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छतरपुर जिले में हीरों के लिए 2.15 लाख पेड़ों को काटे जाने का मुद्दा (1) :बकस्वाहा आंदोलन की ‘टूल किट’ में क्या है

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बकस्वाहा में बंदर डायमंड माइन्स के नाम से विख्यात हीरा परियोजना का विरोध एक बार फिर शुरू हो गया है। परियोजना का वर्ष 2007 से लेकर 2016 तक भी विरोध हुआ था और रियो टिंटो कंपनी को उल्टे पैर वापस होना पड़ा था। किंतु अब हीरा खदान की दोबारा निविदा होने के बाद कटने वाले पेड़ों की संख्या काफी कम होने के बावजूद लोग विरोध में खड़े हो रहे हैं

आशीष खरे

छतरपुर जिले के बकस्वाहा में बंदर डायमंड माइन्स के नाम से विख्यात हीरा परियोजना का विरोध एक बार फिर शुरू हो गया है। परियोजना का वर्ष 2007 से लेकर 2016 तक भी विरोध हुआ था और रियो टिंटो कंपनी को उल्टे पैर वापस होना पड़ा था। किंतु अब हीरा खदान की दोबारा निविदा होने के बाद कटने वाले पेड़ों की संख्या काफी कम होने के बावजूद लोग विरोध में खड़े हो रहे हैं। यह पर्यावरण के प्रति जागरूकता की दिशा में शुभ संकेत है। लेकिन कुछ चिंताएं भी हैं। मसलन इस अभियान में एक खास वर्ग एवं दल विशेष के राजनीतिक लोग शामिल हो गए हैं। बाहर के तमाम पर्यावरणवादी और आंदोलनजीवी इसे समर्थन देने के लिए आगे आ रहे हैं। सोशल मीडिया में ‘सेव बकस्वाहा फॉरेस्टÓ अभियान चल रहा है और बुंदेलखंड के दो कांग्रेस विधायक एवं एक सपा विधायक बंदर हीरा परियोजना के विरोध में पत्र लिख चुके हैं। ऐसे में चर्चा है कि कुछ राजनीतिकों का देश भर में ‘टूलकिटÓ के जरिये एक खास वातावरण बनाने का जो अभियान चल रहा है, वह इसे भी उसका हिस्सा बनाना चाहते हैं तो कुछ लोग इसे देशभर में चल रही मोदी सरकार विरोधी और कथित रूप से व्यवस्था विरोधी मुहिम का नया केंद्र बनाना चाहते हैं। इससे आंदोलन के दिशाभ्रमित होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। हमें यह समझना होगा कि देश में पेड़ों को बचाने की मुहिम कहीं भी चले, इसे राजनीति एवं गुटों से ऊपर उठकर चलाने पर ही इसे कामयाब बनाया जा सकता है।


कैसे नाम पड़ा बंदर डायमंड माइन्स

एंग्लो-आस्ट्रेलियन कंपनी रियो टिंटो ने 21वीं शताब्दी शुरु होते ही यानी वर्ष 2000 में मध्यप्रदेश में दस्तक दी। तब दिग्विजय सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। वर्ष 2002 में इसे बकस्वाहा क्षेत्र में हीरा खोजने के लिए 25 वर्ग किमी क्षेत्र में रिकनेसेंस सर्वेक्षण की अनुमति मिली। जो कंपनी रिकनेसेंस सर्वे करती है, उसे प्रोस्पेक्टिंग लाइसेंस (पूर्वेक्षण अनुमति) में वरीयता मिलती है।

जब कंपनी के अधिकारी यहां सर्वे करने आए तो उन्हें बड़ी संख्या में बंदर दिखे और उन्होंने परियोजना का नामकरण बंदर डायमंड प्रोजेक्ट कर दिया। इसके बाद वर्ष 2006 एवं 07 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने रियो टिंटो को तीन साल की अवधि के लिए दो प्रोस्पेक्टिंग लाइसेंस यानी पूर्वेक्षण अनुमति दी। जिसे बाद में दो साल के लिए बढ़ा दिया गया। वर्ष 2011 मेें पीएल की अवधि पूरी होने के बाद 2012 में रियो टिंटो ने माइनिंग लीज के लिए आवेदन दिया। कंपनी ने 954 हैक्टेयर के संरक्षित वन में खनिज पट्टे के लिए आवेदन किया। इससे पहले कंपनी ने वर्ष 2010 में खजुराहो में हुए वैश्विक निवेशक सम्मेलन में मप्र सरकार के साथ एक एमओयू पर हस्ताक्षर किए थे।


