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आध्यात्मिकता और जीवन

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प्रो. हिमाँशु राय, निदेशक, आईआईएम इंदौर

आध्यात्मिकता : एक शब्द जो संभवत: आस्तिक और नास्तिक, दोनों के लिए सामान रूप से महत्व रखता है । पंथ के अनुयायी इसके अस्तित्व का दावा करते हैं, इसका श्रेय भी लेने का प्रयास करते हैं; लेकिन किसी भी पंथ में विश्वास न रखने वाले और नास्तिक लोगों के लिए भी यह उतना ही महत्त्व रखता है और वे भी इसके अस्तित्व का श्रेय लेने का प्रयत्न करते हैं । यह कहा जा सकता है कि जहाँ विभिन्न पंथों के अनुयायी अक्सर इसे तथ्य मान कर स्वीकार कर लेते हैं वहीं भिन्न विचारों के बावजूद नास्तिक भी भरपूर उत्साह के साथ इसे स्वीकारते हैं। हम पंथ के आधार पर विभाजित कर दिए जाते हैं, यह हमारे रक्त से सम्बंधित माना जाता है; लेकिन अध्यात्म के आधार पर ऐसा कोई बंटवारा नहीं किया गया है । है न यह चिंतन वाली बात?

कई सामान्यजनों ने अध्यात्म महसूस किया है, कई कलाकारों ने पंथों की सीमाओं से परे अभिव्यक्ति के लिए इसकी शरण ली है, कई आस्तिकों ने इसे अपने पंथ में सभी अच्छाई का सार माना है और कई नास्तिक अपने अच्छे कर्मों में विश्वास को जाहिर करने के लिए अध्यात्म का सहारा ले चुके हैं ।

आध्यात्मिकता की प्रकृति सदियों से चिंतन और अध्ययन का विषय रही है और दार्शनिकों, विभिन्न पंथों के प्रमुख और विद्वानों द्वारा इसे कई रूपों में परिभाषित किया गया है । पश्चिमी दार्शनिकों ने इसे मानव विवेक की प्रकृति की खोज और समझ, और मनुष्य के अपने पर्यावरण के साथ संबंध को समझने के लिए आध्यात्मविज्ञान के नजरिए से देखने का प्रयास किया है । उन्होंने एक व्याख्यात्मक संश्लेषण के साथ आतंरिक और बाहरी वातावरण के संबंध को समझने का प्रयास किया है जिससे वे प्रकृति के सत्तामूलक प्रश्नों और स्वयं के उद्देश्य को बेहतर रूप से जान सकें ।

वहीं दूसरी ओर पंथ प्रमुखों ने इस अनन्य और अद्भुत गुण को मूल्यों, नैतिकता और उच्च आत्म की भावना से जोड़कर एक खूबसूरत सा रूप और ‘चेहरा देने का प्रयास किया – जिसने रहस्यमयता भी उजागर की है । शुरुआत अनुष्ठानों से हुई, फिर उनकी पहचान बनी और शायद इसी तरह पंथ ने ‘चेहरे वाली आध्यात्मिकता का रूप लेने का प्रयत्न किया होगा । लेकिन जैसे ही किसी भी वस्तु पर कोई मोहर या चिन्ह लगाया जाता है, मनुष्य उससे जुड़ जाता है और सम्बंधित हो जाता है; और वही वस्तु उस मनुष्य का ही एक तरह से पर्यायवाची बन जाती है, उसकी पहचान बन जाती है ।

संभवत: यही कारण है कि विद्वानों ने आध्यात्मिकता को पंथ से अलग करने की कोशिश की है, भले ही ये भेद आमतौर पर कभी-कभी अस्पष्ट रहे हों । इसका एक कारण यह हो सकता है कि मूल्यों, संस्कृति, रीति-रिवाजों और पंथों की संबद्ध अवधारणाएं इससे सम्बंधित चर्चाओं, लेखों और प्रवचनों को बहुत जटिल बना देती हैं ।

हालांकि, मेरे लिए यह बहुत स्पष्ट है कि अध्यात्म और पंथ दो अलग-अलग चीजें हैं । मेरे अनुसार पंथ के पालन के लिए एक सर्वशक्तिमान पूज्ययोग्य (या ईश्वर/देवताओं) में विश्वास और आस्था अनिवार्य है और अनुष्ठान और रीति-रिवाज़ भगवान की खोज और परोपकार की ओर ले जाते है; वहीं आध्यात्मिकता में ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है । यह किसी प्रकार के मापदंडों, या मानकीकृत अनुष्ठानों पर भी निर्धारित नहीं है, क्योंकि आतंरिक यात्रा में, सभी के अपने व्यक्तिगत अनुभव होते हैं ।

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