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सबसे घातक संक्रामक हत्यारों में से एक है टीबी

  • योगेश कुमार गोयल
    तपेदिक रोग के बारे में सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 24 मार्च को ‘विश्व टीबी दिवस’ मनाया जाता है, जिसे विश्व क्षय रोग दिवस के रूप में भी जाना जाता है। इस वैश्विक कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य लोगों को उन प्रयासों से अवगत कराना भी है, जो न सिर्फ इस बीमारी को रोकने बल्कि इसके उपचार के लिए किए जा रहे हैं। टीबी (ट्यूबरकुलोसिस) को क्षय रोग तथा तपेदिक के नाम से भी जाना जाता है, जो एक जीवाणु के कारण होने वाला फेफड़ों का एक गंभीर संक्रमण है। यह खांसने अथवा छींकने पर हवा में छोड़ी गई छोटी बूंदों से फैलता है। ड्रॉपलेट्स के जरिये फैलने वाले बैक्टीरिया कई घंटों तक हवा में रह सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक टीबी दुनिया में मृत्यु के सबसे घातक और संक्रामक कारकों में से एक है, जो विश्वभर में होने वाली मौतों के शीर्ष 10 कारणों में शामिल है। डब्ल्यूएचओ की 2019 में घोषित रिपोर्ट के आधार पर दुनियाभर में एक करोड़ लोग टीबी से संक्रमित थे, जिनमें से 26.9 लाख लोगों को भारत में टीबी था। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक प्रतिदिन 4100 से भी ज्यादा लोग टीबी के कारण अपनी जान गंवाते हैं और करीब 28 हजार लोग इस रोकथाम योग्य और इलाज योग्य बीमारी से बीमार पड़ते हैं। टीबी के कारण प्रतिवर्ष दुनियाभर में करीब 15 लाख लोग मौत की नींद सो जाते हैं। डब्ल्यूएचओ टीबी को दुनिया के सबसे घातक संक्रामक हत्यारों में से एक मानता है। हालांकि टीबी से निपटने के वैश्विक प्रयासों के चलते वर्ष 2000 से लेकर अभी तक साढ़े छह करोड़ से भी ज्यादा लोगों की जान बचाई जा चुकी है।
    विश्व टीबी दिवस प्रतिवर्ष एक विशेष थीम के साथ मनाया जाता है और इस साल टीबी दिवस की थीम ‘हां! हम टीबी को समाप्त कर सकते हैं’ है। रोग नियंत्रण और रोकथाम के लिए केन्द्र (सीडीसी) के मुताबिक तपेदिक लगभग 30 लाख साल पुराना रोग है और विभिन्न सभ्यताओं में इसके अलग-अलग नाम थे। टीबी को प्राचीन रोम में ‘टैब’, प्राचीन ग्रीस में ‘फथिसिस’ और प्राचीन हिब्रू में ‘स्केफेथ’ कहा जाता था। मध्य युग के दौरान गर्दन तथा लिम्फ नोड्स के टीबी को ‘स्क्रोफुला’ कहा जाता था, जिसे फेफड़ों में टीबी से अलग बीमारी माना जाता था। 1800 के दशक में इसे ‘खपत’ के रूप में जाना जाता था। माना जाता है कि ‘तपेदिक’ शब्द 1834 में जोहान शोनेलिन द्वारा गढ़ा गया था। 24 मार्च 1882 के दिन एक जर्मन चिकित्सक और माइक्रोबायोलॉजिस्ट डा. रॉबर्ट कोच ने पाया कि इस बीमारी का कारण टीबी बैसिलस था। डा. रॉबर्ट कोच द्वारा इस जानलेवा बीमारी के कारक बैक्टीरिया की पहचान करने की पुष्टि के फलस्वरूप ही टीबी के निदान और इलाज में दुनियाभर के वैज्ञानिकों को बड़ी मदद मिली। इसके ठीक 100 वर्षों पश्चात् 1982 में इंटरनेशनल यूनियन अगेंस्ट ट्यूबरक्लोसिस एंड लंग डिजीज ने इसी तारीख को ‘विश्व टीबी दिवस’ के रूप में घोषित किया और 1996 में इस दिवस को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अन्य संगठनों के साथ डब्ल्यूएचओ भी इस संघ में शामिल हो गया, जिसके बाद औपचारिक रूप से 1998 में स्टॉप टीबी पार्टनरशिप की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य टीबी से लड़ने के साथ-साथ इसे रोकना भी था। हालांकि दुनिया को टीबी से मुक्ति के लिए वर्षों से प्रयास हो रहे हैं लेकिन विड़म्बना है कि भारत टीबी से सर्वाधिक प्रभावित एशियाई देश है। वैश्विक टीबी रिपोर्ट के अनुसार 2020 में भारत में टीबी के कुल 26.4 लाख मरीज थे और वर्ष 2019 में टीबी विकसित करने वाले देशों में भारत की 26 फीसद हिस्सेदारी थी। हालांकि भारत अब तेजी से टीबी उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ रहा है और इसी क्रम में भारत सरकार द्वारा एक विशेष कार्यक्रम ‘प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान’ की शुरुआत की जा चुकी है। जहां दुनिया ने 2030 तक टीबी उन्मूलन का लक्ष्य रखा है, वहीं भारत का संकल्प 2025 तक टीबी मुक्त होना है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का कहना है कि भारत में दुनिया की आबादी का 20 प्रतिशत से कुछ कम है लेकिन दुनिया के कुल टीबी रोगियों का यहां 25 फीसद से भी ज्यादा है, जो चिंता का विषय है।

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