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सरकार ने एक और मोर्चा फतह किया कश्मीर में!

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  • नए दरवाजे खुलने से अब कश्मीरी पंडितों की वापसी का रास्ता भी खुलेगा

नए दरवाजे खुलने से अब कश्मीरी पंडितों की वापसी का रास्ता भी खुलेगा, जिस पर कुछ समय पूर्व, आरएसएस के सरकार्यवाह, दत्तात्रेय होसबाले ने भी प्रकाश डाला था। उन्होंने कहा था कि सरकार कश्मीरी पंडितों के घाटी में लौटने और शांतिपूर्ण जीवन बिताने के आयाम पर कार्य करे क्योंकि यह उनका वतन है और तीस साल एक लंबा समय हो चुका है कश्मीरी पण्डितों को हत्याओं, बलात्कारों और लूट-मार की आग झेल कर वहाँ से विस्थापित हुए।

  • फिरोज बख्त अहमद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते गुरुवार को जम्मू-कश्मीर के विभिन्न राजनीतिक दलों के 14 नेताओं के साथ बैठक की जिसने प्रमाणित कर दिया कि कश्मीर की बर्फ पिघल रही है। उन्होंने जम्मू कश्मीर के मुख्यधारा के राजनीतिक दलों मुख्यत: गुपकार गठबंधन (पीएजीडी) को चर्चा के लिए बुलाया था मोदी ने ”दिल्ली और दिल की दूरी को मिटाने की बात कही और परिसीमन की प्रक्रिया के बाद विधानसभा चुनाव कराने को प्राथमिकता बताया। अनुच्छेद-370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर और दिल्ली के बीच जमी बर्फ पिघलने से आगे की बातचीत के द्वार खोल दिए हैं, जिसे राजनीतिक पंडित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, अजित डोभाल के द्वारा फेंका गया तुरुप का पत्ता बता रहे हैं।

वही नेता जो प्रधानमंत्री के विरुद्ध 370 और 35ए हटाने के लिए वाही- तबाही बक रहे थे, उनकी एक आवाज़ पर दौड़े चले आए। विशेष दर्जा खत्म करने के बाद कश्मीरी नेताओं के साथ इस पहली बैठक में केंद्र ने इन नेताओं से बड़े अच्छे वातावर्ण में कश्मीर की चाय कहवा पर दिल खोलकर विचार विमर्श किया। दिल्ली दरबार की ओर से जम्मू-कश्मीर में परिसीमन के बाद जल्द विधानसभा चुनाव करवाने के भरोसे के बीच गुपकार गठबंधन भी परिसीमन प्रक्रिया में शामिल होने के लिए तैयार हो गया है। जिस प्रकार से किसी भी प्रकार की रणनीति में दक्ष माने जाने वाले मोदी के इन्सानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत वाली विचारधारा का जादू इन 14 कश्मीरी नेताओं के सर पर चढ़ कर बोला है, बड़े-बड़े कूटनीतिगयोन ने मोदी का लोहा माना है।

इस बैठक को लेकर पहले से न तो कोई एजेंडा तय किया गया था और न ही इसमें पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने को लेकर कोई सहमति बनी। कश्मीरी पंडितों के मुद्दे पर भी इसमें कोई निर्णय नहीं हुआ। इस बैठक के परिणाम सिर्फ ”अच्छे दिन आने की उम्मीद भर हैं क्योंकि विशेष दर्जा एवं राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग एवं पाबंदियां हटाने जैसे मुद्दों का समाधान निकाले बिना लोगों को मुख्यधारा में शामिल नहीं किया जा सकता।

जैसे ही मीटिंग प्रारम्भ हुई, प्रधानमंत्री मोदी ने यह साफ कर दोया कि इसकी अभिप्राय कश्मीर को प्रगति के मार्ग पर डालना है और केंद्र द्वारा इसकी मदद किए जाने का मक़सद वहाँ दो एम्स, आँय चिकित्सा केंद्र, क्रीड़ांगन, बहुत से स्कूल, विश्वविद्यालय, सड़कें, पुल, यातायात सुविधाएं आदि प्रदान करना है और भारत के पाक कबजाए कश्मीर द्वारा आतंकवाद पर पूर्ण विराम लगाना है। इसके लिए किसी ने ‘नÓ नहीं कहा। जिला विकास परिषदों के चुनाव के बाद अब विधानसभा के चुनाव होंगे।

