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आर्थिक स्वराज के लिए संकल्पों के साथ सामाजिक भागीदारी

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  • अर्थशास्त्री की भविष्यवाणी है कि भारत अगली सदी में एक आर्थिक महाशक्ति बनेगा

लोकतंत्र का अच्छा अनुभव होने के साथ विश्व प्रतियोगिता की पहली पंक्ति में खड़े दिखाई दे रहे हैं। फिर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। स्वतंत्रता और गणतंत्र को राम राज्य की अपेक्षा के रूप में देखा जाता है । ऐसी व्यवस्था जिसमें सबको आगे बढऩे और स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार हो । यह आज़ादी इस बात को रेखांकित करती है कि सुदूर गांव में जीवनयापन के लिए संघर्षरत निर्धनतम व्यक्ति न्याय की आशा रख सके । इस दृष्टि से आर्थिक स्वराज के लिए अभी भारतीय समाज और सरकारों को लगातार प्रयास करने होंगे ।

आलोक मेहता, आईटीवी नेटवर्क इण्डिया न्यूज़ ( हिंदी ) के सम्पादकीय निदेशक
alokmehta7@hotmail.com

‘आज़ादी का अर्थ स्वैछिक संयम , अनुशासन और कानून के शासन को स्वेछा से स्वीकार करना है। जब हम अपने जीवित रहने के अधिकार का पूरा मूल्य चुका देते हैं तभी आज़ादी पाते हैं। लोकतंत्र का अच्छा अनुभव होने के साथ विश्व प्रतियोगिता की पहली पंक्ति में खड़े दिखाई दे रहे हैं। फिर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। स्वतंत्रता और गणतंत्र को राम राज्य की अपेक्षा के रूप में देखा जाता है । ऐसी व्यवस्था जिसमें सबको आगे बढऩे और स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार हो । यह आज़ादी इस बात को रेखांकित करती है कि सुदूर गांव में जीवनयापन के लिए संघर्षरत निर्धनतम व्यक्ति न्याय की आशा रख सके । इस दृष्टि से आर्थिक स्वराज के लिए अभी भारतीय समाज और सरकारों को लगातार प्रयास करने होंगे ।

देश के सबसे बड़े उद्योगपति और आर्थिक क्षेत्र के स्वपनदर्शी जे आर डी टाटा ने 1992 में भारत रत्न मिलने के बाद एक सम्मा समारोह में कहा था – ‘एक अमेरिकी अर्थशास्त्री की भविष्यवाणी है कि भारत अगली सदी में एक आर्थिक महाशक्ति बनेगा। लेकिन मैं नहीं चाहता कि भारत आर्थिक महाशक्ति बने । मैं चाहता हूँ कि भारत एक सुखी देश बने। इसलिए आजादी के पचहत्तर वर्ष होने पर भी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार ही नहीं, विभिन्न प्रदेशों की विभिन्न पार्टियों की सरकारों , जिला स्तर से लेकर ग्राम पंचायतों तक को यह स्वीकारना होगा कि भौतिक दृष्टि से कोई सफलता या उपलब्धि तब तक उल्लेखनीय नहीं होगी जब तक वह देश की आवश्यकताओं या हितों को पूरा न करे तथा उचित और ईमानदार ढंग से प्राप्त न की गई हों । नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक प्रधान मंत्रियों ने लाल किले की प्राचीर से आजादी को अक्षुण्ण रखने , गरीबी , बेरोजगारी , महंगाई खत्म करने , गरीब मजदूरों और किसानों को अधिक समर्थ और आत्म निर्भर बनाने की बातें कहीं हैं । लेकिन यह काम क्या कोई एक सरकार पूरा कर सकती है ।

संघीय व्यवस्था में राज्यों से लेकर पचायतों तक के पास अधिकार हैं । लेकिन आजादी और अधिकारों के साथ कर्तव्य और जिम्मेदारियों का महत्व होता है । केवल सरकार या राजनीतिक दल की नहीं हर एक स्वतंत्र नागरिक की जिम्मेदारी होती है । यदि हम अपने दायित्व को महसूस नहीं करेंगे तो आजादी और लोकतंत्र को खतरा आएगा । आर्थिक स्वराज के लिए शिक्षा , स्वास्थ्य , रोजगार को सर्वोच्च प्रथमिकता की आवश्यकता है । दुर्भाग्य यह है कि आजादी के सात दशकों के बाद भी ब्रिटिश राज की तरह सरकारी नौकरियां पाने की लोगों की मानसिकता अब भी बानी हुई है ।

दुनिया के अन्य लोकतान्त्रिक देशों में भी सरकारी नौकरियाँ सीमित होती हैं । इसलिए शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाने और कौशल ( स्किल ) विकास को मोदी सरकार महत्व दे रही है । चीन की आर्थिक प्रगति का राज यही है कि उसने चार दशकों में कौशल विकास से उद्योगों ही नहीं खेती में भी युवाओं के लिए रोजगार उपलब्ध कराए और दुनिया में निर्यात के जरिये अरबों डॉलर कमाकर देश को विकसित किया । भारत ने आजादी के बाद दो बड़े युद्ध लड़े और आतंकवाद से लड़ाई अब भी जारी है । इसलिए सीमा सुरक्षा बलों , वायु सेना , नौ सेना तथा परमाणु शक्ति समपन्न होने पर बहुत खर्च हाल के वर्षों में किया है । लेकिन जब तक समाज अधिक शिक्षित , स्वस्थ्य और आर्थिक दृष्टि से सशक्त नहीं होगा , आजादी से मिले लोकतंत्र के लिए खतरे बढ़ते रहेंगें ।

कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया और सबको सबक भी मिल रहे हैं । सारी कठिनाइयों , सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं के बावजूद भारत की स्थिति अन्य विकसित संपन्न देशों से बेहतर रही है । सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस संकट में ग्रामीण क्षेत्रों के लोग कम प्रभावित हुए । इसका बड़ा कारण वहां वायु प्रदूषण कम होना और लोगों की इम्यून शक्ति अधिक अच्छी होना है । इसलिए आजादी का जश्न मनाते हुए प्रकृति की रक्षा के लिए पर्यावरण के प्रति अपने कर्तव्य को याद दिलाना चाहिए। राजनीतिक मतभेद तो हमेशा रहे , लेकिन इसकी कटुता से अराजकता के खतरे मंडराने लगे हैं ।

सामाजिक सद्भाव बिगाडऩे और अस्थिरता लाने के लिए विदेशी शक्तियां भी सक्रिय रही हैं । सीमा से अधिक खतरे बाहरी ताकतों को अपने देश में सहयोग देने वाले तत्वों और उनकी गतिविधियों से है । स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव में ऐसी शक्तियों से मुकाबले और आर्थिक स्वराज के लिए दृढ़ संकल्प हर भारतीय को लेना होगा।

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