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भारत को आर्थिक शक्ति बनाने की दिशा में कदम

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  • वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थान बनाने की मोदी सरकार की नीति के सकारात्मक संकेत

कोविड संकट से जूझ रही दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में आर्थिक संकेतकों का विश्लेषण यह साफ बताता है कि अमृत महोत्सव का यह वर्ष भारत को विश्व की एक आर्थिक ताकत बनने की जमावट की और अग्रसर हो रहा है। सार यही है कि स्वाधीनता के इस अमृत महोत्सव का वर्ष विगत 75 वर्षों में सभी सरकारों के प्रयासों के फलित को प्रतिष्ठा देने और नए राजनैतिक -आर्थिक अवसरों की अनुकूलता को बहुगुणित करने को समर्पित होना चाहिए। आज वैश्विक परिस्थितियां भी अनुकूल हैं और उसे भुनाने के लिए मजबूत और संकल्पित सरकार भी हैं।

प्रो.जी.एल. पुणताम्बेकर , आर्थिक विश्लेषक व प्राध्यापक, डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर
glpuntambekar@yahoo.co.in

यह वर्ष देश की स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव का वर्ष है और इसलिए देश के विकास की दिशा और दशा के ऐतिहासिक विश्लेषण के साथ वर्तमान बदलावों पर विचार करना प्रासंगिक हैं – इसके लिए स्वतंत्रता से लेकर इस अमृत महोत्सव तक के काल की आर्थिक-राजनैतिक परिस्थियों और उसके फलित पर विचार करने के लिए इस विश्लेषण को सात चरणों में बांटना उचित लगता है:


प्रथम चरण: ( 1947 से 1975 तक )

भारतीय अर्थव्यवस्था का यह चरण स्वतंत्रता के बाद का वह चरण था जिसमें 200 वर्षों की अंग्रेजी शासन की लूट से ध्वस्त हुई अर्थव्यवस्था को सम्हालने के साथ उसे तेज विकास के पथ पर ले जाना था और इस लक्ष्य को पाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने उस समय में प्रचलित पूंजीवादी और समाजवादी व्यवस्था दोनों का लाभ लेने के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाई। इसे सफल बनाने के लिए सोवियत रूस की तर्ज पर पंचवर्षीय योजनाओं का खाका तैयार किया गया । इस काल में सार्वजनिक क्षेत्र में बड़े और आधारभूत उद्योग स्थापित किये गए और विकास को गति देने के लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। यह सरकारी नियंत्रण का काल कहा जा सकता है।


दूसरा चरण: ( 1976 से 1977 तक )

यह अल्पकाल राजनैतिक अस्तित्व के लिए संघर्ष का काल था और इसलिए आर्थिक मुद्दों की उपेक्षा हुई। यह काल पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के इलाहाबाद है कोर्ट के निर्णय से चुनाव रद्द होने और आपातकाल लगाये जाने का था। अर्थव्यवस्था की दृष्टि से यह समय असफलता का कहा जा सकता है।

तीसरा चरण: ( 1978 से 1991 तक )

यह काल राजनैतिक अस्थिरता का था और इसलिए अर्थव्यवस्था को सम्हालने के लिए आवश्यक निर्णय लेने की क्षमता इस काल की सरकारों में कम थी। इस अवधि में 7 प्रधानमंत्री बने और 2 प्रधानमंत्रियों की हत्या हुई । परिणाम यह हुआ कि अर्थव्यवस्था अपने सर्वकालिक विषम स्थिति में पहुंच गई, विदेशी मुद्रा भण्डार 15 दिनों के भुगतान की सीमा पर आ गया और देश को वैश्विक संस्थाओं से कर्ज लेने के लिए अपने 40 टन सोने को जहाजों में भरकर कर्ज की गारंटी के लिए गिरवी रखने जैसी अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा । यहीं से वैश्विक संस्थाओं के दबाव में सुधार आरम्भ हुए । आर्थिक विकास का राजनैतिक परिस्थितियों से कितना गहरा संबंध है वह इसी काल से जाहिर होता है। इससे यह भी साबित होता है कि आर्थिक सुधार यदि ऐसा विदेशी दबाव और मजबूरी में किया तो इससे देश के आर्थिक हितों से सरकारों को समझौता करना पड़ता है।

