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अध्ययन कक्ष : स्त्री की करुणा और अन्याय के प्रति आक्रोश और करुणा की बहती नदी-सी कविताएँ

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  • रक्षा दुबे


वे खुशनुमा दिन थे/ बेफिक्र, रंगीन और लंबे/ रुपहले धागों से बुने दिन/ ओस पर पड़ी गर्म शॉल की तरह/ जब आसमान होता था / बिल्कुल नीला/ और घास कच्ची हरी/जब हमारी आंखों में/ तैरते थे सुनहरे सपने/ हमारी मु_ियों में कैद थे/ आशाओं के /सफेद, नन्हें ,नर्म/ सेमल के फाहे/ जिनका पीछा करते करते/ हम दौड़ जाते थे/ अनंत तक/ हमारे भीतर लहराता था/सच और सपनों का/ विरोधाभासी समुंदर।/ उफनते वसन्त के/ सम्मोहक बादलों के पार/ हमारे जीवन का सूर्य/ तमतमा रहा था / अपने तीखे तेवरों के साथ/ गुजरते वक्त के/ ताम्बई दिनों में हमने जाना/ सम्भव और असम्भव के बीच का फासला/ तर्क और समझ की फ्रेम में/ कसे चश्मे/नहीं देख पाए/ सपनों की छीजन।/ अव्यक्त सा कुछ/ भीतर लगातार बहता रहा /जैसे सूखी नदी की रेत के नीचे बहता है जल/ बाहर आने की / पुरजोर कोशिश के बाद भी / नाकाम और उदास ये पंक्तियां रक्षा दुबे की हैं जिनका ताजा कविता संग्रह ‘सहसा कुछ नहीं होताÓ हाल में आया है।

संवेदनशील मन में उपजी कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति है कविता संग्रह ‘सहसा कुछ नहीं होता।Ó भोपाल में जीएसटी विभाग में सहायक आयुक्त के पद पर पदस्थ रक्षा दुबे चौबे हृदय से सामाजिक कार्यकर्ता हैं और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जो उन्होंने देखा जाना और महसूस किया है, उसकी अभिव्यक्ति उनके काव्य संग्रह ‘सहसा कुछ नहीं होता में देखने को मिलती है। सुप्रसिद्ध लेखक विजय बहादुर सिंह ने लिखा-उनकी निगाह जितनी अनुभवप्रवण है, संवेदना उतनी ही तरल और मार्मिक। श्रीमती रक्षा दुबे सामयिक विषयों पर कविता, आलेख, लघुकथा लेखन में पारंगत हैं। जनजातीय चित्रकला, रेखांकन एवं फोटोग्राफी में उनकी विशेष रुचि है। सामाजिक क्षेत्र में भी उनकी बड़ी भागीदारी है। उनके संवेदनशील मन में उपजी कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति उनके नए कविता संग्रह ‘सहसा कुछ नहीं होता में देखने को मिलती है। सिहोरा (जबलपुर) में जन्मी रक्षा रसायन शास्त्र में एमएससी और विधि तथा समाजशास्त्र में वह स्नात्तकोत्तर उपाधि धारक हैं।

कविता संग्रह में स्त्री के दायरे को बढ़ाने की जिद है। स्त्री को स्त्री के साथ मनुष्य भी समझा जाए. इसे रक्षा दुबे ने काव्य संग्रह में कहने का प्रयास किया।
उन्हें यह भी कष्ट है कि बाजार पहले स्त्री की जद में था। लेकिन अब स्त्री बाजार की जद में आ गई हैं। सृजन शक्ति होने के बाद भी वह एक सस्ते मनोरंजन की वस्तु बन गई है। बकौल डॉ. विजय बहादुर सिंह-ये कविताएं स्त्री विमर्श के खाते में आती हैं। जिसमें स्त्री के प्रति गहरी करुणा और उसके प्रति अन्याय के विरुद्ध आक्रोश की बुदबुदाहट है। आश्चर्य तब होता है जब तुम अपने दांपत्य बोध में लौटकर इसके अत्यंत खूबसूरत पलों को टांकती हो और स्त्री-पुरुष संबंधों के आकांक्षित रूपों की रंगशाला सी रच देती हो।

रक्षा दुबे की कविता में आस पास के जीवन के दृश्य हैं, सुख हैं, दुख हैं, विडम्बना है और संघर्ष भी। काव्य संग्रह की भाषा में काफी संयम बरता गया है। इसलिए बहुत सी बातें अनकही सी रह गई हैं। लेकिन बिना कहे भी वह समझ में आती हैं। भाषा में सहजता है और पाठक वर्ग को बांधने की क्षमता भी। कुल मिलाकर इस काव्य संग्रह में जीवन के विभिन्न रूपों और रंगों की झलक साफ-साफ नजर आती है। रक्षा दुबे को अनेक सामाजिक एवं साहित्यिक पुरस्कार मिल चुके हैं। स्त्रियों के संवेदनशील विषयों पर उत्कृष्ट कार्य हेतु वर्ष 2017 में उन्हें महिला गौरव सम्मान पुरस्कार प्राप्त हुआ था।
पुस्तक-सहसा कुछ नहीं होता (कविता संग्रह) लेखिका-रक्षा दुबे, प्रकाशक-बोधि प्रकाशन

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