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सुदर्शन जी कहते थे समाज तब सुखी होगा जब प्रकृति के साथ उसका तालमेल होगा

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  • राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक की जयंती आज

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक स्व. कुप्.सी. सुदर्शन भारतीय दर्शन के वाहक थे। वे प्रकृति के शोषण के विरोधी थे और कहते थे कि प्रकृति से उतना ही लो जितने की जरूरत है, तभी यह पृथ्वी समस्त जीवों की सेवा कर पाएगी।

  • राजेंद्र कुमार चड्डा


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक श्री कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन का जन्म 18 जून, 1931 को रायपुर (वर्ततान में छत्तीसगढ़ राज्य) में हुआ था। मूल रूप से कर्नाटक के एक गांव कुप्पहल्ली के निवासी अपने पिता सीतारमैया के वन विभाग में कार्यरत होने के कारण सुदर्शन जी लंबे समय तक मध्य प्रदेश में रहे। यहीं उनकी उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई, जिसके बाद उन्होंने जबलपुर से इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन में बी.ई. की उपाधि ली। वे दैनंदिन जीवन-व्यवहार में स्वदेशी के आग्रही थे और कार्यकर्ताओं को भी कुटीर उद्योगों के उत्पादों के प्रयोग के लिए प्रेरित करते थे। सुदर्शन जी का संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, बंगला, कन्नड़, असमिया और पंजाबी भाषाओं पर समान अधिकार था। कन्नड़भाषी होने के बावजूद वे राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के प्रबल समर्थक थे।

किसी भी समस्या के मूल को खोजकर उचित समाधान तक पहुंचना, उनके मूलगामी चिंतन की विशेषता थी। आज जलवायु परिवर्तन की समस्या से जूझ रहे देश-दुनिया को लेकर उनका मानना था कि समाज सुखी होगा तभी मनुष्य सुखी हो सकेगा। समाज तब सुखी होगा जब प्रकृति के साथ उसका तालमेल ठीक होगा और प्रकृति के साथ तालमेल तब ठीक रहेगा,जब हम यह अनुभव करके चलेंगे कि सबके अंदर एक ही परमतत्व व्याप्त है।

अत: हमें जो भी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक रचनाएं मनुष्य को सुखी करने के लिए विकसित करनी हैं, वे तभी सफल मानी जाएंगी जब व्यक्ति, समाज, प्रकृति और परमात्मा, इन चारों के बीच तालमेल प्रस्थापित करते हुए वे व्यक्ति को शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का सुख प्रदान कर सकें। ऐसी जो भी व्यवस्था होगी वही व्यवस्था मनुष्य को पूर्ण रूप से सुख दे सकती है। इस प्रकार की व्यवस्था का विकास प्राचीनकाल में हमारे पुरखों ने किया था, जिसके कारण दीर्घकाल तक बड़ा सुखी एवं समृद्ध जीवन हमने व्यतीत किया।

इतना ही नहीं, वे इस बात पर बहुत बल देते थे कि जल ही जीवन है और उसका संरक्षण सर्वोपरि है । उनके अनुसार नदी-नालों पर छोटे-छोटे बांध बनाकर भूजल स्तर को ऊंचा किया जा सकता है तथा अल्पव्यय में सिंचाई के साधन खड़े किए जा सकते हैं। लोगों ने इसे सिद्ध करके दिखाया है। उनका मानना था कि बैल-चालित ट्रैक्टर, डीजल-चालित ट्रैक्टर से दस गुना सस्ता है और छोटे खेतों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। ये ट्रैक्टर महिलाएं भी चला सकती हैं क्योंकि इसमें पैदल नहीं चलना पड़ता।

