Home लेख शिव-धनुष, जिस पर टिका था सीताजी का भाग्य

शिव-धनुष, जिस पर टिका था सीताजी का भाग्य

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विजय बुधोलि
सीताजी का विवाह, वस्तुत: कोई स्वयंवर नहीं था। अपितु वह राजा जनक के उस प्रण के अधीन था, जिसमें उन्होंने तय किया था कि जो कोई भी शिव-धनुष को तोड़ सकेगा, उसी को सीता पत्नीस्वरूप दे दी जाएगी। न जाने उन्होंने ऐसा प्रण किसके आश्वासन पर ले लिया था, जबकि उस समय समस्त देवताओं सहित अनेक महाबली राक्षस,असुर, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर और नाग जनकपुत्री को पाने के लिए लालायित थे। पद्मपुराण के अनुसार जनक को चिन्ता होती है कि राम के साथ सीता का विवाह किस प्रकार निश्चित हो। वह शिव-पार्वती से प्रार्थना करते हैं और शिव उसे ‘अजगव’ नामक धनुष प्रदान करते हैं, जिसे तोडऩे में केवल राम ही समर्थ होंगे। कृतिवास में भी जनक ही शिव-धनुष प्राप्त करते हैं। ब्रह्मा ने शिव से निवेदन किया था कि वह ऐसी युक्ति निकाल लें जिससे राम को छोड़कर किसी अन्य वर के साथ सीता का विवाह न हो। इस पर शिव ने परशुराम को अपना धनुष देकर आदेश दिया कि मेरा यह धनुष लेकर जनक के घर में रख देना और जनक से कहना कि वही सीता के साथ विवाह करे जो इस धनुष को तोड़ सके।
कश्मीरी रामायण के अनुसार शिव ने जनक को इस शर्त के साथ धनुष दिया था कि जो भी इसे चढ़ा सके,वही सीता के साथ विवाह करे। रामकेर्ति के अनुसार जनक ने सीता का अपूर्व सौंदर्य देखकर मंत्रों के द्वारा एक दिव्य धनुष की सृष्टि की थी और प्रण किया था कि जो यह धनुष उठाने में समर्थ होगा,उसी को मैं सीता को प्रदान करुँगा। जबकि सेरी राम के अनुसार देवताओं ने यह धनुष किसी महर्षि की अस्थियों से बनाया था, शिव ने उसे ब्रह्मा को दिया और ब्रह्मा ने सीता के जनक को दिया।
इस धनुष के निर्माण के सम्बन्ध में एक कथा यह भी है कि विश्वकर्मा ने दो धनुषों का निर्माण किया था, एक शिव के लिए और एक विष्णु के लिए। किसी दिन शिव और विष्णु में युद्ध होने वाला था कि विष्णु के हुंकार मात्र से शिव का धनुष ढीला पड़ गया और शिव हार गए। बाद में शिव ने अपना धनुष विदेह के राजा देवरात को दे दिया था और विष्णु ने अपना धनुष भृगुवंशी ऋचीक को। महाभारत के शांतिपर्व में माना गया है कि शिव ने अपने शूल को ही झुकाकर पिनाक में परिणित कर दिया था : ‘आनतेनाथ शूलेन पाणिनामित तेजसा। पिनाकमिति चोवाच शूलमुग्रायुध प्रभु:।।’
अनुशासन पर्व के अनुसार एक ही बाँस से पहले दो धनुष बनाए, एक शिव के लिए और दूसरा विष्णु के लिए। बाद में उन्होंने उसी बाँस के अवशेष से गाण्डीव बनाकर उसे सोम को प्रदान किया जो कि महाभारत के युद्ध के दौरान धनुर्धारी अर्जुन के काम आया।
वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के अनुसार देवताओं ने जनक सीरध्वज के पूर्वज देवरात को शिव का धनुष दे दिया था। किन्तु, परशुराम के तेजोभंग प्रसंग में कहा गया है कि शिव ने स्वयं ही देवरात को धनुष दिया था। अयोध्याकाण्ड में सीता अनुसूया से कहती है कि देवरात से प्रसन्न होकर वरुण ने एक धनुष प्रदान किया था। अध्यात्म रामायण, आनन्द रामायण, पद्मपुराण आदि में ऐसा उल्लेख भी है कि शिव ने उस धनुष से त्रिपुर को नष्ट किया था।