Home लेख रुपहला पर्दा: मप्र से बहुत प्रेम था दिलीप कुमार को

रुपहला पर्दा: मप्र से बहुत प्रेम था दिलीप कुमार को

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(लेखक राजीव सक्सेना : फिल्म समीक्षा पटकथा लेखन और निर्देशन के क्षेत्र में तीस वर्ष से सक्रिय। दूरदर्शन के लिए टेलीफि़ल्म ‘केतकी ‘फिल्मी बतियां, ‘हमारे आसपास जैसे आधा दर्जन टीवी शो में निर्देशन और लेखन, दूरदर्शन वृत्तचित्र ‘मालवा का काश्मीर , ‘देवास : कल, कला और अध्यात्म का संगम और ‘मालवा की विरासत ‘पाषाण विरासत का साक्षी ‘श्वेतक्रांति 2000, ‘मालवा का कश्मीर जैसी 12 लघु फिल्मों का लेखन निर्देशन, एपिक चैनल के लिए लगातार दस टीवी शो का निर्माण, निर्देशन, लेखन।

  • राजीव सक्सेना



देश के दिल कहे जाने वाले मध्यप्रदेश के कई शहरों में कई कई बार आने की वजह से यूसुफ साहब उफऱ् दिलीप कुमार को यहां की कुदरती खूबसूरती …खान -पान और मेहमानवाजी से खास लगाव सा हो गया था। इंदौर के होल्कर राजवंश के वंशजों को फिल्मी सितारों की अवभगत का शौक सर्वविदित रहा है। लालबाग पैलेस में उस जमाने में इंदौर से जुड़े कॉमेडियन जॉनी वाकर साहब के माध्यम से देव आनंद, दिलीप कुमार का तमाम मौकों पर आना जाना होता रहा। पृथ्वीराज कपूर साहब अपने मशहूर ड्रामे ‘पठान’ के लिए इंदौर काफी समय तक रहे।

लता मंगेशकरजी के पिताजी दीनानाथजी को होल्कर महाराज ने अपनी नौटंकी टीम के साथ इंदौर का आमंत्रण दिया था। संयोग यही रहा कि उनके सपरिवार इंदौर प्रवास के दौरान लता जी का जन्म वहां हुआ। 1952 के आसपास, महबूब खान साहब की फिल्म ‘आन’ की टीम को होल्कर महाराज ने लालबाग पैलेस में ठहराया। आज के खजऱाना गणेश मंदिर के आसपास के कुछ बाहरी इलाकों में ‘आन’ के घोड़ों पर युद्ध के कुछेक दृश्य फिल्माये गए। बाद में होल्करों के जरिये राजगढ़ जिले की नरसिंहगढ़ रियासत में तत्कालीन महाराज के सौजन्य से वहां के किले में दिलीप कुमार, नादिरा, निम्मी और प्रेमनाथ जैसे अभिनेताओं पर कई महत्वपूर्ण दृश्य फिल्माये गए।

नरसिंहगढ़ के किले के पार्श्व में चिड़ी खों नामक जंगल में दिलीप कुमार और प्रेमनाथ ने आज प्रतिबंधित शिकार का लुत्फ उठाया। 1956 में बीआर चोपड़ा फिल्म ‘नया दौर’ की टीम लेकर भोपाल आये। तब नवाब खानदान के लोगों की मदद से भोपाल से होशंगाबाद के बीच सीहोर जिले के बुधनी कस्बे को लोकेशन बतौर चुना गया। ये वह दौर था जब यूसुफ साहब और मुमताज जहां उर्फ मधुबाला की मोहब्बत परवान चढ़ रही थी। दोनों के परिवार वाले इस मोहब्बत के दुश्मन थे। नया दौर में चोपड़ा साहब ने दिलीप कुमार के सामने मधुबाला को नायिका के रूप में लिया था लेकिन जब उनके परिवार को लम्बे समय बम्बई से बहुत दूर भोपाल के पास आउटडोर शूटिंग की बात पता चली तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया और उनकी जगह वैजयंतीमाला जी को हीरोइन लेना पड़ा…

बुधनी का जंगल तब दिलीप कुमार, जॉनी वाकर और अजीत जी के लिए शिकारगाह भी बना। खाली वक्त में जंगल में मंगल हुए दावतें होती रहीं। 1966 में एआर कारदार साहब के अपने बैनर की फिल्म ‘दिल दिया दर्द लिया’ का कारवाँ इंदौर के पास मांडवगढ़ शूटिंग के लिए पहुंचा। दिलीप कुमार वाहिदा रहमान के कई दृश्यों का फिल्मांकन मांडवगढ़ के जहाज महल रुपमती पैलेस में पास की बस्ती में किया गया।

मध्यप्रदेश की तीनों लोकेशन्स पर दिलीप कुमार साहब को एक – एक दो – दो महीने तक पूरी टीम के साथ रुकना पड़ा। मालवा के लोगों की अतिथि सत्कार की परम्परा और देसी खाना खाने का उन्हें खासा अनुभव हासिल हुआ। राजपरिवार की शाही दावतों में शामिल होने का अवसर मिला, मनपसंद शिकार के शौक पूरे होने के साथ शानदार पर्यटन स्थलों को नजदीक से देखने-रहने के मौके भी। विभिन्न पत्रकारों से अपने कई सारे इंटरव्यूज में… दिलीप कुमार ने मध्यप्रदेश से जुड़ी यादों को साझा किया।

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