इसी तरह, बिजली से चलने वाली तेल घानियां प्रत्येक ग्राम संकुल में लगाने से तिलहन से जहां सीधा तेल निकाला जा सकता है, वहीं मवेशियों के लिए उत्तम खली भी प्राप्त हो सकती है। शहरों के तेल कारखानों में ‘साल्वेंट एक्सट्रैक्शनÓ पद्धति से जो तेल बनाया जाता है उसमें ओमेग 3 और ओमेग 6 तत्वों के बीच का अनुपात बिगड़कर अनेक रोगों का कारण तो बनता ही है, खली भी विदेशों में निर्यात हो जाने से हमारे अपने पशु उत्तम पोषक आहार से वंचित हो जाते हैं।

कृषि-आधारित अनेक उद्योग ग्रामों में रोजगार के अवसर प्रदान कर ग्रामीण नवयुवकों का शहरों की ओर पलायन रोक सकते हैं। इसके लिए, ऐसे उद्योगों को बड़े उद्योगों की प्रतियोगिता से बचाना होगा। राब से एथनॉल बनाया जाए तो जहां पेट्रोल के आयात में कमी होगी, वहीं गन्ना उत्पादक किसानों को आय का ऐसा स्रोत मिल जाएगा, जिससे शक्कर एक सहउत्पाद का रूप धारण कर लेगी।

स्वदेशी के कारण ही वे देश की आयुर्वेद पद्धति को अपनाए जाने के आग्रही थे। वे मानते थे कि आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के जितने प्रकार भारत में हैं, उतने विश्व के किसी अन्य देश में नहीं हैं। विश्व में वानस्पतिक औषधियों की मांग बढ़ रही है। चीन करीब अपनी 20 मुख्य जड़ी-बूटियों के बल पर 2,250 करोड़ रुपए का वानस्पतिक औषधियों का निर्यातक है, जबकि भारत 250 से भी अधिक जड़ी-बूटियों का उत्पादक होने के बावजूद 2,500 करोड़ रुपए का ही निर्यात कर पाता है।

वे वैश्वीकरण और विदेशी कर्ज की अपेक्षा देश में उपलब्ध संसाधनों के बल पर ग्राम विकास को प्राथमिकता देने के पक्षधर थे। उनका मानना था कि भारतीय जड़ी-बूटियों के उत्पादन को बढ़ावा देने से देश के वनवासी क्षेत्रों के विकास में बड़ी मदद मिलेगी। इसी तरह से गांवों के लिए सस्ती सौर ऊर्जा उपलब्ध करवाने से ग्रामों में समृद्धि और विकास का रास्ता खुल सकता है। इससे गांवों में रहने वाली देश की 75 प्रतिशत जनसंख्या का विकास संभव हो सकता है। इसी तरह, समाज को संतुलित उपभोग की प्रेरणा देने वाले सुदर्शन जी का मानना था कि हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इस जगत में सब कुछ भगवान का है। अपने लिए केवल उतना ही लो जितना जीवन-यापन के लिए आवश्यक हो।

ईशावास्यं इदं सर्वं, यत्किंच जगत्यां जगत्
तेन त्यक्तेन भुंजीथा, मा गृध: कस्यस्विद्धनम्

अर्थात् इस चराचर जगत में जो कुछ है सब ईश्वर का है। उसमें केवल उतने पर ही हमारा अधिकार है जो हमारे जीवन-यापन के लिए नितांत आवश्यक है, शेष सब भगवान का है।

इसी द्वंद्वात्मकता को आज का विज्ञान स्वीकार कर रहा है। तीसरी चीज यह है कि हमारे यहां कहा गया है-जो अंतिम तत्व है, वह अवर्णनीय है। उसका वर्णन नहीं कर सकते। श्री सुदर्शन जी अंतिम श्वांस लेने तक (15 सितंबर, 2012) अपने विचारों को लेकर आग्रही बने रहे। आज उनके विचारों को समझने और उनके अनुसार चलने की आवश्यकता है।

(लेखक ‘प्रज्ञा प्रवाह की केंद्रीय टोली के सदस्य हैं)

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