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सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक नहीं, सेवक

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  • राष्ट्रपति और संसद में निहित हैं कानून बनाने और उनके क्रियान्वयन की अधिकतर शक्तियां

सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश पद ग्रहण करने से पूर्व संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा निष्ठा बनाए रखने की प्रतिज्ञा करता है। वह यह भी प्रतिज्ञा करता है कि संविधान को सदा सिर माथे से लगाकर रखेगा। इससे यह बिल्कुल स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट की भूमिका संविधान के संरक्षक की नहीं बल्कि उसके पुत्र, सेवक या संतति की है।

  • ओमप्रकाश सुनरया

सर्वोच्च न्यायालय ऐसे व्यवहार करता है जैसे वह संविधान का संरक्षक, पालक ,अभिभावक या गार्जियन हो। जबकि वस्तुस्थिति बिल्कुल ऐसी नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय संविधान से उत्पन्न हुआ है। इसलिए उसे संविधान की संतति तो कह सकते हैं। पर संविधान का माता-पिता नहीं कह सकते। न ही वह संविधान का संरक्षक है। सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश पद ग्रहण करने से पूर्व संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा निष्ठा बनाए रखने की प्रतिज्ञा करता है। वह यह भी प्रतिज्ञा करता है कि संविधान को सदा सिर माथे से लगाकर रखेगा।

इससे यह बिल्कुल स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट की भूमिका संविधान के संरक्षक की नहीं बल्कि उसके पुत्र, सेवक या संतति की है। राष्ट्रपति की शपथ में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि राष्ट्रपति संविधान का संरक्षण करेगा। इस प्रकार यह बिल्कुल स्पष्ट है कि संविधान निर्माता चाहते थे कि राष्ट्रपति के पास संविधान के संरक्षण का अधिकार हो। जबकि सुप्रीम कोर्ट संविधान के प्रति श्रद्धा और निष्ठा रखने का कार्य करें, उसे सिर माथे रखने का कार्य करें। संविधान के मूल भाग में ही राष्ट्रपति की यह शपथ उल्लिखित है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की शपथ संविधान के तीसरे परिशिष्ट के चौथे क्रमांक पर है। तीसरे परिशिष्ट में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश से पूर्व संसद सदस्य और केंद्रीय मंत्रियों की शपथ का प्रारूप उल्लिखित है।

राष्ट्रपति की शपथ के प्रारूप को इतना महत्व दिया गया कि उसे संविधान के मूल भाग में अनुच्छेद 60 के रूप में रखा गया। जबकि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की शपथ के प्रारूप को संविधान के तीसरे परिशिष्ट के चौथे क्रमांक पर रखा गया। यह अचानक या बिना सोचे समझे किया गया ऐसा तो कोई भी नहीं कह सकता। संविधान के पांचवे भाग के चौथे अध्याय में सर्वोच्च न्यायालय के संबंध में वर्णन है।

इस अध्याय का गहन अध्ययन करने पर भी एक भी प्रावधान ऐसा प्रकट नहीं होता जिससे सुप्रीम कोर्ट को संसद के ऊपर या राष्ट्रपति के ऊपर कोई अधिकार प्रकट होता हो। जबकि इसके उलट तो अनेक प्रावधान प्रकट होते हैं, जब राष्ट्रपति को या संसद को सर्वोच्च न्यायालय के संबंध में अधिकार प्राप्त हैं। जबकि सर्वोच्च न्यायालय इस प्रकार से व्यवहार करता है, जैसे उसे राष्ट्रपति और संसद दोनों पर अधिकार प्राप्त हो। इस विषय में संविधान के पांचवे भाग के चौथे अध्याय पर थोड़ा ध्यान देना समीचीन रहेगा।

अध्याय 4 के पहले ही अनुच्छेद में यह कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का अधिकार संसद को रहेगा। यह कहीं नहीं कहा कि सर्वोच्च न्यायालय को रहेगा। इसी तरह, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति, आयु आदि अधिकार भी संसद को दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को पद से हटाने की शक्ति भी संसद और राष्ट्रपति को दी गई है न कि सुप्रीम कोर्ट को। इसकी प्रक्रिया भी संसद तय करेगी।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश का राष्ट्रपति के समक्ष शपथ ग्रहण करने का निर्देश संविधान में है। ऐसा निर्देश नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष या सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश के समक्ष शपथ ग्रहण करे। इतना कुछ संविधान के पांचवे भाग के चौथे अध्याय के प्रथम अनुच्छेद अर्थात अनुच्छेद 124में ही कहा गया है। इतना ही नहीं आगे अध्ययन से फिर यही बात स्पष्ट होती है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पेंशन, भत्ते और विशेषाधिकारों का निर्धारण करने का अधिकार भी संविधान के 125 वें अनुच्छेद ने संसद को ही दिया है।