34 मिलियन कैरेट हीरों का भंडार

कंपनी ने 954 हैक्टेयर की माइनिंग लीज के लिए आवेदन करते हुए बताया कि यहां लगभग 34.3 मिलियन कैरेट (3.43 करोड़ कैरेट) हीरों का अनुमानित भंडार है। जिस पर नियम अनुसार मप्र सरकार को कंपनी 10त्न रायल्टी देगी। वन विभाग की जांच में सामने आया कि जिस क्षेत्र को कंपनी हीरा परियोजना के लिए मांग रही है, वहां 20 सेमी से अधिक व्यास के लगभग पांच लाख पेड़ है। इसके बाद क्षेत्र के पर्यावरणविद् और एनजीओ पहल के संचालक हरिकृष्ण द्विेदी, सेवानिवृत्त संयुक्त कलेक्टर बीएल मिश्रा, एडवोकेट बृजेश बिलथरे सहित अनेक लोगों ने हीरों के लिए इतनी बड़ी संख्या में पेड़ काटे जाने को गलत बताते हुए आंदोलन किया। इस संबंध में उच्च न्यायालय में याचिकाएं भी लगाईं व केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भी शिकायतें भेजी गईं। इनमें बताया गया कि कंपनी की मूल खदानों का कुल क्षेत्रफल महज 22.3 हैक्टेयर है।

इसके बावजूद 954 हैक्टेयर का जंगल काटा जाना उचित नहीं है। लोगों के तर्कपूर्ण विरोध के चलते पर्यावरणीय मंजूरी न मिलने के बाद कंपनी बैकफुट पर आ गई और वह 364 हैक्टेयर के पट्टे की मांग करने लगी। कंपनी ने तर्क दिया कि वह केवल सगोरिया गांव के अत्री ब्लॉक पर काम करेगी। वास्तव में सगोरिया के केवल इसी ब्लॉक में रियो टिंटो ने बड़ा होमवर्क किया था। बाकी ब्लॉक यानी अंगीरस, कृति एवं वशिष्ठ पर से उसने दावा वापस ले लिया। लेकिन इसके बाद भी सरकार द्वारा रियो टिंटो के आवेदनों को गंभीरता से नहीं लिए जाने के बाद कंपनी ने वर्ष 2017 में इस परियोजना से हाथ खींच लिए। उसने अपना प्रोसेसिंग प्लांट एवं पूरी संपत्ति राज्य सरकार को सुपुर्दगी में देकर विदा ले ली। बताया जाता है कि कंपनी ने 2020 कैरेट हीरे खनिज विभाग सौंपे।

विरोध- प्रदर्शन, कोर्ट-कचहरी के बाद पीछे हटी रियो टिंटो

रियो टिंटो के स्थानीय विरोध की कई वजहें थीं। कंपनी जो वादे करती थी, उन्हें निभाने से पीछे हट रही थी। जैसे वर्ष 2010 में हुए एमओयू में कंपनी ने स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर देने की बात कही, लेकिन बाद में राज्य सरकार को पत्र लिखकर कहा कि स्थानीय लोगों के दक्ष नहीं होने से शर्त का पालन करना संभव नहीं है। इसी तरह हीरा पर राज्य सरकार को मिलने वाली रायल्टी महज दस प्रतिशत थी और हीरा प्रोसेसिंग प्लांट की निगरानी में राज्य सरकार की भागीदारी नहीं थी। यह केवल विश्वास पर आधारित था। जिस स्थान पर कंपनी काम कर रही थी, वहां पेड़ों के अलावा तेंदुआ, भालू, चिंकारा, चौसिंघा सहित दर्जनों दुर्लभ वन्य प्राणियों का प्राकृतिक रहवास है।

