अध्यात्म और संगठनात्मक नैतिकता

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प्रो. हिमाँशु राय, निदेशक, आईआईएम इंदौर

भारतीय अध्यात्म दर्शन हमें एक ऐसा समृद्ध तंत्र प्रदान करता है जिसमें व्यापार और व्यावसायिक नैतिकता के आयामों की गहन चर्चा की गई है। वैश्वीकरण में भी इसकी विशेष भूमिका रही है, क्योंकि सुधारों और संशोधनों के बाद की इस दुनिया में कर्मचारी के संबंधों को नियंत्रित करने वाले प्रतिमान बदल गए हैं। पहले कर्मचारियों को आजीवन रोजगार, संस्थान प्रायोजित स्वास्थ्य योजनाओं और सेवानिवृत्ति पेंशन की सुविधा का लाभ मिलता था, लेकिन संशोधनों के बाद इनमें बड़ा बदलाव आया है। कर्मचारियों से अब बहुआयामी दलों में कार्य करने और अपने कौशल को लगातार विकसित करने की अपेक्षा की जाती है।

वैश्वीकरण ने पुनर्गठन को जन्म दिया है, जिसके परिणाम स्वरूप नौकरी के प्रति असुरक्षित भाव आता है और संगठन में प्रत्याशित संगठनात्मक परिवर्तनों में वृद्धि हो सकती है। यह आमतौर पर अधिक संख्या में शिकायत, छोडऩे का इरादा, कम होती संगठनात्मक प्रतिबद्धता, घटता विश्वास, नौकरी से संतुष्टि में कमी, प्रयासों में कमी और खराब प्रदर्शन की दिशा में संकेत देते हैं। यहां अध्यात्म न केवल संगठनात्मक व्यवहार के लिए दिशा निर्देश प्रदान करता है अपितु वैश्वीकरण प्रक्रियाओं के तनाव और अन्य नकारात्मक नतीजों को अवशोषित करने में भी सहायक होता है। भारतीय अध्यात्म दर्शन में भी संगठनात्मक नैतिकता और प्रशासन का वर्णन किया गया है। इसमें ‘अर्थÓ (धन और समृद्धि) का अध्ययन भारतीय अध्यात्म दर्शन और शास्त्रों के महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है, क्योंकि:- ‘ सर्वेषां शौचानां अर्थशौचं परं स्मृतम्Ó (मनुस्मृति:5/106)

(सभी नैतिक भावों में, पैसे से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण हैं)। इसके साथ ही,वैदिक शास्त्रों में से कौटिल्य रचित ‘अर्थशास्त्रÓ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह पुस्तक न्याय (सत्यरक्षा) और धर्म (नैतिकता) के दो स्तंभों को शासन की कला का आधार बनाती है। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में रचित इस पुस्तक में उन सभी विषयों और मुद्दों के विषय में जानकारी है, जिन्हें वर्तमान में संगठनात्मक न्याय सिद्धांत और नैतिकता के अध्ययन के रूप में प्रतिपादित किया जाता है। उदाहरण के लिए, सार्वजनिक सेवाओं के क्षेत्र में अर्थशास्त्र इंगित करता है कि सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए साप्ताहिक आधार पर अभिलेखों का लेखा-जोखा किया जाना चाहिए और सौंपी गई जिम्मेदारी, कार्य-उन्मुख होना चाहिए, न कि लक्ष्य प्राप्त करने पर केन्द्रित। धर्म, धन, लोभ के प्रति कोई भी रुझान या भय की भावना के निस्तारण के लिए प्रमुख सरकारी अधिकारियों पर निगरानी रखी जानी चाहिए। पुरस्कार प्रणाली और पदोन्नति, वेतन में कटौती आदि के प्रावधान प्रदर्शन पर निर्भर होने चाहिए, विशेषकर तब, जब प्रदर्शन संतोषजनक न हो।

अर्थशास्त्र में यह भी लिखा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी उपक्रमों को स्थापित किया जाना चाहिए और यदि आवश्यक हो, तो वांछित परिणाम प्राप्त करने के लिए, संस्थान की प्रगति और लक्ष्य प्राप्ति के लिए दबाव बनाया जाना चाहिए। विभिन्न कानूनों, स्वच्छता, व्यक्तिगत शुचिता, जुआ और वेश्यावृत्ति पर नियंत्रण, अनाथों और दिव्यांगों की देखभाल, खाद्यान्न और संबंधित उत्पादों के नियंत्रण और निरीक्षण, सिंचाई कार्यों, जल आपूर्ति, सामुदायिक परियोजनाओं, प्राकृतिक आपदाओं के दौरान आध्यात्मिक सहयोग, राजमार्ग, यातायात, सुरक्षा और कार्य और सार्वजनिक परिवहन के कार्यान्वयन के लिए प्रशासक जिम्मेदार और जवाबदेह होना चाहिए। इनमें से किसी भी गतिविधि को करने में चूक के दंडात्मक निहितार्थ होने चाहिए।

वैदिक दर्शन के सुझावों के समान ही,अर्थशास्त्र में वेतन के मुद्दों पर भी चर्चा की गयी है। उच्चतम वेतन मंत्रिपरिषद, सर्वोच्च पद के सरकारी अधिकारियों, सशस्त्र बलों के प्रमुखों और शिक्षकों को देय होना चाहिए। सार्वजनिक वित्त के लिए सोने के भंडार, राजस्व के स्रोत, आय और व्यय विवरण, राजस्व के अन्य स्रोत, कराधान की दर, छूट, वित्तीय तंगी के समय में नीति, और राजस्व के आकस्मिक स्रोतों के प्रावधानों का सुझाव देता है।

आधुनिक संगठनात्मक संदर्भ के लिए अर्थशास्त्र और अन्य अध्ययनों में अनंत समानताएं हैं। इसमें कार्य जिम्मेदारी साझा करने का भाव, सभी उम्र के सहकर्मियों लिए सम्मान, सामाजिक संपर्क, निष्काम कर्म, ईमानदारी और सच्चाई, बेहतर प्रदर्शन, ईमानदार व्यापार व्यवहार, समानता, अनुशासन और दंडात्मक प्रावधान, पदानुक्रमित स्तरों की आवश्यकता, अग्रणी की भूमिका और जिम्मेदारी, वित्तीय प्रबंधन, मजदूरी वितरण, और पारस्परिक संबंधों जैसे प्रमुख नैतिक आयाम शामिल हैं; जो कार्यस्थल पर दृष्टिकोण और व्यवहार के रूप में विकसित होते हैं।

जैसा कि भारतीय संगठनों में देखा जा सकता है, पदानुक्रमित परिप्रेक्ष्य, व्यक्तिगत संबंधों के लिए वरीयता, स्वयं के अन्य द्वंद्व के माध्यम से सामाजिक संपर्क का स्थापित होना, और सामूहिक अभिविन्यास, भारत में संगठनात्मक प्रभावशीलता को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, पर्यवेक्षकों द्वारा अधीनस्थों का विकास, सार्वभौमिकता की संगठनात्मक अपेक्षा और सहकर्मी नेतृत्व कुछ अन्य मुद्दे हैं जिनका उल्लेख भारतीय अध्यात्म दर्शन में किया गया है। अध्यात्म और धार्मिक ग्रंथों पर चिंतन के माध्यम से सुझाए गए इन नैतिक आयामों को भारतीय संगठनों को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए औद्योगिक लोकतंत्र के मूल्यों के साथ आत्मसात करने की आवश्यकता है।

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