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संदेशखाली के संदेशों को सुना जाना आवश्यक

  • डॉ वंदना गांधी
    मां माटी और मानुष के नारे के साथ पश्चिम बंगाल में स्थापित हुई सर्वभारतीय तृणमूल कांग्रेस के ‘राज’ में माँ माटी और मानुष तीनों बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। माँ काली को प्रथम देवी के रूप में पूजने वाली इस संस्कृति में महिलाओं की स्थिति संदेशख़ाली की घटनाओं से ही उजागर हुई है। राज्य सरकार संरक्षित नेताओं द्वारा किए जा रहे श्रृंखलाबद्ध अत्याचारों के बारे में इससे पहले देश दुनिया को पता भी न था कि और कालिंदी नदी के इस तटीय क्षेत्र में महिलाएँ योजनाबद्ध षडयंत्र के तहत किए जा रहे हैं दैहिक शोषण का शिकार हो रही थीं। किसानों और महिलाओं के साथ जो अत्याचार पूर्ववर्ती लेफ़्ट सरकार के लोग पश्चिम बंगाल में करते रहे उसे तृणमूल कांग्रेस ने और आगे ही बढ़ाया है। तृणमूल जो ‘सर्वभारतीय’ शब्द को छोड़ बैठी है और तुष्टीकरण की नीति के साथ माफ़िया समूह के साथ ‘राज’ कर रही है इसीलिए महिलाओं के शोषण की आवाज़ को दबाया जाता रहा। माफ़िया और गुंडों को सरकारी संरक्षण कितना अधिक है इसका पता इसी बात से लगता है कि हज़ारों करोड़ के घोटाले और महिलाओं के साथ जघन्य अत्याचार के आरोपी अपने जिला स्तर के एक कार्यकर्ता को पकड़ने में ही राज्य की पुलिस 55 दिन लगा देती है। बहरहाल संदेशख़ाली की घटना समाज को कई संदेश दे रही है जिन्हें सुनना और अमल में लाया जाना आवश्यक है।
    पश्चिम बंगाल के संदेशख़ाली क़स्बे का सचतब दुनिया के सामने आया जब आठ फ़रवरी को क्षेत्र की महिलाओं ने बड़ा प्रदर्शन किया। झाड़ू और लाठी हाथ में लेकर ये महिलाएँ इस ‘भद्रदेश’ में अपने साथ लंबे समय सेकिएजा रहे जघन्य दैहिक शोषण के विरुद्ध प्रदर्शन करने सड़क पर उतरी थीं। यह प्रतिरोध भी शायद सामने न आ पाता यदि पाँच जनवरी के ईडी पर हमले के घटनाक्रम के बाद मामले का मुख्य आरोपी शाहजहाँ शेख यहाँ से फ़रार न हुआ होता। तृणमूल कांग्रेस का नेता शाहजहाँ शेख़ लगभग 10,000 करोड़ रुपए के मनरेगा और राशन वितरण घोटाले का आरोपी है। इसीआर्थिक अपराध की जाँच करने के लिए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी)की टीम ने पाँच जनवरी को संदेशखाली में शाहजहाँ शेख़ के आवास पर छापा मारा था। तब सत्ता संरक्षित इस माफ़िया के गुंडों ने ईडी की टीम पर हमला कर उसके अधिकारियों को घायल कर मार भगाया था। शाहजहाँ तृणमूल में कितनी हैसियतरखता है इसे इस बात से समझा जा सकता है कि ईडी परहमले के बाद भी तृणमूल शाहजहाँ शेख का बचाव ही कर रही थी। शाहजहाँ का आतंक इतना ज़्यादा था कि उसके फ़रार होने के लगभग एक महीने बाद पीड़ित महिलाएँ अपनी आपबीती बताने का साहस जुटा सकीं।इन महिलाओं का दर्द है किसंदेशख़ाली क्षेत्र में ऐसी कौन महिला है जिसकी इज़्ज़त को शाहजहाँ शेख और उसके गुंडों शिवप्रसाद हज़ारा व उत्तम सरदार के हाथों तार-तार न किया गया हो। कभी बांग्लादेश से अवैध रूप से घुसपैठ करके आया शाहजहाँएक मज़दूर हुआ करता थालेकिनतत्कालीन सत्ताधारी लेफ़्ट पार्टी का कार्यकर्ता बनने के बाद उसने उन्हीं किसानों की ज़मीनों पर क़ब्ज़े शुरू कर दिए लेफ़्ट पार्टी जिनके दम पर बंगाल में शासन करती थी और ख़ुद को उनकी सबसे बड़ा हमदर्द बताती थी।वह किसानों से ज़मीन बटाई पर लेता और उसमें खारा पानी भर के झींगा मछली का उत्पादन करता। इससे मोटी कमाई होती लेकिन किसान के खेत खारे पानी से बंजर हो जाते थे।
    संदेशख़ाली का एक संदेशयह भी है कि पुलिस, प्रशासन और राज्य का जनता के प्रति क्या दायित्व होना चाहिए। क्या ये संस्थाएं किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं का बचाव करने के लिए हैं या जनता के अधिकारों की रक्षा करने के लिएहैं?इसकी पड़ताल कौन कर रहा है कि हमारे समाज में ऐसे शाहजहाँ शेख तो नहीं पल रहे हैं।यदि कहीं ऐसा हो रहा है तो अब दलगत राजनीति, भेदभाव और व्यक्तिगत लाभ-हानि छोड़कर पूरे समाज को साथ आने की आवश्यकता है जिससे ऐसा तीव्र प्रतिरोध खड़ा किया जा सके कि देश में कहीं दूसरा संदेश ख़ाली न बन सकेऔर कोई शाहजहाँ किसानों और स्त्रियों के साथ ऐसी बर्बरहरकत करने के बारे में सोच भी न सके।

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