मुसलमानों के दिल में जगह बनाता संघविचार

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सरसंघचालक मोहन भागवत ने रखी राष्ट्रीय स्वयंसेवक की दृष्टि

मोहन भागवत जब-जब बोले हैं, उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वास्तविक चेहरा सामने रखा है। संघ जो नहीं है, उसके विरोधी वर्षों से वह छवि पेश करते आए हैं। भागवत ने संघविचार को अपने इतिहास, विरासत व दृष्टि से परिभाषित करने की बात कही है।

  • फिरोज बख्त अहमद

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने दिल्ली के मेवाड़ संस्थान में अपने भाषण में सभी को यह कहकर चौंका दिया कि हिन्दू और मुसलमान में कोई अंतर है ही नहीं। दोनों ही एक समान हैं क्योंकि दोनों ही एक धरती और एक समाज के पुत्र हैं। उन्होंने लिंचिंग करने वालों की जमकर खबर ली और उनको ‘आततायी और अतिवादी’ बताया। वे यहीं पर नहीं रुके, उन्होंने यह भी कहा कि अतिवादी कभी हिन्दू नहीं हो सकता और जो लिंचिंग करते हैं उनका हिन्दुत्व, आरएसएस और भाजपा से कोई लेना- देना नहीं है।

मोहन भागवत ने इस बार ही ऐसा नहीं कहा बल्कि जब-जब वे बोले हैं, उन्होंने संघ के वास्तविक चेहरे को दुनिया के सामने रखा है। संघ जो नहीं है उसे संघ बताकर विरोधी वर्षों ही नहीं, दशकों से पेश करते आए हैं। इसलिए संघ की एक ऐसी छवि गढ़ दी गई कि यह लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता का घोर शत्रु है और इसके प्रभाव बढऩे से मुसलमानों और ईसाइयों का अस्तित्व संकट में आ जाएगा। इन्हीं लोगों द्वारा इस छवि को फ़ासिस्ट और साम्प्रदायिक बनाकर देश के भीतर लगातार परोसा जाता रहा है।

हाल के वर्षों में वाममार्गी बुद्धिजीवियों और राहुल गांधी ने इसे दुनिया के सामने भी बेचना शुरू कर दिया था। इसके अतिरिक्त, संघ के साहित्य में कुछ न्यूनताएं दिखाकर और बाहर से समर्थन करने वाले कुछ लोगों द्वारा हिन्दू महासभा के अंदाज में विचारों को रखने को आधार बनाकर, इसका लाभ संघ के विरोधी संघ की छवि धूमिल करने के लिए उठाते रहे हैं।

भागवत ने कहा कि संघ के नाम में ‘सेना’ नहीं है, बल्कि ‘सेवा’ है। जापान के ओलिम्पिक खेलों में जो तमगे दिए जाएंगे, भारत के लिए यह गौरव का विषय है कि उन पर ‘स्वयंसेवक’ हिन्दी में ही लिखा हुआ है। उन्होंने बताया कि बौद्धिक बहस अवमानना की भाषा में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हो गई है। बहस में तथ्य और तर्क ग़ायब हो गए हैं जिनकी जगह धारणाओं ने ले ली है।

भागवत एक पुस्तक, ‘वैचारिक समन्वय: एक व्यावहारिक पहल’ के विमोचन के अवसर पर बोल रहे थे, जिसकी रचना, मुस्लिम विचारक ख्वाजा इफ़्ितखार अहमद ने की है। इसमें समकालीन भारतीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन के प्रतिमानों में बदलावों की सच्चाई को जानने के लिए वैचारिक मंथन से उपजा ऐसा ईमानदार प्रयास है जो उचित समय और उचित परिस्थितियों में किया गया है। पुस्तक में दर्शाया गया है कि अब मुस्लिमों को राजनीतिक क्षितिज पर उभर रही और सफल होती भगवा विचारधारा को समझ उनके साथ मिलकर भारत को अग्रणी राष्ट्र बनाने में अपने योगदान को सुनिश्चित करना है।

विमोचन कार्यक्रम में सरसंघचालक ने कहा कि लोग यह न समझें कि इस पुस्तक का विमोचन वोट बैंक की राजनीति के लिए किया गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सिर्फ राष्ट्रवाद के लिए काम करता है। राजनीति स्वयंसेवकों का काम नहीं है। संघ जोडऩे का काम करता है, जबकि राजनीति तोडऩे का हथियार बन जाती है। राजनीति की वजह से ही हिंदू-मुस्लिम एक नहीं हो सके हैं। संघ चुनाव में अपनी पूरी ताकत लगाता है लेकिन जो भी करता है राष्ट्र हित में करता है। उन्होंने कहा कि पुस्तक को बिना देखे ही मैंने इसके विमोचन के लिए हामी भर दी थी, क्योंकि इसमें प्रमाणिकता का आह्वान किया गया है। गाय एक पवित्र जानवर है लेकिन जो लोग दूसरों को मार रहे हैं, वे हिंदुत्व के खिलाफ जा रहे हैं। कानून को बिना किसी पक्षपात के उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।