अनुच्छेद 126 राष्ट्रपति को ही स्थानापन्न मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का अधिकार देता है। यह अधिकार भी सर्वोच्च न्यायालय प्रीम कोर्ट को नहीं दिया गया है। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय में तदर्थ जज की नियुक्ति भी मुख्य न्यायाधीश तभी कर सकता है जबकि वह राष्ट्रपति की पूर्व सहमति ले ले। यदि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को लगता है कि दिल्ली के अतिरिक्त कहीं और उन्हें सर्वोच्च न्यायालय की सिटिंग(कार्यवाही) करनी है,तो भी वे स्वयं ऐसा नहीं कर सकते। उन्हें राष्ट्रपति से अनुमोदन लेना पड़ेगा।

संविधान के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय में सिविल मामलों में हाईकोर्ट की एकल बेंच की अपील नहीं सुनी जा सकती। पर ध्यान दें, यहां भी यदि संसद चाहे तो ऐसा होने दे सकती है। यहां भी अधिकार संसद को दिया गया है न कि सुप्रीम कोर्ट को। अनुच्छेद 134 यह निर्धारित करता है कि केवल कुछ विशिष्ट मामलों में ही सर्वोच्च न्यायालय हाईकोर्ट से आपराधिक मामलों की अपील सुनेगा। परंतु ध्यान दें, यहां पर भी संसद को न कि सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार दिया गया है कि वह चाहे तो सर्वोच्च न्यायालय को किसी भी मामले की अपील सुनने का अधिकार दे दे। संविधान प्रारंभ होने के पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के स्थान पर फेडरल कोर्ट हुआ करता था।

अनुच्छेद 135 सर्वोच्च न्यायालय को अधिकार देता है कि वह फेडरल कोर्ट के अधिकारों का प्रयोग भी कर सकता है। पर स्पष्ट कहा गया है कि यदि संसद चाहे तो इस अधिकार में परिवर्तन कर सकती है। सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही आदेशों या निर्णय के पुनरावलोकन का अधिकार दिया गया है। पर देखें तो सही। यह अधिकार भी संसद द्वारा बनाए गए कानून के अंतर्गत ही है। कितना स्पष्ट है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय को स्वयं के आदेश का पुनरावलोकन करना है तो वह अपनी मर्जी से ऐसा नहीं कर सकता। बल्कि संसद द्वारा बनाए गए कानून के अंतर्गत ही ऐसा कर सकता है।

आज सर्वोच्च न्यायालय अनेक ऐसे अधिकारों का प्रयोग कर रहा है जो उसे संविधान ने नहीं दिए। अनुच्छेद 138 इस संबंध में सबके ध्यान देने योग्य है। इस अनुच्छेद 138 में कहा गया है कि संसद कोई अतिरिक्त अधिकार या क्षेत्राधिकार सर्वोच्च न्यायालय को प्रदान कर सकती है। यहां राज्य सरकार और केंद्र सरकार के स्पेशल एग्रीमेंट के द्वारा संसद यदि चाहे तो सर्वोच्च न्यायालय को अन्य अधिकार प्रदान कर सकती है। इस अतिरिक्त अधिकार प्रदान करने वाले अनुच्छेद में कहीं ऐसा प्रावधान नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय स्वयं अपने क्षेत्राधिकार या अधिकारों में वृद्धि कर सकता है। पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अधिकारों को स्वयं ही बढ़ा लिया है।

