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शाण पर सूरज

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जेठ में सहस्रकिरण सूर्य का इतना ताप कि प्रजा बेहाल हो जाती है। बदन पर घाम से घमौरियां निकल जाती और फोड़े हो जाते! सूर्य पत्नी संझ्या ने अपने पिता विश्वकर्मा से जाकर सूर्यदेव की किरणों को काटने छांटने का आग्रह किया तो विश्वकर्मा ने शाण यंत्र चलाया और अपने दामाद के ताप से पुत्री को बचाया। उन्होंने इस यंत्र से सूर्य की किरणों को छांट दिया!

मत्स्य पुराण में यह प्रसंग आया है और इसी प्रसंग से विश्वकर्मा की कला सृजन की स्मृतियां आरंभ मानी जाती है। हमने महा विश्वकर्म पुराण की भूमिका में इस कहानी को बहुत उपयोगी माना और दक्षिणायन का प्रसंग लिया। यह प्रतिमा चित्र उसी प्रसंग को पुष्ट करता है। तमिलनाडु के कांचीपुरम के एकांबर नाथ मंदिर के मंडप के एक स्तंभ पर यह उत्कीर्ण है और बहुत अनन्य है। यह चित्र सुमति नाथन का उपहार है। (संकलित)

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