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पाकिस्तान और बांग्लादेश में मंदिर फिर ध्वस्त

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  • दोनों घटनाओं में स्थानीय हिंदुओं के घरों को भी निशाना बनाया गया

पाकिस्तान में पंजाब स्थित भोंग में लाठी-डंडे-ईंट-पत्थर लिए जिहादियों ने भगवान गणेश के मंदिर में तोडफ़ोड़ करते हुए देवी-देवताओं की मूर्तियों को खंडित कर दिया और मंदिर के एक हिस्से को जला दिया।

  • बलबीर पुंज, वरिष्ठ स्तंभकार, पूर्व राज्यसभा सांसद और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय-उपाध्यक्ष
    punjbalbir@gmail.com

गत दिनों पाकिस्तान के बाद बांग्लादेश में भी मंदिरों पर मुस्लिमों की भीड़ ने हमला कर दिया। 4 अगस्त को पाकिस्तान में पंजाब स्थित भोंग में लाठी-डंडे-ईंट-पत्थर लिए जिहादियों ने भगवान गणेश के मंदिर में तोडफ़ोड़ करते हुए देवी-देवताओं की मूर्तियों को खंडित कर दिया और मंदिर के एक हिस्से को जला दिया। वही बांग्लादेश के खुलना जिला स्थित श्याली में 6 अगस्त की रात हिंदू महिला श्रद्धालुओं द्वारा कीर्तन-जुलूस निकालने से आक्रोशित स्थानीय मौलवी के निर्देश पर इस्लामी भीड़ ने चार मंदिरों को तहस-नहस कर दिया। इन दोनों घटनाओं में स्थानीय हिंदुओं के घरों को भी निशाना बनाया गया।

इस पूरे घटनाक्रम पर ना ही मैं अचंभित हूं और ना ही यह इस प्रकार का पहला मामला है। यदि बात बीते एक-डेढ़ वर्ष की करें, तो भोग स्थित गणेश मंदिर से पहले इसी साल मार्च में रावलपिंडी का निर्माणधीन मंदिर, विगत वर्ष खैबर पख्तूनख्वा स्थित कृष्ण मंदिर, सिंध के नगरपारकर में मंदिर, ल्यारी क्षेत्र में विभाजन पूर्व हनुमान मंदिर, चाचरो का मातारानी मंदिर सहित कई गुरुद्वारे- मजहबी उन्माद का शिकार हो चुके हंै। वही बांग्लादेश में सितंबर 2020 से लेकर अगस्त 2021 तक 12 मंदिरों और 100 से अधिक हिंदू घरों को हजारों की मुस्लिम भीड़ हमला करके क्षतिग्रस्त कर चुकी है।

जैसे ही भारत ने पड़ोसी देशों में मंदिर विध्वंस पर कड़ी आपत्ति जताई, वैसे ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने भोंग घटना पर त्वरित कार्रवाई और मंदिर जीर्णोद्धार की घोषणा कर दी। वहां के शीर्ष अदालत ने घटना का संज्ञान ले लिया और खैबर पख्तूनख्वा की विधानसभा इस संबंध में निंदा प्रस्ताव पारित किया। क्या इस स्वांग से पाकिस्तान की जमीनी हकीकत बदलेगी? वास्तव में, यह सब पाकिस्तानी सत्ता-अधिष्ठान द्वारा विश्व में अपने बचे-कुचे सम्मान को बचाने हेतु एक विशुद्ध ढकोसला है। वहां 22 संगठन वाले ‘मिल्ली याकजेहती परिषद’ द्वारा मंदिर विध्वंसकों का समर्थन और हिंदू मंदिर के समक्ष गोकशी को मुस्लिमों का अधिकार (शरीयत अनुसार) बताना- इसका प्रमाण है।

