सावन शिवरात्रि कल : शीघ्र प्रसन्न होते हैं शिव

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योगेश कुमार गोयल, वरिष्ठ पत्रकार
mediacaregroup@gmail.com


देवाधिदेव भगवान शिव के समस्त भारत में जितने मंदिर अथवा तीर्थ स्थान हैं, उतने अन्य किसी देवी-देवता के नहीं। आज भी समूचे देश में उनकी पूजा-उपासना व्यापक स्तर पर होती है। यही नहीं, भगवान शिव और देवी पार्वती को समर्पित वर्षभर में दर्जनभर बार मनाया जाने वाला शिवरात्रि हिन्दू समुदाय का ऐसा मासिक पर्व है, जो त्रयोदशी को मनाया जाता है। शिवरात्रि को भगवान शिव का सबसे पवित्र दिन माना गया है, जो सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत भी है।

शिव और रात्रि का शाब्दिक अर्थ एक धार्मिक पुस्तक में स्पष्ट करते हुए कहा गया है, ”जिसमें सारा जगत शयन करता है, जो विकार रहित है, वह शिव है अथवा जो अमंगल का हृास करते हैं, वे ही सुखमय, मंगलमय शिव हैं। जो सारे जगत को अपने अंदर लीन कर लेते हैं, वे ही करुणासागर भगवान शिव हैं। जो नित्य, सत्य, जगत आधार, विकाररहित, साक्षीस्वरूप हैं, वे ही शिव हैं। पूरे साल मनाई जाने वाली शिवरात्रियों में से दो की मान्यता सर्वाधिक है, फाल्गुन महाशिवरात्रि और सावन शिवरात्रि।

प्राय: जुलाई या अगस्त माह में मानसून के सावन महीने में कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को मनाई जाने वाली सावन शिवरात्रि को कांवड़ यात्रा का समापन दिवस भी कहा जाता है। हरिद्वार, गौमुख, गंगोत्री, काशी विश्वनाथ, बैद्यनाथ, नीलकंठ, देवघर इत्यादि विभिन्न हिन्दू तीर्थ स्थानों से गंगाजल भरकर शिवभक्त अपने स्थानीय शिव मंदिरों में इस पवित्र जल से भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। हालांकि पिछले वर्ष की भांति इस वर्ष भी कोरोना की तीसरी लहर के डर के कारण कांवड़ यात्रा स्थगित करनी पड़ी है।

भारत में धार्मिक मान्यता के अनुसार सावन शिवरात्रि का बहुत महत्व है। इस दिन गंगाजल से भगवान शिव का जलाभिषेक करना बहुत पुण्यकारी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन तीर्थस्थलों के गंगाजल से जलाभिषेक के साथ भगवान शिव की विधि विधान से पूजा-अर्चना करने और व्रत रखने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं और उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। दाम्पत्य जीवन में प्रेम और सुख शांति बनाए रखने के लिए भी यह व्रत लाभकारी माना गया है।

सावन शिवरात्रि के दिन व्रत रखने से क्रोध, ईष्र्या, अभिमान और लोभ से मुक्ति मिलती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत कुंवारी कन्याओं के लिए श्रेष्ठ माना गया है और यह व्रत रखने से क्रोध, ईष्र्या, अभिमान तथा लोभ से भी मुक्ति मिलती है। भारत में शायद ही ऐसा कोई गांव मिले, जहां भगवान शिव का कोई मंदिर अथवा शिवलिंग स्थापित न हो। यदि कहीं शिव मंदिर न भी हो तो वहां किसी वृक्ष के नीचे अथवा किसी चबूतरे पर शिवलिंग तो अवश्य स्थापित मिल जाएगा। शिव के मस्तक पर अद्र्धचंद्र शोभायमान है, कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय समुद्र से विष और अमृत के कलश उत्पन्न हुए थे।

धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव के बारे में उल्लेख मिलता है कि तीनों लोकों की अपार सुन्दरी और शीलवती गौरी को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों और भूत-पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका शरीर भस्म से लिपटा रहता है, गले में सर्पों का हार शोभायमान रहता है, कंठ में विष है, जटाओं में जगत तारिणी गंगा मैया हैं और माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल (नंदी) को भगवान शिव का वाहन माना गया है और ऐसी मान्यता है कि स्वयं अमंगल रूप होने पर भी भगवान शिव अपने भक्तों को मंगल, श्री और सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं।

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