भागवत के इस भाषण पर एक वरिष्ठ मुस्लिम अधिवक्ता अत्यब सिद्दीकी ने कहा कि क्या ही अच्छा होता कि यह भाषण पहले आ जाता और सभी संघ अधिकारी इस पर कार्यान्वित होते। बक़ौल भागवत, ‘हिंदू-मुस्लिम एकता शब्द ही भ्रामक है। हिंदू-मुस्लिम अलग हैं ही नहीं, हमेशा से एक हैं। जब लोग दोनों को अलग मानते हैं तभी संकट खड़ा होता है। हमारी श्रद्धा आकार और निराकार दोना में समान है।

हम मातृभूमि से प्रेम करते हैं क्योंकि यह यहां रहने वाले हर एक व्यक्ति को पालती आई है और पाल रही है। जनसंख्या के लिहाज से भविष्य में खतरा है, उसे ठीक करना पड़ेगा। कुछ लोग अल्पसंख्यक कहते हैं, हम कहते हैं, हम सब एक हैं। हम हिंदू कहते है’ आप भारतीय कहते हो। शब्दों की लड़ाई में नहीं पडऩा है। भारत को विश्वगुरु बनाना है। अल्पसंख्यकों के मन में यह बिठाया डर गया है कि हिंदू उनको खा जाएंगे। लेकिन जब किसी अल्पसंख्यक पर बहुसंख्यक अत्याचार करता है तो इसके खिलाफ आवाज भी बहुसंख्यक ही उठाता है।’


एक अन्य ऐतिहासिक सच्चाई को बयान करते हुए भागवत ने कहा कि भारतीय सनातन परंपरा और समाज 40,000 वर्ष प्राचीन है जिसके कारण यहाँ रहने वाले सभी लोग हिन्दू कहलाते हैं, भले ही वह धार्मिक रूप में न होकर सांस्कृतिक रूप में ही क्यों न हो। जिस प्रकार से जर्मनी में रहने वाले जर्मन कहलाते हैं, इंग्लिस्तान के निवासी इंगलिश कहलाते हैं, अरब वाले अरबी कहलाते हैं, उसी प्रकार से सभी हिंदुस्तानी भी हिन्दू कहलाए जाने चाहिए ‘हम उन्हें धार्मिक नहीं अपितु सामाजिक पहचान देना चाहते हैं, जिसके लिए सबसे उचित शब्द हिन्दू है और इस पर किसी भी सच्चे हिन्दुस्तानी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।’

बात तो ठीक है क्योंकि उन्होंने यह भी बताया कि हिन्दुत्व की जिस शुद्ध व पावन परंपरा को कई अनजान लोग दूषित करते हैं, यह जान लें कि बक़ौल, हेडगेवारजी, हिन्दुत्व कोई धर्म नहीं बल्कि जीवन व्यतीत करने का एक रास्ता है। संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) ने साठ के दशक में इसे महसूस किया था। तब उन्होंने प्रख्यात् मुस्लिम विद्वान और पत्रकार डॉक्टर सैफुद्दीन जिलानी को 30 जनवरी, 1971 को कलकत्ता में एक लम्बा साक्षात्कार दिया था। यह साक्षात्कार संघ की दृष्टि को अल्पसंख्यकों, राजनीति, आर्थिक प्रश्न, देश की संघीय व्यवस्था आदि पर केंद्रित था। यह साक्षात्कार संघ के स्वयंसेवकों के लिए संदर्भ बिंदु बना।

भारत के मुख्य इमाम उमैर अहमद इलयसी ने कहा कि लगभग पांच दशकों के बाद मोहन भागवत ने फिर एक बार सार्वजनिक तौर पर उन सभी आशंकाओं, संघ के प्रति विरोध के कारणों और संघ के उद्देश्य पर निर्णायक बातें की हैं। यही कारण है कि भागवत मुस्लिमों के दिल में भी अपनी जगह बना रहे हैं।

संघ ने सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों पर अपना रुख़ साफ़ किया है और बताया है कि इस दायरे से कोई भी बाहर या बहिष्कृत नहीं है। संघ के राजनीतिक हस्तक्षेप का पहला चरण छद्म धर्मनिरपेक्षता को परास्त करने का था। आज लगभग सभी राजनीतिक दल अपनी धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा को बदल रहे हैं। अल्पसंख्यक तुष्टीकरण और बहुसंख्यक की उपेक्षा, दोनों बातें जो पहले गैर-भाजपा दलों के आचरण में थीं, वे चमत्कारिक रूप से लुप्त होता जा रही हैं। यह संघ की वैचारिक जीत है।

भागवत ने संघ के विचार को सामने रखकर इसे अपने इतिहास, विरासत और दृष्टि से परिभाषित करने की बात कहकर संघ विरोधियों के सामने चुनौती फेंक दी है। संघ के वरिष्ठ नेता और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्शक इंद्रेश कुमार ने बताया कि यह कार्यक्रम अपने आप में ऐतिहासिक है। अब समय आ गया है कि मुस्लिम समाज आंखों से पट्टी हटाए और सबको गले लगाए। कट्टरता को छोड़कर आपसी भाई-चारे की राह अपनाए। उन्होंने इस पहल के लिए कार्यक्रम में मौजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत, सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल और सह संपर्क प्रमुख रामलाल को धन्यवाद दिया।
(लेखक राष्ट्रीय उर्दू विवि के कुलाधिपति हैं.)

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