जन्म से पाकिस्तान का ‘इको-सिस्टम’ उस विषाक्त चिंतन से ग्रस्त है, जिसमें इस्लाम पूर्व संस्कृति, सभ्यता और परंपरा का कोई स्थान नहीं है। फारसी भाषा में लिखा पाकिस्तानी राष्ट्रगान और विभाजन बाद निर्मित भवनों की वास्तुकला पर अरब-मध्यपूर्व संस्कृति की झलक- इसका प्रमाण है। इस घृणा जनित दर्शन से प्रेरित होकर इस्लामी आक्रांताओं ने सदियों के कालखंड में भारत पर आक्रमण किया, हजारों-लाख की हत्या की, महिलाओं से बलात्कार किया, उनके पूजास्थलों को तोड़ा, उत्पीडऩ (जजिया सहित) किया और अलगाववाद की नींव रखी- जिससे कालांतर में पाकिस्तान और कश्मीर संकट का जन्म हुआ। क्या यह सच नहीं कि इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार- कासिम, गौरी, गजनवी, बाबर, खिलजी, औरंगजेब, अब्दाली, टीपू सुल्तान, सैयद अहमद खां, मो.जिन्नाह, मो.इकबाल आदि मानसबंधुओं को भारतीय उपमहाद्वीप का एक बड़ा वर्ग अपना नायक-प्रेरणास्रोत मानता है? पाकिस्तान में अधिकांश परमाणु आयुधों (मिसाइल और युद्धपोत सहित) के नाम इन्हीं इस्लामी आक्रांताओं को समर्पित है।

यह ठीक है कि मोहम्मद अली जिन्नाह ने 11 अगस्त 1947 को पाकिस्तानी संविधान सभा को संबोधित करते हुए कहा था- ‘पाकिस्तान में हर व्यक्ति मंदिर और मस्जिद या फिर अन्य किसी पूजास्थल में जाने के लिए स्वतंत्र होगा। मजहब, जाति और पंथ से राज्य को कोई मतलब नहीं होगा।’ अब उन्होंने ऐसा क्यों कहा? 1937 तक जिन्नाह की पहचान कट्टरपंथी मुस्लिम की नहीं थी। जैसे ही उन्होंने हिंदुओं के खिलाफ विषवमन किया, वैसे ही वे भारतीय उपमहाद्वीप के शीर्ष मुस्लिम नेता बन गए। अपने हिंदू पूर्वजों के बहुलतावादी संस्कारों के कारण उनके विचारों में ‘सेकुलर’ मूल्य अंशमात्र जीवित था- जो ‘काफिर-कुफ्र’ की अवधारणा पर जन्मे पाकिस्तान (पूर्वी पाकिस्तान सहित) में ‘हराम’ था। इसलिए पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं ने जिन्नाह के निधन पश्चात तुरंत ‘शरीयत’ आधारित व्यवस्था को अंगीकार कर लिया। वही 1971 में पूर्वी पाकिस्तान से बने बांग्लादेश ने भी कालांतर में इस्लामी गणतंत्र को स्वीकार कर लिया।

पाकिस्तान और बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) की वर्तमान आबादी क्रमश: 21 करोड़ और 18 करोड़ है। विभाजन के समय पाकिस्तान में 15-16त्न हिंदू-सिख और बांग्लादेश में 30त्न हिंदू-बौद्ध थे। यदि इस जनसांख्यिकीय को आधार बनाए, तो आज पाकिस्तान में यह संख्या कम से कम 3-3.5 करोड़ और बांग्लादेश में 4-5 करोड़ के आसपास- अर्थात् इनकी कुल आबादी 8-9 करोड़ के बीच होनी चाहिए थी। किंतु यह आंकड़ा लगभग ढाई करोड़ (अधिकांश दलित) है, जिनका जीवन भी दोयम दर्जे का है। आखिर 5-6 करोड़ हिंदू-सिख-बौद्ध कहां गए? या तो उन्होंने कालांतर में मजहबी उत्पीडऩ से त्रस्त होकर इस्लाम अपना लिया या फिर पलायन कर लिया और जिस किसी ने इसका विरोध किया, उसे मौत के घाट उतार दिया।

यही शेष अल्पसंख्यक आज भी मजहबी प्रताडऩा (जबरन मतांतरण और मंदिर विध्वंस सहित) शिकार है।
इस पृष्ठभूमि में स्वतंत्रता के समय खंडित भारत में मुस्लिम आबादी तीन करोड़ से अधिक थी, जो आज बढ़कर कम से कम 22 करोड़ हो गई है। यहां तीन लाख नई-पुरानी और छोटी-बड़ी मस्जिदें है। मुसलमानों को बहुसंख्यक हिंदुओं की भी भांति समान, तो कुछ मामलों में अधिक अधिकार प्राप्त है। फिर भी भारतीय मुसलमानों का एक वर्ग (पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी सहित) देश में असुरक्षित अनुभव करता है। प्रतिकूल इसके म्यांमार का विस्थापित रोहिंग्या मुसलमान किसी मुस्लिम देश के बजाय हिंदू बाहुल्य भारत में शरण हेतु अधिक ललायित दिखता है।

