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भोपाल विलीनीकरण आंदोलन दिवस (1 जून) पर संघर्ष की याद : आजादी के बाद भी स्वतंत्रता के लिए लड़ा भोपाल

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भोपाल परिक्षेत्र हिमालय और नर्मदा के अस्तित्व से भी प्राचीन है । इस पर एक व्यापक शोध की जरूरत है । फिर भी रामायण काल या महाभारत काल ही नहीं वैदिक काल और प्रागैतिहासिक काल के चिन्ह भी यहाँ बिखरे पड़े हैं जो आधुनिक विकास में नष्ट हो रहे हैं । उत्तर से दक्षिण भारत जाने का मार्ग भोपाल होकर जाता है । वैदिक काल में महर्षि अगस्त्य इसी मार्ग से गये थे ।

  • रमेश शर्मा

एक समय था जब भोपाल परिक्षेत्र साधना और अनुसंधान स्थली रहा। लेकिन समय ने ऐसी करवट ली कि यह संघर्ष की स्थली बन गई । भोपाल में संघर्ष तेरहवीं शताब्दी से आरंभ हुआ जो 1949 में स्वतंत्रता के साथ समाप्त हो पाया। यह भी भोपाल की विडंम्बना है कि भारत भले 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हो गया था पर भोपाल न हो पाया था । भोपाल को लगभग पौने दो वर्ष और संघर्ष करना पड़ा ।

यदि हम भोपाल के अतीत पर दृष्टि डालें तो यह असीम पुरातन है । मनुष्य की समझ और शोध से भी प्राचीन । अनुमान है कि यहां चालीस लाख वर्ष पूर्व भी बसाहट रही होगी । भोपाल परिक्षेत्र हिमालय और नर्मदा के अस्तित्व से भी प्राचीन है । इस पर एक व्यापक शोध की जरूरत है । फिर भी रामायण काल या महाभारत काल ही नहीं वैदिक काल और प्रागैतिहासिक काल के चिन्ह भी यहाँ बिखरे पड़े हैं जो आधुनिक विकास में नष्ट हो रहे हैं । उत्तर से दक्षिण भारत जाने का मार्ग भोपाल होकर जाता है । वैदिक काल में महर्षि अगस्त्य इसी मार्ग से गये थे । भोपाल के आसपास वन्य क्षेत्र ही नहीं अपितु आज नगर की बसाहट के मध्य आ गयी दोनों पहाडिय़ों श्यामला हिल्स और नेवरी की पहाडिय़ों पर लाखों वर्ष पुराने शैल चित्र मिले हैं । यह ठीक वैसे ही हैं जैसे भोजपुर मंदिर या भीमबैठका पहाड़ी पर मिले । फिर भी यहाँ मौर्य कालीन, शुंग कालीन, गुप्तकालीन अवशेष अभी भी सुरक्षित हैं ।

भोपाल के अतीत और इतिहास पर दृष्टि डालने से तो बातें स्पष्ट होती हैं एक तो यही कि इसका विकास वैदिक काल में आरंभ हुआ और दूसरा यह कि भोपाल राजनीति या सत्ता का केन्द्र नहीं अपितु शिक्षा और साधना का केन्द्र रहा होगा । सत्ता का केन्द्र विदिशा रहा होगा बाद में रायसेन भी बना । लेकिन सत्ता मौर्यों की रही हो, या परमारों की इन लगभग बारह सौ वर्षों में भोपाल के स्वरूप पर किसी ने कोई छेड़छाड़ नहीं की । भोपाल पर पहला विध्वंसक आक्रमण तेरहवीं शताब्दी के आरंभ में अल्तमस ने किया । अल्तमस दिल्ली का सुल्तान था और मोहम्मद गोरी के गुलाम परंपरा में से एक । उसने सबसे पहले भोपाल सभा मंडल या संस्कृत पाठशाला ध्वस्त की थी । अल्तमस के बाद अलाउद्दीन खिलजी और औरंगजेब के विध्वंस का प्रसंग भी इतिहास के पन्नो में दर्ज है । बीच बीच में यहाँ से गुजरने वाले फौजी दस्तों ने भी सभा मंडल को निशाना बनाया । वह टूटता और बनता रहा लेकिन अठारहवीं शताब्दी अंत में वह स्थान रूपान्तरित हो गया अब वहां विशाल जामा मस्जिद खड़ी है ।

