1857 में संन्यासी अभियान का मोर्चा थामा तपस्विनी ने

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  • रंजना चितले, कथाकार व स्तंभकार

स्वाधीनता के लिए 1857 महासंग्राम में सारा भारत एक साथ उठ खड़ा हो गया था। राजे-राजवाड़े, सिपाही, कामदार, आमजन के साथ साधु-संन्यासियों ने भी सक्रिय भागीदारी की। शास्त्र से समाज को चैतन्य करने वाले संन्यासियों ने इस युद्ध में शस्त्र उठा लिए और चल पड़े अपना कमण्डल लेकर। इस स्वतंत्रता संग्राम में महारानी तपस्विनी ने संन्यासी अभियान के द्वितीय चरण का नेतृत्व किया। उन्होंने 1857 की क्रांति के लिए जनजागृति की पृष्ठभूमि तैयार की। उल्लेखनीय है कि अपनी स्वाधीनता के लिए संन्यासी अभियान के पहले चरण का नेतृत्व बंगाल की देवी चौधरानी ने किया था।

महारानी तपस्विनी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की भतीजी और उनके ही सरदार पेशवा नारायण राव की पुत्री सुनन्दा थीं। वे बाल विधवा हो गईं व जप-तप-मनन में लीन रहती थीं। घुड़सवारी व शस्त्र संचालन में वह पहले से ही दक्ष थीं देश प्रेम, बलिदान व बहादुरी उनके खून में थी। अपने पिता की मृत्यु पर उनकी जागीर की देखभाल सुनन्दा ने अपने हाथ में ले ली। वे भीतर ही भीतर गुप्त रूप से अंग्रेजों को देश से निकाल बाहर करने की योजना बनाने लगीं।

गद्दार से मिली जानकारी के आधार पर अंग्रेजों ने रानी को त्रिचनापल्ली किले में नजरबंद कर दिया। रानी वहां से भी निकलकर नैमिषारण्य तीर्थ जा पहुंचीं और संत गौरीशंकर की शिष्य हो गईं। लोग उन्हें रानी तपस्विनी के नाम से जानते थे। रानी तपस्विनी के आध्यात्मिक ज्ञान ने उनकी आत्मशक्ति को बल दिया। वे अपने उपदेशों और प्रवचनों में देश प्रेम को प्राथमिकता देतीं। लोगों को स्वराज्य के लिए प्रेरित करतीं। उनके प्रवचनों ने ही पूरे इलाके में क्रांति की भावभूमि तैयार की। वे क्रांति का प्रतीक लाल कमल देकर साधुओं को विदा करतीं। उन्होंने धर्म के साथ राष्ट्र को जोड़ा और धर्म भ्रष्ट करने वाले अंग्रेजों के खिलाफ समाज को संगठित किया। उन्होंने संन्यासियों को कमण्डल के साथ अस्त्र-शस्त्र थमा दिये। साधु-संन्यासी गांव-गांव घूमकर समाज को क्रांति की प्रेरणा देने लगे। जहां आवश्यकता होती वहां शस्त्र भी पहुंचाये गये। गांव, शहर व सैनिक छावनियों तक में संन्यासियों का जाल फैल गया।

इन सबका सूत्रधार रानी तपस्विनी ही थीं। उनका संदेश मिलते ही धनी लोगों के धन से हथियार गढ़े जाने लगे। सबूतों के अभाव में अंग्रेज साधुओं को रोक नहीं पाये। संन्यासियों द्वारा उत्तर व मध्य भारत में क्रांति का संदेश पहुंचा, संगठन खड़ा होने लगा। माता तपस्विनी के आशीर्वाद के नाम से स्वातंत्र्य समर की प्रतीक रोटी व कमल जन-जन और सैनिकों को दिये जाने लगे। 1857 युद्ध के समय महारानी तपस्विनी ने घो?े पर सवार हो मोर्चा संभाला। छापामार दस्तों के साथ अंग्रेजों के फौजी ठिकानों पर हमला किया। दुर्भाग्य से 1857 की क्रांति की असफलता के साथ ही अंग्रेजों का अमानुषिक दमन चक्र चलने लगा। बड़ी संख्या में साधुओं को अंग्रेज मृत्युदंड देने लगे। उन्हें पे? से लटका कर फांसी दी जाने लगी।

महारानी तपस्विनी नेपाल की ओर चली गईं। नेपाल में अपने उपदेशों से जनता को अंग्रेजों के उद्देश्य से अवगत करवाया। देवालय बनवाये जो धर्म चर्चा के साथ क्रांति के केन्द्र बने। तपस्विनी ने नेपाल में शस्त्रों का कारखाना खोलने का भी विचार किया। छिपते छिपते वह कोलकाता गयीं। 1901 में बाल गंगाधर तिलक को योजना बताई। योजना ने आकार लिया व रानी तपस्विनी ने जर्मन फर्म क्रुप्स की सहायता से नेपाल में शस्त्रों का करखाना खोला। लेकिन गद्दार की सूचना से कारखाने पर छापा प? गया। तपस्विनी कोलकाता लौटीं और महाकाली पाठशाला का संचालन करने लगीं। 1905 में बंग-भंग आंदोलन के समय महारानी तपस्विनी की प्रेरणा से साधु संन्यासियों ने फिर आंदोलन में भाग लिया।

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