निर्वाचन-क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के लिए जो आयोग बना है, उसकी पिछली बैठकों में कश्मीरी नेताओं ने भाग नहीं लिया था लेकिन अब गुपकार गठबंधन के नेता फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री के साथ किसी भी संवाद से कोई परहेज नहीं है। हालांकि उन्हें, उनके बेटे उमर अब्दुल्ला और पीडीएफ की नेता महबूबा मुफ्ती वगैरह को सरकार ने नजरबंद कर दिया था। ये सभी दल मिलकर धारा 370 और 35ए को खत्म करने का विरोध कर रहे थे और कश्मीर को मिले विशिष्ट राज्य के दर्जे को बहाल करने का आग्रह कर रहे थे। मगर शायद अब इस मीटिंग के बाद इनको समझ आ गया है कि वास्तव मेन मोदी का कश्मीर विजऩ उसकी सुरक्षा और विकास के लिए है और कश्मीर के अच्छे दिन भारत ही ला सकता है।

नए दरवाजे खुलने से अब कश्मीरी पंडितों की वापसी का रास्ता भी खुलेगा, जिस पर कुछ समय पूर्व, आरएसएस के सरकार्यवाह, दत्तात्रेय होसबाले ने भी प्रकाश डाला था। उन्होंने कहा था कि सरकार कश्मीरी पंडितों के घाटी में लौटने और शांतिपूर्ण जीवन बिताने के आयाम पर कार्य करे क्योंकि यह उनका वतन है और तीस साल एक लंबा समय हो चुका है कश्मीरी पण्डितों को हत्याओं, बलात्कारों और लूट-मार की आग झेल कर वहाँ से विस्थापित हुए। बकौल वरिष्ठ आरएसएस नेता, इंद्रेश कुमार, जो खुद लगभग 12 वर्ष कश्मीर में निवास कर चुके हैं और कई बार बाल-बाल उनकी जान जाने से बच चुकी है, मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महीनों नजरबंद रहे नेताओं की रंजिश और गिले-शिकवे सुन उन्हें मरहम भी लगाने की कोशिश की।

मोदी ने सरकार की कश्मीर विशेष विचारधारा, इन्सानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत की मजबूती पर जोर देते हुए पाकिस्तान समेत दुनिया को एक संदेश भी दिया है, कि कश्मीर भारत का जिगर का टुकड़ा है और इस से कभी आँखें नहीं मूंदी जा सकतीं। हालांकि महबूबा मुफ़्ती ने इस बैठक से पूर्व पाकिस्तान का राग अवश्य अपापा था मगर उनके सुर में किसी ने सुर नहीं मिलाया। बैठक के बाद तमाम नेताओं ने एक सुर में कहा कि बातचीत अच्छे माहौल में हुई।

बैठक में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के नेताओं के सामने प्रदेश के विकास का ब्लू प्रिंट सामने रखा। तमाम नेताओं की बात सुनने के बाद प्रधानमंत्री ने कहा, जम्मू-कश्मीर उनके दिल में बसता है। प्रदेश के विकास के लिए वह हर संभव कोशिश करेंगे। जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र को मजबूत करना और गरीब कश्मीरियों को काम-धंधे से लगाना सरकार की प्रथम प्राथमिकता है। इसका प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि इस कोरोना-काल में भी कश्मीरी जनता की सेवा में सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है।

पाठकों को याद होगा कि जब मोदी ने 2014 में कमान संभाली थी तो उस वर्ष की पहली बारिश में ही कश्मीर घाटी में जबरदस्त सैलाब आया था, जिसमें प्रधानमंत्री ने कश्मीरियों की सहायता हेतु हजारों करोड़ की मदद ही नहीं दी बल्कि भारतीय सेना को भी बचाव कार्यों में लगा दिया था। मोदीजी सही कहते हैं कि कश्मीर उनके मन में बसता है क्योंकि हर दीपावली उन्होंने कश्मीर में सेना के जवानों के साथ बिताई है। वे बार-बार यह भी कहते सुने गए हैं कि कश्मीरी भारत के, भारत कश्मीरियों का! पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने पाकिस्तान से बातचीत करने के महबूबा के बयान से किनारा कर कई संदेश दिए हैं।
(लेखक : कुलाधिपति, मानू, हैदराबाद)

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