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संख्याओं के जादूगर थे महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन

  • योगेश कुमार गोयल
    भारत के महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन ऐसे विश्वविख्यात गणितज्ञ थे, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों और विषय गणित की शाखाओं में अविस्मरणीय योगदान दिया और जिनके प्रयासों तथा योगदान ने गणित को एक नया अर्थ दिया। उनके द्वारा की गई खोज ‘रामानुजन थीटा’ तथा ‘रामानुजन प्राइम’ ने इस विषय पर आगे के शोध और विकास के लिए दुनियाभर के शोधकर्ताओं को प्रेरित किया। करीब एक दशक पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने चेन्नई में रामानुजन की 125वीं जयंती समारोह में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा था कि ऐसे प्रतिभावान तथा गूढ़ ज्ञान वाले पुरूषों और महिलाओं का जन्म कभी-कभार ही होता है। महान् गणितज्ञ रामानुजन की गणना आधुनिक भारत के उन व्यक्तित्वों में की जाती है, जिन्होंने विश्व में नए ज्ञान को पाने और खोजने की पहल की। गणित में अतुलनीय योगदान के लिए श्रीनिवास रामानुजन को के. रंगनाथ राव पुरस्कार भी दिया गया था। उनका गणित प्रेम इतना बढ़ गया था कि उन्होंने दूसरे विषयों पर ध्यान देना ही छोड़ दिया था। दूसरे विषयों की कक्षाओं में भी वे गणित के ही प्रश्नों को हल किया करते थे। नतीजा यह हुआ कि 11वीं कक्षा की परीक्षा में वे गणित के अलावा दूसरे सभी विषयों में अनुत्तीर्ण हो गए और इस कारण उन्हें मिलने वाली छात्रवृत्ति बंद हो गई। परिवार की आर्थिक हालत पहले ही ठीक नहीं थी, इसलिए परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी करने के लिए उन्होंने गणितज्ञ रामास्वामी अय्यर के सहयोग से मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क की नौकरी करनी शुरू की। नौकरी के दौरान भी वे समय मिलते ही खाली पन्नों पर गणित के प्रश्नों को हल करने लग जाया करते थे। एक दिन एक ब्रिटिश की नजर उनके द्वारा हल किए गए गणित के प्रश्नों पर पड़ी तो वह उनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुआ। उसी अंग्रेज के माध्यम से रामानुजन का सम्पर्क जाने-माने ब्रिटिश गणितज्ञ और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी एच हार्डी से हुआ। हार्डी ने उनकी विलक्षण प्रतिभा को भांपकर उन्हें अपनी प्रतिभा को साकार करने के लिए लंदन बुला लिया और उनके लिए कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में व्यवस्था की, जिसके बाद उनकी ख्याति दुनियाभर में फैल गई। जी. एस. हार्डी ने रामानुजन को यूलर, गोस, आर्किमिडीज, आईजैक न्यूटन जैसे दिग्गजों के समकक्ष श्रेणी में रखा था। 1917 में उन्हें ‘लंदन मैथेमेटिकल सोसायटी’ का सदस्य चुना गया और अगले ही वर्ष इंग्लैंड की प्रतिष्ठित संस्था ‘रॉयल सोसायटी’ ने उन्हें अपना फैलो बनाकर सम्मान दिया। रामानुजन ने करीब पांच साल कैम्ब्रिज में बिताए और उस दौरान गणित से संबंधित कई शोधपत्र लिखे।भारतीय गणित की महान् परम्परा के वाहक श्रीनिवास रामानुजन को ‘गणितज्ञों का गणितज्ञ’ और संख्या सिद्धांत पर अद्भुत कार्य के लिए ‘संख्याओं का जादूगर’ भी कहा जाता है, जिन्होंने खुद से गणित सीखा और जीवनभर में गणित के 3884 प्रमेयों (थ्योरम्स) का संकलन किया, जिनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किए जा चुके हैं। रामानुजन ने गणितीय विश्लेषण, अनंत श्रृंखला, संख्या सिद्धांत तथा निरंतर भिन्न अंशों के लिए आश्चर्यजनक योगदान दिया और अनेक समीकरण व सूत्र भी पेश किए। वे ऐसे विश्वविख्यात गणितज्ञ थे, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों और विषय गणित की शाखाओं में अविस्मरणीय योगदान दिया और जिनके प्रयासों तथा योगदान ने गणित को एक नया अर्थ दिया। उनके द्वारा की गई खोज ‘रामानुजन थीटा’ तथा ‘रामानुजन प्राइम’ ने इस विषय पर आगे के शोध और विकास के लिए दुनियाभर के शोधकर्ताओं को प्रेरित किया।

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