चौथा चरण: ( 1992 से 2008 तक )

यह काल आर्थिक सुधारों का था। इंस्पेक्टर राज पर लगाम लगी और निजी क्षेत्र की विकास में हिस्सेदारी बढ़ी जिससे भारत विकास की हिन्दू दर (अपेक्षाकृत कम ) की बदनामी से मुक्त हुआ। सोवियत संघ के विघटन के बाद इस काल में गेट और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं के माध्यम से वैश्विक व्यापार के नियमन का काम किया गया । परन्तु इस काल को भी दो भागों में बांटना उचित होगा । वर्ष 1999 से 2004 की अवधि की विकास दर में सोने के दामों में हुई वृद्धि की हिस्सेदारी 38′ शेयर के दामों की 32′ और रीयल इस्टेट के दामों में वृद्धि की हिस्सेदारी 21′ थी और कुल 160 लाख रोजगार सृजित हुए जबकि शेष अवधि (2004-2009 ) की विकास दर में शेयर मूल्यों में वृद्धि की हिस्सेदारी 311′ सोने के मूल्य की 330′ और रीयल ईस्टेट की हिस्सेदारी 200 ह्लश 2000′ थी। इस अवधि में केवल 27 लाख रोजगार ही सृजित हो सके। इसे अर्थशास्त्र की भाषा में ‘ जॉब लेस ग्रोथ अर्थात रोजगार न देने वाली विकास दर कहते हंै । सबक यह है केवल विकास दर की नहीं , समावेशी विकास लाने वाली नीतियां होनी चाहिए।

पांचवा चरण: ( 2009 से 2014 तक )

यह काल अमेरिका से समूचे विश्व में फैली आर्थिक मंदी जिसे ‘ सब – प्राइम क्राइसिसÓ कहा गया, से बदले वैश्विक आर्थिक हालात का था । इस वैश्विक आर्थिक संकट से दुनिया की 500 से अधिक बैंक दिवालिया हो गईं और पूंजीवाद के बड़े लम्बरदार अमेरिका को अपनी दो बड़ी कंपनियों को सार्वजनिक धन से बचाना पड़ा। इस घटना से पूंजीवादी व्यवस्था पर भी प्रश्न उठे जिसमें ‘लाभों का निजीकरण और हानियों का सार्वजनीकरण की मजबूरी पैदा हुई। इस अवधि में यह सुकून देने वाली बात थी कि इस वैश्विक मंदी से भारतीय बंैक और अर्थव्यवस्था कम प्रभावित हुई क्योंकि भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक आधुनिक गणितीय मॉडल आधारित नवाचारों से दूर थे। परन्तु इसका असर हुआ और इस अवधि में विकास दर दहाई अंकों से घटकर 4.7’ पर आ गई ।

मंदी के दबाव में दुनिया के सभी देश केंजियन मॉडल ( प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कीन्स ने 1939 महाआर्थिक मंदी में अधिकाधिक सरकारी खर्च बढ़ाकर मंदी से उबरने का उपाय बताया था ) अपनाने लगे और भारत पर भी इसका दबाव बना। एक और इस दबाव में सरकार जी.एस .टी. और प्रत्यक्ष कर सुधार कोड नहीं ला सकी और दूसरी और बड़े -बड़े आर्थिक घोटाले ( कुल राशि 2,26,000 करोड़ रुपये ) उजागर होने से सरकार दबाव में आयी। कुल मिलकर यह समय एक ऐसे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री का था जो परिस्थितियों के कारण अर्थव्यवस्था को अपनी क्षमतानुसार सुधार नहीं ला सका।


छठवां चरण: ( 2014 से वर्तमान तक )

इस काल में स्वतंत्रता के बाद पहली बार कांग्रेस पार्टी से भिन्न राजनैतिक दल भाजपा और उसके सहयोगी दलों की पूर्ण बहुमत वाली सरकार लगातार दो बार बनी जिसे पूरे पांच वर्ष चलने में कोई खतरा नही था । बड़े आर्थिक बदलावों के लिए यह प्राथमिक आवश्यकता है। यह बात बैकों के राष्ट्रीयकरण, बंगला देश युद्ध और संचार क्रांति जैसे पूर्ववर्ती सरकारों के संबंध में भी सही है। इस सन्दर्भ में जब मोदी सरकार के प्रथम और द्वितीय दोनों कार्यकाल का विश्लेषण किया जाए तो कुछ बातें बड़ी साफ दिखाई देती हैं। मोदी टीम प्रोफेशनल अंदाज में काम करती है जिसमें दीर्घकालीन योजना बनाई जाती है और फिर उस पर मजबूती से अमल होता है। उद्योगपति एवं स्ट्रेटेजिक एनालिस्ट गौरव प्रधान ने मोदी के सभी बड़े आर्थिक और दूसरे निर्णयों के क्रम और समय निर्धारण से इसे बखूबी समझाया है।

