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शिक्षक दिवस : कुकूनस की तरह है शिक्षक जीवन

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डॉ. श्यामसुंदर दुबे

मुझे कुकूनस पक्षी याद हो आता है। अफ्रीका में यह पक्षी पाया जाता है। इसकी विशेषता है कि आषाढ़ में जब मेघ घिरते हैं, बिजली कड़कती है, बारिश होती है, तब यह पक्षी अपने पंखों को फैलाकर खूब नाचता है। इतना नाचता है कि इसके पंखों से अग्नि कणिकाओं की वर्षा होने लगती है। यह आग इतनी बरसती है कि भरी बरसात में भी कुकूनस पक्षी अपनी आग में भस्म हो जाता है। पुन: जब आषाढ़ आता है, मेघ घिरते हैं, बिजलियां कड़कती हैं, पहला दोंगरा जब धरती पर गिरता है, तब कुकूनस के भस्मित कणों से दोंगरे की बूंदों का स्पर्श एक नई हलचल पैदा कर देता है। एक नया कुकूनस पक्षी उस राख से जी उठता है। फिर यह कुकूनस पक्षी अपने भीतर की सृजन दग्धता में फिर राख होता है, फिर पहले दोंगरे में यह भस्म अगले कुकूनस को जन्म देती है। कुकूनस का यह रूपक मुझे शिक्षक जीवन के करीब ले जाता है जो अपने तप में स्वयं भस्म होता है किंतु यह भस्म किसी दूसरे चैतन्य को संवारने लगती है।

वह तप क्या समकालीन व्यवस्था में किया जा सकता है? मैं यहां शिक्षक को आदर्श की घुट्टी पिलाने की हिमाकत नहीं करना चाहता। आखिरकार वह भी उन सभी स्थितियों-परिस्थितियों में समाज के साथ है जिसमें अनेक प्रकार के स्वर्णमृग उसकी चेतना सीता को छलना चाहते हैं। किंतु चेतना के खेल में शिक्षक जितना आगे है और जितना अलहदा है, क्या दूसरे लोग उसकी बराबरी कर सकते हैं? लोगों के पीछे तो दो-चार कैमरे पड़े रहते हैं इसके पीछे तो ताजिंदगी हजारों लाखों कैमरे जैसी आंखें उसको खुर्दबुर्द करने में लगी रहती हैं।

गली, चौराहों, पान की दुकान, होटल, सिनेमा कहां नहीं हैं-वे आंखें जो अपने शिक्षक को न देखती हों। फिर यह जो कैमरे का ऑब्जेक्ट है, कोई ऐसा जड़ -जंगम नहीं है जिसे जल्दी बिसार दिया जाए। 10 वर्ष से लेकर 20 वर्ष तक के छात्र का आदर्श उसका शिक्षक होता है। इसीलिए जो शिक्षक करता है उसकी क्रिया- प्रतिक्रिया बहुत दूर तक जाती है। वह अकेला हजारों में उन्मथित होता है। हजारों में अपनी उपस्थिति को दर्ज करता है। शिक्षक अपने समय का, अपने संयम में तानाशाह होता है। शाहजहां कैद में था। औरंगजेब को लगा कि अपने पिता की कुशलता का पता करना चाहिए। वह कैदखाने में गया और उसने शाहजहां से पूछा- अब्बाजान, सब खैरियत तो है। किसी चीज की जरूरत तो नहीं है।

शाहजहां ने कहा- बेटा और सब तो ठीक है यहां फुर्सत बहुत रहती है। अच्छा हो, तुम 2-4 पढऩे वाले लड़कों को मेरे पास भेज दो। मैं उन्हें खाली समय में यहां पढ़ा दिया करूंगा। औरंगजेब यह कहता हुआ उल्टे पांव लौट आया- अब्बाजान, अभी भी आपके दिमाग से बादशाहत की बू नहीं गई है। शिक्षक की बादशाहत पर बड़े-बड़े बादशाह न्योछावर हैं। बस शिक्षक अपने भीतर जरा उस रोशनी को पैदा कर ले जिसके हरूफ जब दिलों पर लिखे जाएं तो कभी फीके न पड़ें। मैं जब चौथी कक्षा के बोर्ड में इम्तिहान दे रहा था, तब गांव के केशोराम पंडितजी हम जैसे छात्रों को अपने घर अपने पुआल पर सुलाकर अपनी लालटेन जलाकर पढ़ाते थे। मुझे आज भी लगता है कि केशोराम पंडितजी जरूर अपनी लालटेन में केरोसिन तेल नहीं भरते थे। वे अपना रक्त उसमें भरकर रोशनाई करते थे।
(लेखक ललित निबंधकार, कथाकार, सेवानिवृत्त प्राचार्य हैंं।)

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