उसी रास्ते से होते हुए पन्ना नेशनल पार्क के टाइगर नौरादेही वन अभयारण्य की ओर जाते हैं। बाघों के इस प्राकृतिक रास्ते को टाइगर कन्जर्वेशन पाथ घोषित करते हुए बजट भी जारी किया गया था। पन्ना टाइगर रिजर्व के बाघों को लगे रेडियो कॉलर की लोकेशन कई बार इसी इलाके में मिली। जिससे पता चलता है कि बाघों को भी यह इलाका भाता था। इन तथ्यों को लेकर स्थानीय पर्यावरणविदों ने खूब आवाज उठाई, लेकिन उन्हें देशभर के पर्यावरणविदों का साथ न मिल सका। फिर भी रियो टिंटो को बैकफुट पर धकेलकर कुछ समय के लिए ही सही, अपना जंगल बचाने में सफल हो गए थे। अब दोबारा नीलामी होने के बाद इन्हीं तथ्यों को लेकर एक बार फिर पर्यावरणविद चिंतित हैं।

कमलनाथ सरकार ने कराई नीलामी प्रक्रिया

वर्ष 2018 में सत्ता परिवर्तन के बाद कमलनाथ सरकार ने वर्ष 2019 के अंत में बंदर परियोजना की पुन: नीलामी कराई। नीलामी के नियम केंद्र सरकार ने पूरी पारदर्शिता से तय किए थे। अच्छी बात यह रही कि राज्य सरकार ने रियो टिंटो द्वारा आखिरी में किए गए 364 हैक्टेयर सहित कुल 382 हैक्टेयर क्षेत्रफल की ही नीलामी कराई। यानी सरकार 954 हैक्टेयर के मुद्दे से पीछे हट चुकी थी। लेकिन स्थानीय पर्यावरणविदों में इस बात का संदेह बना हुआ है कि बाकी क्षेत्र को लेकर राज्य सरकार की ओर से किसी प्रकार का आश्वासन नहीं दिया गया है। राज्य सरकार ने एक तरह से रियो टिंटो की पुरानी फाइल उठाते हुए उन्हीं के दस्तावेजों को आधार मानते हुए नीलामी कराई। राज्य सरकार ने इस खदान का आफॅसेट मूल्य 56 हजार करोड़ रुपए एवं बेस रायल्टी 11.50 प्रतिशत रखी थी।

बिड़ला समूह की कंपनी एस्सेल ने मारी बाजी

10 दिसंबर 2019 को हुई नीलामी में आदित्य बिड़ला समूह की कंपनी एस्सेल माइनिंग लिमिटेड ने अडानी समूह की कंपनी चेंदीपाड़ा कोलारी को पीछे छोड़कर बंदर डायमंड माइन्स को हासिल कर लिया। एनएमडीसी, रुंगटा समूह एवं वेंदाता ग्रुप भी इस बोली में शुरुआत में शामिल थे। बड़ी बात यह थी कि रियो टिंटो की तुलना में राज्य सरकार को इस बार चारगुना राजस्व मिल रहा था। रियो टिंटो जहां दस प्रतिशत रायल्टी दे रही थी, वहीं इस बार हुई नीलामी में 11.50 त्न रायल्टी के साथ राज्य सरकार को 30.05 प्रतिशत नीलामी प्रीमियम मिला। यानी हीरों की बिक्री राशि से राज्य सरकार को 41.55 प्रतिशत राशि मिलेगी। यानी कुल 50 साल की लीज अवधि में राज्य सरकार को हर साल 1550 करोड़ का राजस्व मिलने की उम्मीद है।

इस बार विरोध की वजह : कोरोनाकाल में ऑक्सीजन की किल्लत

राज्य सरकार ने भले ही बंदर परियोजना की नीलामी वर्ष 2019 में करा दी थी, लेकिन सवाल उठ रहा है कि इसका विरोध डेढ़ साल बाद क्यों शुरू हुआ है तो इसकी वजह भी हरिकृष्ण द्विेदी बताते हैं- कोरोनाकाल में ऑक्सीजन की किल्लत ने देश को झकझोर कर रख दिया तो बकस्वाहा में दो लाख से ज्यादा पेड़ काटे जाने की चिंता हुई। इसके लिए इस बार देशभर से लोग आगे आ रहे हैं तो यह शुभ संकेत है।