इसका निर्माण वैदिक कालीन रहा होगा इसके संकेत दो बातों से मिलते हैं । एक तो यह कि चौक क्षेत्र का निर्माण स्वास्तिक के आकार का है । और इसकी आधार शिलाएं शरीर के शक्ति चक्र के अनुसार । चौक से जो चार मार्ग निकलते हैं एक सोमवार, दूसरा इतवारा, तीसरा जुमेराती और चौथा इब्राहीमपुरा की ओर, यह सीधी रेखा में हैं इनके मोड़ समानान्तर हैं । यही नहीं अंतरिक्ष में जो ग्रहों की दिशा है उसी अनुरूप इनके मोड़ पर और आसपास पूरे नवग्रहों के आधार पर नाम हैं जैसे इतवारा, सोमवारा, बुधवार, शुक्रवारा, मंगलवार आदि । इनका कहीं व्यवस्थित उल्लेख नहीं है । इसका कारण यह नहीं है उल्लेख रखा नहीं गया बल्कि यह है कि उसे नष्ट किया गया । योजना से जलाया गया उन लोगों को मार डाला गया जो यह रिकार्ड रखते थे । दस्तावेज ही नष्ट न किये स्वरूप भी नष्ट किये गये । गांव और नगरों के नाम बदले, मंदिरों को तोड़ कर अन्य धर्म स्थल बनाये गये । यह आंधी सैकड़ो साल चली । भोपाल में तेरहवीं शताब्दी के आरंभ से लगभग साढ़े छ: सौ साल चली । इसलिये इस पुरातन स्थल का विधिवत व्यवस्थित विवरण उपलब्ध नहीं हैं । फिर भी दसवीं शताब्दी के परमार काल से बिखरी कडियाँ साफ मिल जातीं हैं

नबाबी काल और उससे मुक्ति

भोपाल में नबाबी की स्थापना अफगानिस्तान के दोस्त मोहम्मद खान ने की । दोस्त मोहम्मद खान एक सेना की टुकड़ी का नायक था । जो वहां एक हत्या करके भारत आया । मुगलों की टुकड़ी के साथ दक्षिण भारत रवाना हुआ लेकिन लौटते में सीतामऊ रियासत मे रुक गया । लेकिन हमने हिंसक स्वभाव से निकाला गया तो बैरसिया के पास मंगलगढ़ आ गया । यहां के राजा और रानी की रहस्यमय मौत हुई । कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उसमें दोस्त मोहम्मद खान का हाथ था । दोनों की मौत के बाद उसने मंगलगढ़ का खजाना लूटकर और उनकी बेटी का अपहरण कर बैरसिया भाग आया । मंगलगढ़ की लूट के पैसे से दोस्त मोहम्मद खान ने बैरसिया पट्टे लिया और जगदीशपुर के देवड़ा ठाकुर से दोस्ती की ।

एक दिन दावत पर बुलाया और शराब पिला कर मार डाला जितने दावत में लोग आये उन सबका कत्ल कर दिया गया। जिस स्थान पर कत्ल किया वह स्थान आज भी हलालपुर के नाम से जाना जाता है । जिस नदी किनारे यह घटना घटी उसका नाम हलाली नदी हो गया । इतना करके दोस्त मोहम्मद खान जगदीशपुर आया । लूट हुई । महिलाओं का अपहरण और पुरुषों की हत्या । उन्ही की जान बख्शी गयी जिन्होंने धर्मांतरण कर लिया । नगर का नाम जगदीशपुर बदलकर इस्लाम नगर रखा गया । जिसे आज भोपाल नगर कहते है इसके किनारे किला अवश्य था पर यह शिक्षा का केन्द्र था । रानी कमलापति की सत्ता का मूल केन्द्र गिन्नौरगढ़ था फिर भी यहाँ उनका किला बना था । वे यहां आकर ठहरती थीं । दोस्त मोहम्मद खान ने परिचय बढ़ाया । दोस्ती की । उनकी एक विवशता यह थी कि उनके देवर जो बाड़ी के शासक थे उनसे मतभेद इतने बढे कि रानी को वाह्य सहायता की आवश्यकता पड़ी । दोस्त मोहम्मद ने मौके का फायदा उठाया और अपने कुछ विश्वस्त सैनिक सुरक्षा के नाम पर तैनात कर दिये । और अंत में धोखा देकर 1715 में भोपाल रियासत पर कब्जा कर लिया विवश रानी ने छोटे तालाब में कूदकर प्राण दे दिये । रानी के गिरते ही दोस्त मोहम्मद ने बाहर बुर्जे पर आकर नमाज पढ़ी और संघर्ष आरंभ हुआ । वह संघर्ष ढाई दिन तक चला अंतत: भोपाल नबाबी में बदल गया ।

दोस्त मोहम्मद ने दूसरा काम किया पठानों और पंजाबी मुस्लिम समाज को यहाँ बुलाना उनहे जमीनें देकर बसाना आरंभ किया । दरबार के महत्वपूर्ण पद पुलिस सेना सिपाही सब में अफगान और पंजाबी । भोपाल में उन लोगों को भी कोई महत्व नहीं था जो नव धर्मान्तरित थे । नबाबी के विरुद्ध संघर्ष आरंभ हुआ लेकिन संगठित स्वरूप दहन ले पाया । पहले संगठित संघर्ष का वर्णन 1857 में मिलता है जो सीहोर छावनी, गढ़ी अंबापानी राहतगढ़ और भोपाल के लालघाटी क्षेत्र में हुआ । सबसे बड़ा नर संहार गढ़ी अंबापानी मे हुआ जहाँ माफी की घोषणा करके द्वार खुलवाये गये और किसी को जिन्दा न छोड़ा । इसके बाद नबाब का दमन चला जो 1901 तक जारी रहा । एक बार फिर बाहर से यहाँ बुलाकर बसाने का सिलसिला चला ।

