कुछ अनुत्तरित प्रश्न : हाथों में  कलावा बंधा था हमलावरों के

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  • रमेश शर्मा
    भारतीय इतिहास पन्नों पर 26 नवम्बर 2008 का वह काला अध्याय है जिस दिन देश की औद्योगिक राजधानी समझी जाने वाली मुम्बई पर सबसे भीषण और सबसे सुनियोजित हमला हुआ था । इस हमले में प्रत्यक्ष हमलावर केवल दस थे पर तीन दिनों तक पूरा देश आक्रांत रहा । इस हमले को तेरह साल बीत गये लेकिन कुछ प्रश्नों का समाधान अभी तक नहीं हुआ, कुछ रहस्यों पर आज भी परदा पड़ा है । हमले का एक पहलू यह भी है कि एएसआई तुकाराम आँवले ने गोलियों से छलनी होकर भी आतंकवादी कसाब को जिंदा पकड़ लिया था । उनके प्राणों ने भले शरीर को छोड़ दिया, पर तुकाराम ने कसाब को नहीं छोड़ा था । कसाब की पकड़ से ही भारत यह प्रमाणित कर पाया कि इस हमले के पीछे पाकिस्तान का हाथ है । 
    आतंकवादी हमलों से तो कोई नहीं बचा, आधी से ज्यादा दुनियाँ आक्रांत है । अमेरिका इंग्लैंड और फ्राँस जैसे देशों में भी आतंकवादी हमले झेले हैं । इन सब हमलों के पीछे एक विशेष मानस और मानसिकता रही है। जो दुनिया को केवल अपने रंग में रंगना चाहती है । हालांकि अब तक हुये आतंकवादी हमलों में सबसे भीषण हमला अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड टाॅवर पर हुआ हमला माना जाता है । पर मुम्बई का यह हमला उससे कहीं अधिक घातक माना गया । यह आधुनिकतम तकनीक और सटीक व्यूह रचना के साथ हुआ था ।
    कोई कल्पना कर सकता है कि केवल दस आदमी सवा सौ करोड़ के देश की दिनचर्या तीन दिन तक हलाकान कर सकते हैं?
    ये कुल दस हमलावर थे,जो एक विशेष आधुनिकतम नौका द्वारा समुद्री मार्ग से मुम्बई पोर्ट पर आये थे । वे रात्रि लगभग सवा आठ बजे कुलावा तट पर पहुँचे थे । सभी एक ही वोट में आये थे । उनके हाथ में कलावा बंधा था और कुछ के गले में भगवा दुपट्टा भी दिख रहा था । सभी के पास बैग थे । ये जैसे ही पोर्ट पर उतरे मछुआरों ने देखा । उन्हें ये लोग सामान्य न लगे, न कर काठी में और न वेशभूषा में । सामान्यतः भगवाधारी ऐसी टीम नाव से कभी न आती । नाव भी विशिष्ट थी। इसलिये मछुआरों को उनमें कुछ अलग लगा । मछुआरों ने इसकी सूचना वहां तैनात पुलिस पाइंट को भी दी थी । किंतु पुलिस को मामला इतना गंभीर न लगा। जितना बाद में सामने आया । भगवा दुपट्टे के कारण पुलिस ने ध्यान न दिया और सभी आतंकवादी पोर्ट से बाहर आ गये । वे वहां से दो टोलियों में निकले, बाद में पाँच टोली बने । इन्हें पाँच टारगेट दिये गये थे। प्रत्येक टारगेट पर दो दो लोगों को पहुँचना था । ये टारगेट थे होटल ताज, छत्रपति शिवाजी टर्मिनल, नारीमन हाउस, कामा हास्पिटल, और लियोपोल्ड कैफे थे । कौन कहाँ कब पहुँचेगा यह भी सुनिश्चित था ।
    ये सभी रात सवा नौ बजे तक अपने अपने निर्धारित स्थानों पर पहुँच गये थे हमला साढ़े नौ बजे से आरंभ हुआ। इन्हें पाकिस्तान में बैठकर कोई जकीउर रहमान कमांड दे रहा था। जकी ने साढ़े नौ बजे ही हमले की कमांड दी। हमला 26 नवम्बर को आरंभ हुआ और 28 नवम्बर की रात तक चला । 29 नवम्बर को सरकार की ओर से अधिकृत घोषणा की गयी कि भारत हमले मुक्त हो गया । तब जाकर पूरे देश ने राहत की सांस ली। इस हमले में 166 लोगों की मौत हुई । घायल हुये जिन लोगों ने बाद में प्राण त्यागे उन्हें मिलाकर आकड़े दो सौ से ऊपर जाते हैं और तीन सौ अधिक लोग घायल हुये । आतंकवादियों से निबटने के लिए सुरक्षा बलों ने ऑपरेशन ब्लैक टोर्नेडो चलाया था । यह मुकाबला कोई साठ घंटे चला । अंतिम मुक़ाबला होटल ताज में हुआ था । होटल ताज के बाद सबसे अधिक क्षति और आतंक शिवाजी टर्मिनल पर आये दोनों आतंकवादियों ने मचाया ।

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