सुप्रीम कोर्ट ने जगाई उम्मीद

सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस शरद ए बोवड़े सहित तीन सदस्यीय बेंच ने इसी साल फरवरी में बंगाल में पांच रेलवे ओवरब्रिजों को बनाने के लिए 300 पेड़ों को काटे जाने को लेकर चिंता जताई। बेंच ने पिछले साल बनाई गई एक समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि एक पूर्ण विकसित यानी विरासत में मिले पुराने पेड़ की सालाना कीमत 74 हजार 500 रुपए हो सकती है। और हर साल बीतने पर उसकी कीमत में इतनी ही राशि जुड़ जाती है। यह पेड़ हर साल हमें 45 हजार रुपए की ऑक्सीजन देते हैं। आंदोलन से जुड़े सेवानिवृत्त संयुक्त कलेक्टर बीएल मिश्रा कहते हैं कि कोर्ट के यह चिंता जताने के बाद देश मे जागरुकता आई है कि क्षेत्र के लाखों पेड़ों की कीमत हीरों से ज्यादा है। तो फिर उन्हें नहीं काटा जाना चाहिए।

अफसरों के तर्क भी सुनना जरूरी है

वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस माइन्स में 2.15 लाख वृक्षों के होने की पुष्टि करते हैं। लेकिन कुछ प्रतिक्रिया देने से बचते नजर आते हैं। वहीं छतरपुर के खनिज निरीक्षक अजय मिश्रा कहते हैं कि यह पेड़ इक_े नहीं काटे जाएंगे। बल्कि आगामी 10-12 वर्षों में कटने की उम्मीद है। ऐसे में इस अवधि में राज्य सरकार की नीति के तहत नया जंगल विकसित किया जा सकता है। इस पर तत्परता से काम करने की जरूरत है। मिश्रा कहते हैं कि जो राजस्व मिलेगा, वह राज्य, जिले के विकास पर ही खर्च होगा। पहले की तुलना में इस परियोजना के स्वरूप में काफी परिवर्तन हुआ है। दोनों के बीच संतुलन बनाने का काम राज्य सरकार कर रही है।

बकस्वाहा में दो अलग-अलग मत

उधर बकस्वाहा की बात करें तो लगभग 15 गांव के लोग इस परियोजना से सीधे तौर पर प्रभावित होंगे, जो अपनी आजीविका चलाने के लिए इस जंगल पर निर्भर हैं। सरकार की योजना में इनकी मदद के लिए उपाय हैं। इस क्षेत्र के लोग सीधे दो हिस्सों में बंट गए हैं। जहां बड़ी संख्या में लोग पेड़ों को बेशकीमती बताते हुए इस परियोजना को गलत करार दे रहे हैं, वहीं कई लोग इस परियोजना के समर्थन में भी आ गए हैं। इन ग्रामीणों का कहना है कि हमें भी रोजगार चाहिए। आखिर हमारे मामले में बाहरी लोग क्यों हस्तक्षेप कर रहे हैं।

पेड़ों की चिंता राहत की बात, लेकिन सवाल भी अनेक

अच्छी बात यह है कि बकस्वाहा की हीरा परियोजना की इस बार की लड़ाई में बहुत लोग जुड़ गए हैं। लेकिन सवाल उठता है कि पिछली बार जब 954 हैक्टेयर के जंगल पर बन आई थी, तब ये लोग कहां गए थे और इस बार जब सरकार उसके 40 प्रतिशत हिस्से पर परियोजना संचालित कर रही है तो फिर विरोध की मात्रा क्यों बढ़ गई है।

केंद्र सरकार में लंबित है फाइल

फिलहाल बकस्वाहा की हीरा परियोजना की एस्सेल कंपनी की माइनिंग लीज को राज्य सरकार ने सैद्धांतिक सहमति दे दी है। उन्हें रियो टिंटो द्वारा छोड़ी गई संपत्ति भी सुपुर्दगी में दे दी गई है। कंपनी की फाइल पर्यावरणीय अनुमति के लिए केंद्र सरकार के पास विचाराधीन है। विरोध और समर्थन की इस लड़ाई में कंपनी को अगले वर्ष के अंत तक कार्य प्रारंभ करने की उम्मीद है। कंपनी यहां 2500 करोड़ रुपए की लागत से प्रोजेक्ट स्थापित करेगी। (अगले अंक में अनवरत..)
(लेखक बुंदेलखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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