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अध्ययन कक्ष: एक अच्छी कहानी की चर्चा

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  • महेश खरे

कानपुर की साहित्यकार हैं मंजु मिश्रा। हाल ही में उनका कहानी संग्रह ‘वाग्दत्ता ‘ प्रकाशित हुआ है। वाग्दत्ता यानि ऐसी कन्या जिसका विवाह तय हो गया हो केवल फेरे बाकी हों। चार कहानियों वाला यह कहानी संग्रह बिलासपुर (छत्तीसगढ़) के बुकक्लीनिक पब्लिशिंग हाउस ने प्रकाशित किया है । पहली कहानी ‘आमंत्रण या अपेक्षा ‘ युवावस्था में ही संन्यास धारण कर घर छोड़ चुके पति के नाम पत्नी के एक पत्र में समाहित है। अकेली मां बारह साल के बेटे को पालती है। और अंत में बेटे के विवाह का आमंत्रण पति को भेजती है।

कहानी में आमंत्रण के साथ भेजे पत्र के माध्यम से एक अकेली स्त्री के संघर्ष और मनोदशा को बखूबी उभारा गया है। कहानी सवाल खड़े करती है कि कोई पति/पिता अपनी जिम्मेदारियों से कैसे भाग सकता है? अगर ऐसा करना ही था तो विवाह क्यों किया? भाषा और शैली की दृष्टि से सशक्त कहानी भोगा हुआ यथार्थ लगती है। कहीं कोई बनावट नहीं।

कहानी पढ़ी तो मन विषाद से भर गया। भावुक मन पर असर ऐसा हुआ कि कविता लिख गई। आप भी पढ़ें। वैसे ‘वाग्दत्ता’ फ्लिपकार्ट और अमेजन पर भी उपलब्ध है।/पुरुष के लिए/बहुत आसान होता है/जिम्मेदारियों को झटक देना/पुरुष कोई भी चेहरा लगा सकता है/ बुद्धजीवी का/आध्यात्म का/या और कोई चेहरा/जो उसे तथाकथित बंधनों से /मुक्ति दिलाने में सहायक हो/ऐसा चेहरा जो ‘भगोड़ा’ चरित्र को उजागर न होने दे/एक ऐसा आवरण/जो कर्महीनता को महानता का बाना पहनाए
संसार में रह कर संसार छोडऩे का ढोंग/कैसे शांति मिलती है ऐसी अध्यात्मिकता में
तुम्हें कापुरुष कहें या बुद्धिजीवी/जब सब कुछ छोडऩा ही था
अपनों से मुंह मोडऩा ही था/तो परिवार बसाया ही क्यों
एक औरत के सपनों को सजाया ही क्यों/जवानी में वानप्रस्थ के रास्ते पर चलने वाले
तुम तो साधारण व्यक्ति से भी गये बीते निकले/यह तो सोचा होता
तुम्हारी पत्नी और बेटा किसके सहारे जिएंगे/तुम तो दो जिंदगियों को
दोराहे पर छोड़ कर चल दिए/लेकिन जान लो/जिंदगी चेहरों मोहरों से नहीं/जीवटता से चलती है/हौसले से चलती है/चलेगी और अच्छी तरह चलेगी/हिम्मत जुटा सको तो मुड़कर देख भी लेना/ कोई अपेक्षा तो नहीं/लेकिन आमंत्रण है तुम्हें।

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