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तालिबान ने याद ताजा कर दी मालाबार के दंगों की

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  • सौ साल पहले मोपलाओं ने भी केरल में वैसी ही अमानवीयता की थी

मालाबार की क्रूरतम अमानुषिकता को भी ढंकने का प्रयास सदैव हुआ। तब भी और अब भी। यह मालाबार हिंसा का शताब्दी वर्ष चल रहा है। 1921 का वर्ष ही था तब वह इलाका लाशों से पट गया था। वह अगस्त माह ही था जब वहां की गलियां रक्त से लाल हो रहीं थीं, आसमान चीत्कारों से गूंज रहा था। पर बचाव के लिये कोई न आया। वह सब हफ्तों नहीं, महीनों चला है। इस समय जिस तरह लोग अपना सब कुछ छोड़कर केवल प्राण लेकर अफगानिस्तान से भाग रहे हैं। ऐसे लोग मालाबार से भी भागे थे।

रमेश शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार
rsharmamdn@yahoo.co.in

जो आज अफगानिस्तान में घट रहा है वह कुछ नया नहीं है। तालिबान जो कर रहा है या करने वाला है वह भी कुछ नया नहीं है। भारतीय उपमहाद्वीप में ऐसा हजारों बार हो चुका है, जुबान पर धर्म का नारा, हाथ में हथियार लेकर हिंसात्मक क्रूरता से भरी ऐसी भीड़ केवल तीन ही काम करती है एक पुरुषों की हत्या, दूसरा स्त्रियों का हरण और बलात्कार तथा तीसरा लूट। मोहम्मद बिन कासिम, मेहमूद गजनवी, मोहम्मद गौरी, काला पहाड़, अलाउद्दीन खिलजी, नादिरशाह अहमदशाह अब्दाली जैसे असंख्य नाम हैं। भारत का कोई ऐसा कोना नहीं जिसने आतंक के दंश को न झेला हो। कैसे भारत में स्वत्व और अस्तित्व का बोध बचा, यह अपने आप में एक विचारणीय बिन्दु है। यदि हम बहुत पहले की बात छोड़ दें जब विश्व में सर्वाधिक अग्रणी और समृद्ध भारत दमित और दास बन गया था और केवल इस सौ साल की बात करें जिसमें अंग्रेजों ने सबको अपने अधीन कर लिया था, उस काल में भी ऐसी आक्रामक भीड़ देश के हर कोने में दिखाई दे रही थी । अंग्रेजों के झंडे के नीचे परिवर्तन के दौर की बात होती है । नि:संदेह उस कालखंड कुछ लोगों को बहुत आनंद मिला।


आनंद उठाने वाले लोग उसी मानसिकता के रहे हैं जैसे अकबर के कालखंड में बीरबल, मानसिंह, टोडरमल या औरंगजेब के काल में सवाई राजा जयसिंह आदि रहे हैं। पर ठेठ सनातनी परंपरा से जुड़े लोगों के साथ हुआ व्यवहार कैसा रहा है इससे इतिहास के पन्ने भरे हुये हैं। आज से ठीक सौ साल पहले मालाबार में जो घटा, मालाबार के सनातनियों ने जो झेला, उस क्रूरता का वर्णन करने के लिये शब्दकोश में कोई एक शब्द या नहीं, जिससे उस दर्द को अभिव्यक्त किया जा सके, समझाया जा सके। ‘दिल दहला देने वाला वाक्य भी बहुत छोटा पड़ता है। और अधिक संताप की बात तो यह है कि उस दर्द की अभिव्यक्ति पर सदैव आवरण डालने का ही प्रयत्न हुआ, जैसे अभी कतिपय वाम विचारक बुद्धिजीवी और पत्रकार तालिबान की क्रूरता को ढंकने की कोशिश कर रहे हैं। मालाबार की क्रूरतम अमानुषिकता को भी ढंकने का प्रयास सदैव हुआ। तब भी और अब भी। यह मालाबार हिंसा का शताब्दी वर्ष चल रहा है। 1921 का वर्ष ही था तब वह इलाका लाशों से पट गया था। वह अगस्त माह ही था जब वहां की गलियां रक्त से लाल हो रहीं थीं, आसमान चीत्कारों से गूंज रहा था । पर बचाव के लिये कोई न आया। वह सब हफ्तों नहीं, महीनों चला है । इस समय जिस तरह लोग अपना सब कुछ छोड़कर केवल प्राण लेकर अफगानिस्तान से भाग रहे हैं । ऐसे लोग मालाबार से भी भागे थे । अपना सब कुछ छोड़कर केवल प्राण और मान लेकर, फिर भी आधे से ज्यादा लोगों के न प्राण बचे, न मान । वह वातावरण इससे हजार गुना अधिक भय, क्रूरता और हिंसा से भरा था ।