संविधान के अनुच्छेद 139 ने संसद को ही यह अधिकार दिया है कि वह यदि चाहे तो सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के अतिरिक्त अन्य किसी विषय में निर्देश,आदेश या रिट जारी करने का अधिकार दे सकती है। यहां संविधान के शब्दों पर थोड़ा अधिक ध्यान देना उपयोगी रहेगा। संविधान ने यहां शब्द प्रयोग किया है कि संसद सर्वोच्च न्यायालय को अधिकार प्रदान कर सकती है। कितना साफ है कि संसद सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार दे रही है ,न कि सर्वोच्च न्यायालय संसद को कोई अधिकार दे रहा है।

इसी प्रकार की बात अनुच्छेद 140 में संसद द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को अनुषांगिक अधिकार प्रदान करने की बात कही गई है। अनुच्छेद 142 के संबंध में यह भ्रम व्यापक रूप से फैला हुआ है कि इस प्रावधान के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय जो चाहे सो आदेश दे सकता है। पर वास्तव में इसमें दो महत्वपूर्ण बंधन सर्वोच्च न्यायालय पर हैं। प्रथम तो यह कि अपने समक्ष प्रस्तुत मामले में ही पूर्ण न्याय करने के लिए ही वह इन अधिकारों का प्रयोग कर सकता है।

दूसरे व इन अधिकारों का प्रयोग संसद द्वारा बनाए गए कानून के अंतर्गत और यदि संसद में कोई कानून नहीं बनाया गया है तो राष्ट्रपति द्वारा दिए गए निर्देशों के अधीन ही कर सकता है। अनुच्छेद 145 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय स्वयं के समक्ष कैसे कार्रवाई चलेगी. इस विषय में नियम बना सकता है। पर संविधान में इस विषय में भी उसे संसद और राष्ट्रपति के अधीन रखा गया है। कहा गया है कि यह नियम संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के अंतर्गत ही बनाए जाएंगे। इन नियमों का पहले से राष्ट्रपति से अनुमोदन लेना होगा। अनुच्छेद 146 में सुप्रीम कोर्ट के अधिकारी कर्मचारियों की नियुक्ति के संबंध में प्रावधान है।

केवल एक उदाहरण देकर इस समय इस लेख का समापन करना उचित रहेगा। संविधान में यदि संशोधन करना अपेक्षित हो, तो संसद के प्रत्येक सदन को दो तिहाई बहुमत के द्वारा उस संशोधन को स्वीकृत करना होगा। कुछ महत्वपूर्ण मामलों में तो संसद के साथ ही साथ कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं को भी उस संशोधन को स्वीकृति देनी होगी। संविधान ने जिस देश में लोकतंत्र को सर्वोच्च मूल्य के रूप में स्थापित किया हो, उस देश में बिना चुने हुए कुछ व्यक्ति, चाहे वो कितने ही बुद्धिमान क्यों न हों, संविधान में संशोधन करने का साहस कैसे कर सकते हैं? पर हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक बार ऐसा किया है।

संविधान की व्याख्या करने के नाम पर ऐसी-ऐसी व्याख्या प्रस्तुत कर दी है, जो संविधान निर्माताओं के या सामान्य पाठक के ध्यान में कभी आ ही नहीं सकती थी। जब मैं सामान्य पाठक कहता हूं, तो एक बार फिर संविधान की मूल आत्मा की ओर ध्यान आकर्षित करना आवश्यक हो जाता है। संविधान निर्माताओं ने संविधान के बिल्कुल प्रारंभ में ही स्पष्ट कर दिया है कि यह संविधान भारत के नागरिकों ने, भारत के नागरिकों के हित के लिए निर्मित किया है।

सर्वोच्च न्यायालय को तो यह अतिरिक्त और विशेष रूप से स्मरण रखना चाहिए कि संविधान निर्माता जो कुछ भारतीय नागरिकों को प्रदान करना चाहते थे, उसमें सबसे पहला स्थान न्याय का है। भारतीय संविधान के पहले पृष्ठ पर ही यह बातें उल्लिखित हैं। इसलिए जिनका अस्तित्व ही इस संविधान पर आश्रित है, जिन्होंने इस संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा निष्ठा रखने की शपथ लेकर ही पद ग्रहण किया है, जिन्होंने इस संविधान को सिर मांथे रखने की प्रतिज्ञा की है, उन्हें क्या 138 करोड़ नागरिकों को अपने चिंतन और आचरण के केंद्र में नहीं रखना चाहिए?

(लेखक पूर्व न्यायाधीश व विधि के प्राध्यापक हैं।)

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