आधुनिक संघर्ष का आरंभ कब से हुआ इसका ठीक से विवरण नहीं मिलता लेकिन 1920 में आर्य समाज की स्थापना और एक समूह द्वारा बड़े तालाब के किनारे शीतला माता मंदिर की मुक्ति का विवरण मिलता है । भोपाल रियासत का अंतिम नबाब दोस्त मोहम्मद खान ने अलीगढ़ से शिक्षा ली थी । नबाब की चालाकी का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि राष्ट्रीय स्तर पर उसके नेहरूजी जितने अच्छे संबंध थे उतनी निकटता अंग्रेजों से भी थी । लेकिन उसका दिल मुस्लिम लीग से मिला हुआ था । इसीलिये नबाब ने पाकिस्तान से मिलने की खुली घोषणा कर दी थी ।

भारतीय गणतंत्र में मिलने के लिये नबाब तैयार ही नहीं थे । भोपाल में सक्रिय आंदोलन का विवरण 1920 का मिलता है जब बच्चों को तैयार किया गया था स्कूल न जाने के लिये । 1922 में गांधी जी के खिलाफत आंदोलन का बी यहाँ असर हुआ । फिर 1925 में हिन्दु महासभा, 1938 मे प्रजा मंडल और 1940 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अस्तित्व में आने से संघर्ष अपेक्षाकृत तेज होता गया । लेकिन तनाव से भरे दिन 1946 से आरंभ हुये । तब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग के समर्थन में डायरेक्ट एक्शन का आव्हान किया था । 16 अगस्त 1946 मस्जिदों से भीड़ निकली और लूट विध्वंस आरंभ हुआ । उसकी शिकायत की गयी । मास्टर भैरो प्रसाद सक्सेना और भाई उद्धव दास मेहता ने नुक्सान का विवरण तैयार किया और सरदार पटेल को सौंपा उनकी पहल पर नबाब ने नुक्सान की भरपाई अपने खजाने से की ।

भारत की स्वतंत्रता का आभास नबाब को हो गया था। मई 1947 से विधिवत प्रक्रिया भी आरंभ हो गयी थी । तब नबाब ने एक चाल चली। उसने ब्रिटेन माडल का उदाहरण दिया और सभी संस्थाओं का प्रतिनिधि लेकर एक मंत्री मंडल बना लिया और सुप्रीम पावर अपने हाथ मे रखी । इसमें प्रजा मंडल, हिन्दू महासभा सहित लगभग सभी संस्थाओं के प्रतिनिधि थे । तभी 15 अगस्त को भारत को स्वतंत्रता मिली लेकिन नबाब ने केवल पाकिस्तान से मिलने की बात कही अपितु जिस जुमेराती के डाकखाने में आजादी का झंडा फहरा दिया गया था उसे गिरफ्तार कर लिया गया। इसका विरोध हुआ । तब नबाब ने वह मंत्री मंडल भंग करके नया मंत्री मंडल बना लिया। इसमें हिन्दु महासभा तैयार न हुई लेकिन प्रजामंडल के चार सदस्य शामिल हुये ।

इस मंत्री मंडल मे अवध नारायण विसारिया, चतुर नारायण मालवीय, कर्नल रशीद खान, के एल हैदर, महमूद हुसैन, बाबू कामता प्रसाद, जहूर हाशमी, लाला मुल्कराज और सेठ प्रताप मल थे । नबाब ने अपने मंत्रियों से कहा था कि वे यह अभियान चलायें कि जनता रियासत को भारतीय गणतंत्र में विलय का संघर्ष न करें । कुछ लोगों ने अभियान चलाया भी । तभी जनवरी 1948 में गांधी जी की हत्या हो गयी । नबाब को बहाना मिला । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दू महासभा सहित पूरी रियासत में लगभग दो हजार गिरफ्तारी हुई । इससे आंदोलन ठंडा पड़ गया । तभी जून 1948 में भाई रतन कुमार ने एक अखबार निकाला ‘नई राह।Ó इसमें नबाब और प्रजामंडल के नेताओं के बीच गुप्त समझौते का विवरण छपा था । इससे हंगामा शुरू हुआ ।

प्रजामंडल के नेता दो भागों में विभक्त हो गये । एक वर्ग आंतरिक आजादी तो चाहता था पर उसे समस्या न थी कि नबाब बने रहे लेकिन दूसरा समूह भारतीय गणतंत्र में भोपाल का विलय चाहता था । मामला नेहरूजी और सरदार पटेल तक पहुंचा । सरदार पटेल ने रुचि ली, सख्ती भी दिखाई, इसी बीच गाँधीजी की हत्या के बहाने गिरफ्तार हुये लोग भी रिहा हुये । आंदोलन ने जोर पकड़ा और नबाब को अपनी रियासत भारतीय गणतंत्र में विलय करने के लिये विवश होना पड़ा था । इस तरह भोपाल को स्वतंत्रता 1 जून 1849 को मिली।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। )

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