अफगानिस्तान में प्रतिदिन कोई नयी दर्दनाक कहानी सुनने में आ रही हैें। ऐसी खबरें दर्द तो देतीं हैं पर आश्चर्य में नहीं डालतीं। चूंकि तालिबान में इसी तरह के बर्ताब की आदत है। वस्तुत: तालिबान भले एक संस्था या संगठन के रूप में आज सबके सामने हो । पर तालिबान केवल वह संगठन भर नहीं जो 1994 के सितम्बर में सामने आया। यह एक मानसिकता है जो सैकड़ों सालों से देखी जा रही है, भारत भुगत रहा है।
इस मानसिकता ने लगभग तेरह सौ साल से पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को आतंकित कर रखा है ।कहने के लिये जुबान पर ये अपने धर्म की बात करते हैं लेकिन इनका दुनिया के किसी धर्म से कोई संबंध नहीं। धर्म के नाम पर दुनिया का एक बड़ा समूह बिना सोचे-समझे इनके समर्थन पर उतर आता है। जिससे इनकी क्रूरता और बढ़ती है। इनका समर्थन करने वाले लोग यह विचार ही नहीं करते कि तालिबानी जो कर रहे हैं क्या वह उनके धर्म का हिस्सा है ?

जैसा इन दिनों भारत में भी यहां-वहां सुनने को मिलने लगा है । बिना सोचे समझे यहां वहां से तालिबान के समर्थन में आवाज सुनाई देने लगी। जिस धर्म का ये लोग नारा लगाते हैं वह तो इंसानियत की बात करता है, भाईचारे की बात करता है, दुनिया में अमन की बात करता है, उस धर्म में हत्या, लूट और बलात्कार सबसे बड़े गुनाह माने गये हैं । लेकिन ये लोग क्या कर रहे हैं ? तालिबानी वही सब तो कर रहा है जिन्हें गुनाह माना गया है। और यही सब तो हुआ था सौ साल पहले मालाबार में। आज तालिबान की गोली उन लोगों के सीने में भी धंस रही है जिन्होंने अफगानिस्तान की प्रगति के लिये अपना खून पसीना एक किया है। यही सब हुआ था मालाबार में भी। मालाबार के मोपलाओं ने उन सब लोगों पर कहर बरपाया था जिन्होंने उन्हें रहने घर दिये थे या आजीविका चलाने के लिये नौकरियां दी थीं। लेकिन उस भीड़ ने किसी का लिहाज न किया। उन दिनों मोपला वस्तुत: केरल के तटों पर निवास करने वाले परिवार थे, जिनका पेशा समुद्र तट पर आने वाले जहाजों की माल ढुलाई करना, मछली पकडऩा और आसपास बागानों में काम करना था। तब केरल के समुद्र तट अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के बड़े-बड़े केन्द्र थे । व्यापारियों और अन्य प्रचारकों द्वारा वहां इस्लाम आया और तटीय बस्तियों में धर्मांतरण हुआ।


भारत मेंं नवीनता का स्वागत होता है, अतिथि का सम्मान होता है। धर्म प्रचारकों के रूप में विदेशियों का केरल में स्वागत हुआ और मोपलाओं ने उत्साह से नया धर्म अपनाना आरंभ कर दिया। लेकिन बाहर से आने वाले प्रचारकों ने केवल धर्मान्तरण करवा कर ही अपने काम की इतिश्री नहीं की, उन्होंने नये धर्म को सिखाने-समझाने के नाम पर स्थाई डेरा डाला और नव धर्मान्तरित मोपलाओं में आक्रामक-एकजुटता का भाव जगाने लगे। जिससे छोटी-मोटी झड़पों का सिलसिला शुरु हो गया। मोपला स्थानीय निवासी ही थे पर उनकी अपने ही पुराने परिजनों से झड़पें होने लगीं।। फिर वर्ष 1921 आया। अंग्रेजों ने तुर्की में खलीफा व्यवस्था समाप्त करदी। इसके विरुद्ध तुर्की में अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन शुरू हो गया।


भारत में भी गांधीजी और कांग्रेस इस आंदोलन के समर्थन में आये स्वतंत्रता संग्राम में खिलाफत आंदोलन भी एक अध्याय है। मालाबार में भी इस खिलाफत आंदोलन का आह्वान हुआ। चूंकि यह अंग्रेजों के निर्णय के विरुद्ध था अतएव ईसाई मिशनरी प्रभावित क्षेत्रों को छोड़कर केरल में सभी आंदोलन से जुड़ गये। मालाबार के मोपलाओं ने भी जोर शोर से आंदोलन आरंभ किया। यह आंदोलन फरवरी 1921 में आरंभ हुआ और कब साम्प्रदायिक हो गया, पता ही न चला। अगस्त में आंदोलनकारी भीड़ ने सनातनी समाज पर हमले शुरु कर दिये। दो क्षेत्रों एरनद और वल्लुवानद में एक भी सनातनी घर ऐसा न बचा जो लुटा-पिटा न हो। बाद में आंकडों से पता चला कि इस हिंसा में लगभग पचास हजार लोगों को चपेट में लिया। सावरकरजी ने इस पर एक पूरा उपन्यास लिखा और सत्य से संसार को अवगत कराया। इतिहास में यह घटना मोपला विद्रोह के नाम से दर्ज है। लेकिन इसे विद्रोह नहीं कहा जा सकता। विद्रोह कहकर हिंसक की मंशा और क्रूरता पर परदा डालने की कोशिश है।

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