मोदी के प्रथम और द्वितीय कार्यकाल के सभी निर्णयों की तैयारी और क्रम में यह तथ्य साफ दिखाई देता है। तभी 370, 35 ए और ट्रिपल तलाक जैसे निर्णयों में भी सब कुछ वैसा ही हुआ, जैसा योजना के क्रम में था। ऐसा लगता है कि मोदी ने नीति बनाते समय देश ही नहीं, विश्व इतिहास से भी सीख ली है, जो यह बताती है कि निर्बाध आर्थिक विकास के लिए सैन्य और आर्थिक ताकत दोनों बराबरी से आवश्यक हैं। सोवियत संघ की नजीर सामने है जिसमें आर्थिक क्षेत्र में विफल होने पर उसकी मजबूत सैन्य ताकत भी उसे विघटन से नहीं बचा सकी।


अब मोदी के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के साथ 2047 के भारत का जो खाका तैयार किया है उसकी योजना भी इसी प्रकार चली तो लक्ष्य हासिल करना कठिन नहीं लगता। आज जब वल्र्ड इकोनोमिक आउटलुक इस वर्ष भारत की विकास दर विश्व में सर्वाधिक ( 8.5′ ) रहने के अनुमान कर रहा है तो यह भारत कोविड संकट से निपटने और इस संकट को अवसर में बदलने की जमावट को ही महत्व देकर कर रहा है। मोदी सरकार के दोनों कार्यकाल के निर्णयों में वर्षों से व्यवस्था को दीमक की तरह खाने वाले लाभार्थियों पर चोट कर देश के कृषि , उद्योग और व्यापार में बड़े बदलाव करने लक्ष्य साफ दिखाई देता है। मोदी विरोध का तो एक बड़ा कारण यही है। यह लक्ष्य कोविड संकट में भी डिगा नहीं है क्योंकि इस संकट के चार राहत पैकेज में खैराती स्वरूप के स्थान पर आधारभूत संरचना, बिजली -पानी जैसी व्यवस्थाओं में सुधार और छोटे और लघु उद्यमियों को ऋण और ब्याज में छूट अधिक दी गई है ।

चीन के एक विद्वान ने कहा था कि किसी को खाने के लिए मछली देकर सहायता करने के स्थान पर उसे मछली पकडऩा सिखाना अधिक उपयोगी होता है। मोदी के राहत पैकेज में यह तत्व साफ दिखाई देता है। बदलावों की फेहरिस्त में दिवालिया, कृषि, कर और श्रम कानूनों में बलाव की प्रकृति और अनेक कालातीत हो चुके कानूनों को समाप्त करने जैसे निर्णय ही वैश्विक स्तर पर हमारी ‘ईज और डूइंग बिजनेस की रेंकिंग बढ़ा रहा है तो वहीं ई- रूपी जैसे बदलावों से सामाजिक योजनाओं में वर्षों से मची लूट पर भी अंकुश लगाया जा रहा है।

कोविड संकट से जूझ रही दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में आर्थिक संकेतकों का विश्लेषण यह साफ बताता है कि अमृत महोत्सव का यह वर्ष भारत को विश्व की एक आर्थिक ताकत बनने की जमावट की और अग्रसर हो रहा है। सार यही है कि स्वाधीनता के इस अमृत महोत्सव का वर्ष विगत 75 वर्षों में सभी सरकारों के प्रयासों के फलित को प्रतिष्ठा देने और नए राजनैतिक -आर्थिक अवसरों की अनुकूलता को बहुगुणित करने को समर्पित होना चाहिए। आज वैश्विक परिस्थितियां भी अनुकूल हैं और उसे भुनाने के लिए मजबूत और संकल्पित सरकार भी हैं।

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