Home लेख पं. माधवराव सप्रे की 150वीं वर्षगांठ पर विशेष: विरासत का स्मरण

पं. माधवराव सप्रे की 150वीं वर्षगांठ पर विशेष: विरासत का स्मरण

48
0
  • लोकेन्द्र सिंह

मध्यप्रदेश में पत्रकारिता को आधार देने वालों में अग्रणी रहे माधवराव सप्रे का यह सार्धशती वर्ष है। यशस्वी पत्रकार माधवराव सप्रे के 150वीं जयंती प्रसंग पर पत्रकारों एवं पत्रकारिता के जुड़े संस्थानों ने उनके स्मरण के बहाने पत्रकारिता के मूल्यों, सिद्धांतों, दायित्व और प्रतिबद्धता को याद करने की ओर पहलकदमी की है। उनकी स्मृति में स्थापित सप्रे संग्रहालय प्रमुखता से एक आयोजन का निर्णय लिया है। वहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों से प्रणीत विश्व संवाद केंद्र, मध्यप्रदेश ने इस दिशा में अभिनव पहल कर संचार के अधिष्ठाता देवर्षि नारद जयंती से लेकर माधवराव सर्पे जयंती तक मूल्य आधारित पत्रकारिता पर एक विमर्श चलाया। सार्धशती मनाने का विचार भी उसकी ओर से आया।

अच्छी बात यह है कि माधवराव सर्पे की पत्रकारिता के मूल्यों एवं सिद्धांतों को वर्तमान पत्रकारिता में कैसे लाया जाए, इस बात का चिंतन करने के लिए विश्व संवाद केंद्र की प्रेरणा से पत्रकार बंधु निर्णायक भूमिका में आए। अपने पुरुखों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का यह भाव प्रत्येक पीढ़ी में होना चाहिए। मध्यप्रदेश के सागर जिले के पथरिया गाँव में जन्मे माधवराव सप्रे ने भारतीय पत्रकारिता को न केवल दिशा दी, बल्कि ओजस्वी संपादक एवं पत्रकार भी दिए। छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का जनक होने का गौरव उनके हिस्से हैं।

पत्रकारिता, साहित्य एवं भाषा के क्षेत्र में हिन्दी के फलक को विस्तार देने में उनके योगदान को हमें कदापि विस्मृत नहीं करना चाहिए। हिन्दी में सर्वश्रेष्ठ कहानियां कैसे लिख सकते थें, इसका उदाहरण उन्होंने स्वयं अपनी कहानियों से दिया। जिस समय माधवराव सप्रे ने पत्रकारिता एवं साहित्य के क्षेत्र में कदम रखे थे तब हिन्दी की दशा अच्छी नहीं थी। मिश्रित भाषा के नाम पर हिन्दी के स्वरूप को विकृत किया जा रहा था। तब उन्होंने न केवल हिन्दी के मौलिक स्वरूप को बचाया बल्कि उसके सौंदर्य से भी सबको परिचित कराया। यह सीखने और समझने की बात है कि माधवराव सप्रे की मातृभाषा हिन्दी नहीं थी, वे तो मराठी भाषी थे। पंरतु हिन्दी उनके लिए राष्ट्रीय अस्मिता एवं राष्ट्रीय एकता का आधार थी।

हिन्दी के प्रति उन्होंने अपने भाव को कुछ इस तरह व्यक्त किया- ”मराठी मेरी मातृभाषा है। मैं अपनी माँ की गोद में नहीं पला हूं। हिन्दी मेरी मौसी है और यही मुझे पाला-संभाला करती है इसीलिए जो कुछ भी मुझसे सेवा बनी, मौसी की ही कर पाया”। भाषा के नाम पर विवाद करने वालों को उनके इस वक्तव्य से सीख लेनी चाहिए। पत्रकारिता उनके लिए मनोरंजन का माध्यम नहीं थी। पत्रकारिता उनके लिए समाज को दिशा देने का माध्यम थी। समाज जागरण के उपक्रम के रूप में उन्होंने पत्रकारिता का उपयोग किया था।

ब्रिटिश सरकार की आलोचना में लिखे गए दो लेखों के लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा लेकिन इस प्रकार के संकट और संघर्ष ने कभी उनको कमजोर नहीं बनाया। सप्रेजी ने प्रखर राष्ट्रीय चेतना, गौरवशाली सांस्कृतिक और साहित्यिक परम्परा के बीच जीवन्त और समाजोन्मुखी पत्रकारिता का इतिहास रचा। निश्चित ही आज उनकी पत्रकारिता एवं जीवन का स्मरण करने का अवसर है।

Previous articleविजय माल्या के 6,200 करोड़ के शेयर बेचकर लोन की रिकवरी करेंगे बैंक
Next article‘भारत की एक राष्ट्रीयता’ का शंखनाद करने वाले पुरोधा

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here