलि चढऩा तय है। सरकार का तर्क है कि केन-बेतवा लिंक परियोजना बुंदेलखंड के किसानों के लिए जीवनदायी साबित होगी। इससे जहां 6 लाख हैक्टेयर के क्षेत्र में सिंचाई हो सकेगी, वहीं 102 मेगावाट बिजली का भी उत्पादन होगा। पन्ना जिले में ही एक अन्य रुंझ सिंचाई परियोजना के लिए लगभग 33 हजार पेड़ काट दिए गए हैं। ऐसे में उचित है कि ऐसे समाधान खोजे जाएं, जिनसे न तो जरूरी विकास रुके और न ही पेड़ों, पर्यावरण की क्षति हो।


वन विभाग ने विश्वास खोया, नई एजेंसी बने, नवाचार करें


देश में विभिन्न परियोजनाओं के लिए जब भी पेड़ों की बलि दी जाती है, तब इसका काफी विरोध होता है। सरकारी नीति के अनुसार उससे दोगुनी संख्या में वृक्षारोपण किया जाता है। लेकिन लोगों के मन में यह धारणा बनी हुई है कि यह राशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है और वास्तव में वृक्षारोपण नहीं किया जाता है, जिससे देश में जंगल खत्म होते जा रहे हैं। इन हालात को लेकर इस दिशा में नवाचार की जरूरत महसूस की जा रही है। टीकमगढ़ सांसद डॉ. वीरेंद्र कुमार ने हाल में एक पत्र प्रधानमंत्री को लिखा है, जिसमें देश में वृक्षारोपण के लिए प्रधानमंत्री सड़क योजना की तर्ज पर नई एजेंसी बनाए जाने की अनुरोध किया है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री सड़क योजना के देशभर में काफी सार्थक परिणाम सामने आए हैं। चूंकि देश में विभिन्न राज्यों में कार्यरत लोकनिर्माण विभाग बेहतर परिणाम नहीं दे रहे थे, तब केंद्रीयकृत एजेंसी की जरूरत देश को महसूस हुई और इस योजना पर अमल किया गया। इसी तरह देश में बड़ी परियोजनाओं से हो रही पर्यावरण की क्षति को काबू में करने के लिए वृक्षारोपण सहित सभी काम के लिए देश में नई एजेंसी का गठन किया जाए। जिस स्थान पर जंगल विकसित किया जाना है, वह इस एजेंसी को सौंप देना चाहिए और उनके पास एकसूत्रीय कार्यक्रम होना चाहिए। उन्होंने केन-बेतवा लिंक परियोजना के दौरान बेशकीमती पेड़ों की शिफ्टिंग कराने का सुझाव भी प्रधानमंत्री को दिया है। जिससे कि परियोजना पर्यावरण के जीरो नुकसान की मिसाल बन सके।

बकस्वाहा परियोजना में समाधान की संभावनाएं


बकस्वाहा की बंदर हीरा परियोजना के लिए दो लाख पेड़ों के कटने का दर्द हर कोई महसूस कर रहा है। इस जंगल में बाघ, तेंदुआ, भालू, चिंकारा, चौसिंघा सहित अनेक दुर्लभ वन्य प्राणियों का रहवास होने की कई बार पुष्टि हो चुकी है। ऐसे में अंडरग्राउंड माइनिंग के विकल्प पर भी विचार होना चाहिए। अगर यह संभव न भी हो तो दूसरे विकल्प पर विचार होना चाहिए। मसलन बकस्वाहा हीरा परियोजना की अत्री खदान का माइनिंग सर्किल लगभग 62.5 हैक्टेयर का बनता है। ऐसे में ओवरबर्डन और किंबरलाइट (जिससे हीरा निकलता है) को ट्रॉली सिस्टम के तहत वहां से सामान्य क्षेत्र में शिफ्ट कर वहां पर प्रोसेस करना चाहिए। इससे कम से कम 200 हैक्टेयर क जंगल का नुकसान बच सकता है।

जंगल में भूमि का उपयोग केवल माइनिंग के लिए ही करना चाहिए। अन्य कामों के लिए दूसरी जमीन का प्रयोग करना चाहिए। इस क्षेत्र में स्थापित अनेक सीमेंट प्लांट्स में खदान से निकले लाइम स्टोन (चूना पत्थर) को सीमेंट प्लांट तक ट्रॉलियों के माध्यम से पहुंचाया जा रहा है। निसंदेह इस प्रोसेस में परियोजना की लागत बढ़ जाएगी, किंतु बड़ी मात्रा में जंगल सुरक्षित बच जाएंगे। हालांकि छतरपुर के खनिज अधिकारी अमित मिश्रा कहते हैं कि अंडर ग्राउंड माइनिंग से प्रोजेक्ट की लागत कई गुना बढ़ जाएगी।

कोयला खदानों में अंडरग्राउंड माइनिंग होती है, लेकिन हीरा खदानों में व्यावहारिक रूप से यह संभव नहीं है। ओपन पिट माइनिंग से ही हीरा निकल सकता है। किंतु परियोजना के तहत बेशकीमती पेड़ों की शिफ्टिंग के बारे में विचार करना चाहिए। इसके साथ ही पेड़ों को हटाने की प्रक्रिया भी साल-दर-साल निर्धारित तरीके से करना चाहिए, ताकि दूसरी ओर बराबरी से जंगल खड़ा करने के प्रयास हो सकें।

पेड़ों के स्थानांतरण व वृक्षारोपण के मॉडल बनाना होंगे


सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पेड़ों की सालाना कीमत 74500 रुपए बताते हुए केंद्र सरकार को इनकी अहमियत का अहसास कराया है। ऐसे में केन-बेतवा लिंक परियोजना और बकस्वाहा हीरा परियोजना में बेशकीमती पेड़ों की सफल शिफ्टिंग का मॉडल पूरे देश के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इसी के साथ जिन पेड़ों का नुकसान हो रहा है, उनकी एवज में नए सफल वृक्षारोपण का मॉडल भी देश के सामने पेश किया जा सकता है, जिससे लोगों में सरकारी एजेंसीज के प्रति विश्वास पैदा हो सके।

ऐसा इसलिए भी संभव है क्योंकि जिस तरह दस साल पहले पन्ना टाइगर रिजर्व बाघ विहीन हो जाने के बाद पुन: आबाद हो गया है, वह सरकारों की इच्छाशक्ति को तो प्रदर्शित करता ही है। यानी सरकारें अगर पूर्ण इच्छाशक्ति के साथ काम करें, तो आम लोगों को विश्वास में लेकर आगे बढ़ा जा सकता है।

(लेखक बुंदेलखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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