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार वह धनुष इतना विशाल था कि पाँच हजार बलवान सेवक, धनुष की आठ पहिए की पेटी को कठिनता से खींच और ढ़केल कर यज्ञशाला में ला पाए। नृणां शतानि पंचाशद्वयायतानां महात्मनाम्। मञ्जूषामष्टचक्क्रां तां समूहुस्ते कथंचन।। अध्यात्म रामायण के अनुसार धनुष न केवल विशाल था वरन सुन्दर भी था। उस धनुष में सैकड़ों घंटियाँ बंधी हुई थीं तथा वह हीरे और मणि आदि रत्नों से सुसज्जित था।
‘घण्टाशत सभायुक्त मणि वज्रादि भूषितम्।’ उस धनुष का महात्म बतलाते हुए जनक ने महात्मा विश्वामित्र से,जो राम और लक्ष्मण के साथ धनुष यज्ञ के कार्यक्रम को देखने आए थे, कहा महात्मन् यह वह धनुष है जिस पर आज तक सारे देवता, असुर, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, नाग आदि भी उठाकर इस पर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा सके, तब मनुष्य की बात ही क्या है,जो इसे उठाकर इस पर प्रत्यंचा चढा सके। नैतत्सुरगणा: सर्वै नासुरा न च राक्षसा:। गन्धर्व यक्ष प्रवरा: सकिन्नर महोरगा:।। आनन्द रामायण तथा भावार्थ रामायण में कहा गया है कि जो शिव धनुष जनक के पास है, उससे परशुराम ने क्षत्रियों का 21 बार नाश किया था। जैन पउमचरियं के अनुसार चन्द्रगति वज्रावर्त नामक विद्याधर धनुष को मिथिला पहुँचा देते हैं और इससे राम के बल की परीक्षा होती है। एक अन्य वृतान्त के अनुसार सीता धनुष के साथ-साथ यज्ञ की अग्नि से उत्पन्न हुई थी।
आनन्द रामायण तथा भावार्थ रामायण आदि बहुत सी रामकथाओं के अनुसार सीता के शिव-धनुष उठा लेने के पश्चात् ही जनक ने प्रण किया था कि जो उस धनुष को तोड़ेगा, उसी से सीता का विवाह होगा। आनन्द रामायण में कहा गया है कि सीता के उस कार्य से जनक ने सीता के लक्ष्मी-अवतार होने का रहस्य जान लिया था। भावार्थ रामायण के अनुसार परशुराम ने जनक के महल में सीता को धनुष के साथ खेलते हुए देखा और जनक को यह सुझाव दिया कि जो धनुष को भंग करने में समर्थ हो, वही सीता का पति बने। रामचरित मानस में धनुष यज्ञ के अवसर पर राजा जनक के बंदीजन राजा की ओर से इस शर्त की घोषणा करते हैं कि इस अत्यंत भारी और कठोर शिव-धनुष को इस राज सभा में जो भी उठाकर तोड़ देगा,उसे तीनों लोकों की विजय का यश मिलेगा और जानकी उसके साथ बिना विचारे ही वरण करेंगी। किन्तु,यह ध्यान रहे कि यह वो धनुष है जिसे रावण और बाणासुर ने छुआ भी नहीं। ‘रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहि सिधारे।।सोई पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आज जोइ तोरा।। त्रिभुवन जय समेत वैदेही। बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही।।’
वाल्मीकि रामायण में सीता के स्वयंवर का उल्लेख किया गया है; उस अवसर पर बहुत से राजा शिव-धनुष चढ़ाने में असमर्थ रहे और उन्होंने बाद में मिथिला पर आक्रमण किया। उस घटना के बहुत काल बाद (सुदीर्घस्य तु कालस्य) राम ने धनुष तोड़ दिया और सीता से विवाह किया। तो ऐसी थी उस विशाल शिव धनुष की महिमा। तब भला जगतपिता राम के अतिरिक्त और कौन था जो उसे तोड़कर जग्दम्बा जनकनंदिनी सीता को अपनी भार्या बना सकता था।
(बुधौलिया रामकथा के अध्येता हैं।)

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