सच तो यह है कि जिन भारतीय सनातन क्षेत्रों को मिलाकर 1947 में पाकिस्तान बनाया गया था, वहां हजारों वर्ष पहले वेदों की ऋचाएं सृजित हुईं थी और बहुलतावादी संस्कृति का विकास हुआ था। यही कारण है कि वैदिक सभ्यता की जन्मभूमि होने के कारण उस भूक्षेत्र में हिंदू-बौद्ध-जैन-सिखों के कई सौ देवालय-गुरुद्वारे थे, जिनमें से कई आध्यात्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थे। इसका उल्लेख सैयद मोहम्मद लतीफ और खान बहादुर द्वारा लिखित पुस्तक ‘लाहौर इट्स हिस्ट्री, आर्किटेक्चरल रीमेंस एंड एंटिक्स’ में भी है, जिसे मैंने बतौर राज्यसभा सांसद वर्ष 2003 में अपने आधिकारिक पाकिस्तान दौरे के दौरान लाहौर से खरीदी थी।

जब पुस्तक में वर्णित पूजास्थलों की तत्कालीन स्थिति देखने निकला, तब उनकी विभीषिका देखकर मेरा गला सूख गया। पता चला कि 1947 के बाद वह मंदिर/शिवालय या तो मस्जिद/दरगाह में परिवर्तित कर दिए गए थे या किसी की निजी संपत्ति बन गई या फिर लावारिस खंडहर के रूप में मवेशियों का चारागाह बन चुके थे। मंदिरों के भग्नावशेषों का सरकारी संरक्षण करने के प्रतिकूल स्थानीय लोगों या व्यापारियों को ‘काफिर’ हिंदुओं की आस्था को कलंकित और अपमानित करने हेतु प्रोत्साहित किया जा रहा है।

यदि पाकिस्तान-बांग्लादेश में मंदिर विध्वंस और हिंदू संहार-उत्पीडऩ का बर्बर रिकॉर्ड है, तो खंडित भारत में ‘काफिर-कुफ्र’ दर्शन से प्रेरित मजहबी हिंसा का भी लंबा इतिहास है। वर्ष 1931 से जिन रक्तबीजों को घोर मजहबी शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर में ‘काफिर-कुफ्र’ जनित घृणा की घुट्टी पिलाई थी, वह 1989-91 में इस भूखंड के मूल निवासियों- पंडितों पर कहर बनकर टूटे। दर्जनों की हत्या हुई, महिलाओं का बलात्कार हुआ। तब कई ऐतिहासिक मंदिरों को या तो बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया गया था या फिर पूर्ण रूप से खंडित। परिणाम स्वरूप, पांच लाख कश्मीर पंडित पलायन हेतु विवश हो गए। धारा 370-35ए के संवैधानिक क्षरण के बाद भी विस्थापित कश्मीरी पंडित वापस घाटी नहीं लौट पाए है। हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और शेख अब्दुल्ला के पोते उमर अब्दुल्ला ने एक साक्षात्कार में तंज कसते हुए पूछा था- ‘धारा 370-35ए हटने से घाटी में कितने कश्मीरी पंडित लौटे’।

सच तो यह है कि घाटी में 30 वर्ष पहले हिंदुओं का संहार और उनका निष्कासन न केवल भारतीय संविधान के संरक्षक सर्वोच्च न्यायालय और मीडिया के साथ विश्वजनमत के समक्ष हुआ, अपितु वह सब मिलकर आज भी उनमें आए ‘असुरक्षा की भावना’ को बाहर नहीं निकाल पाया है। अपनी जन्मभूमि पर कश्मीरी पंडितों की पुनर्वापसी, पाकिस्तान-बांग्लादेश में शेष अल्पसंख्यकों का उत्थान या उनकी सुरक्षा अभी इसलिए संभव नहीं है, क्योंकि इन क्षेत्रों का ‘इको-सिस्टम’, ‘काफिर-कुफ्र’ की अवधारणा से इतना विषाक्त हो चुका है कि उसमें ना तो आज और ना ही निकट भविष्य में बहुलतावाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र के बीज अंकुरित नहीं हो सकते हैं।

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