Home लेख शहीदे आजम भगतसिंह जयंती विशेष : क्रांतिदूत भगतसिंह के मुकदमे

शहीदे आजम भगतसिंह जयंती विशेष : क्रांतिदूत भगतसिंह के मुकदमे

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  • रंजना चितले, कथाकार व रंगकर्मी

भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन स्वाधीनता संग्राम के इतिहास का वह पक्ष है जिसने लोगों को शोषण के खिलाफ उठ खड़ा होने का आत्मबल प्रदान किया। लोगों में हथियार उठाने की क्षमता विकसित करने के लिये भारतीय क्रांतिकारियों ने श्रंखलाबद्ध धमाके किये और हंसते-हंसते फांसी के तख्ते पर झूले। वर्ष 1925 से 1931 तक चलने वाले क्रांतिकारी अभियान सामाजिक परिवर्तन का अनूठा इतिहास है।

स्वाधीनता संग्राम के इस जुनूनी जज्बे ने क्रांतिकारियों की पीढ़ी खड़ी कर दीं। वस्तुत: क्रांतिकारियों के धमाकों में काकोरी के बाद 17 दिसंबर 1928 को साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपतराय पर हमला करने वाले जेपी सांडर्स का वध करना तथा 8 अप्रैल 1929 को असेम्बली में पब्लिक सेफ्टी बिल व ट्रेड डिसप्यूट बिल के पास होने पर धमाकों के साथ दी गयी गिरफ्तारी ने अंग्रेजी राज के आतंक को तार-तार कर दिया। लाहौर षडयंत्र और असेम्बली बम कांड के नाम से मुकदमे चलाये गये। इन मुकदमों में सारे नियम कायदों को ताक में रखकर क्रांतिकारियों को दोषी ठहराया गया। भगतसिंह ने इन मुकदमों में अपने पक्ष से कोई वकील नहीं किया, खुद पैरवी की।

प्रस्तुत है शहीदे आजम भगतसिंह के पहले मुकदमे की कहानी-
असेम्बली बम केस की सुनवाई दिल्ली के सेशन जज की अदालत में 7 मई 1929 को प्रारंभ हुई। सरकारी वकील आर.बी. सूरज नारायण, मजिस्ट्रेट एक ब्रिटिश न्यायाधीश श्री एफ.वी. पूल थे। भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त को अदालत में लाया गया। उसी दिन 11 अभियोक्ता गवाहों की गवाहियां हुईं। प्रत्यक्ष रूप से एक भी गवाह वहां उपस्थित नहीं था।

अगले दिन, 8 मई 1929 को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में अदालत की फिर बैठक हुई। अभियोग पक्ष की गवाहियों के बाद भगतसिंह और बटुकेश्वरदत्त से अपने बयान देने को कहा गया, दोनों ने बयान देने से इंकार कर दिया। आगे सेशन अदालत में मुकदमा जून 1929 के पहले सप्ताह में शुरू हुआ। अभियोग पक्ष के साक्ष्य पूरे हो जाने के बाद 6 जून 1929 को भगतसिंह ने अपना बयान दिया हमारे ऊपर गंभीर आरोप लगाये गये हैं। इसलिये यह आवश्यक है कि हम भी अपनी सफाई में कुछ शब्द कहें – क्या वास्तव में असेंबली में बम फेंके गये थे ? यदि हां तो क्यों ? नीचे की अदालत में हमारे ऊपर जो आरोप लगाये हैं, वे सही हैं या गलत ?

पहले प्रश्न के पहले आधे भाग के लिये हमारा उत्तर स्वीकारात्मक है, लेकिन तथाकथित चश्मदीद गवाहों ने इस मामले में जो गवाही दी है, वह सरासर झूठ है। सार्जेंट टेरी का यह कहना कि उन्होंने हममें से एक के पास पिस्तौल बरामद की, एक सफेद झूठ है, क्योंकि जब हमने अपने आपको पुलिस के हाथों सौंपा, तो हममें से किसी के पास पिस्तौल नहीं थी। शक्ति-प्रयोग को न्यायसंगत बताते हुए उन्होंने कहा – जब किसी वैध आदर्श के लिये शक्ति-प्रयोग किया जाता है, तो उसका नैतिक औचित्य होता है।

इस घटना के सिलसिले में मामूली चोटे खाने वाले व्यक्तियों या असेंबली के किसी अन्य व्यक्ति के प्रति हमारे दिलों में कोई वैयक्तिक द्वेष की भावना नहीं है। इसके विपरीत हम एक बार फिर स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम मानव जीवन को अकथनीय पवित्रता देते हैं और किसी अन्य व्यक्ति को चोट पहुंचाने की बजाय हम मानवता की सेवा में हंसते-हंसते अपने प्राण विसर्जित कर देंगे। बयान का अंत इंकलाब जिंदाबाद के नारे के साथ किया।

मुकदमें की सुनवाई 10 जून 1929 तक चली और 12 को फैसला सुनाया गया। फैसला सुनाते हुए सेशन न्यायाधीश ने कहा- मैं अपने सम्मुख प्रस्तुत प्रत्यक्ष और मौखिक प्रमाणों को स्वीकार करता हूं कि भगतसिंह और बटूकेश्वर दत्त दोनों ने असेंबली में एक-एक बम फेंका, कि भगतसिंह ने पिस्तौल चलाई, कि दत्त ने असेंबली में पर्चे फेंके।

लगाये गये अभियोगों के संबंध में जो तथ्य जरूरी हैं, वे ये कि दोनों अभियुक्तों ने एक-एक बम फेका, और मैं इसे प्रमाणित किया गया मानता हूं। इन परिस्थितियों में इन युवकों को अपर्याप्त दंड प्रदान नहीं किया जाना चाहिये। मैं भगतसिंह और बटूकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास का दंड देता हूं।
(क्रमश:)

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