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उन गुमनाम शहीदों को सलाम !

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पचहत्तर साल का सफर कोई कम नहीं होता। सैकड़ों साल की गुलामी के बाद जब हिन्दुस्तान आजाद हुआ था तो यकीनन संसार में उसे एक ऐतिहासिक घटना माना गया था। यूरोप और पश्चिम के अनेक विद्वानों ने तो भविष्यवाणी कर दी थी कि आजाद होने के बाद भारत एक लोकतांत्रिक देश के रूप में अधिक दिनों तक जिंदा नहीं रह पाएगा।


राजेश बादल,
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राज्यसभा टीवी के पूर्व कार्यकारी निदेशक है

पचहत्तर साल का सफर कोई कम नहीं होता। सैकड़ों साल की गुलामी के बाद जब हिन्दुस्तान आजाद हुआ था तो यकीनन संसार में उसे एक ऐतिहासिक घटना माना गया था। यूरोप और पश्चिम के अनेक विद्वानों ने तो भविष्यवाणी कर दी थी कि आजाद होने के बाद भारत एक लोकतांत्रिक देश के रूप में अधिक दिनों तक जिंदा नहीं रह पाएगा। लेकिन स्वतंत्रता के बाद की हमारी यात्रा ने साबित कर दिया है कि उन विशेषज्ञों की भविष्यवाणी आधारहीन और पूर्वाग्रहों से प्रेरित थी। इन पचहत्तर साल में बेशक हम एक महाशक्ति के रूप में उभरे हैं और समूचे संसार में आज हिन्दुस्तान की आवाज अपना खास अर्थ रखती है। निश्चित रूप से हम अभी मंजिल पर नहीं पहुंचे हैं और अनगिनत चुनौतियां सामने हैं। भारत की नौजवान पीढ़ी इनका सामना करेगी और राष्ट्र एक बार फिर सिरमौर बनेगा।

कहावत है कि अतीत में हमेशा सुनहरे भविष्य के बीज छिपे रहते हैं। इसलिए एक बार पीछे मुड़कर यह देखना जरूरी है कि अपने किन पुरखों की बदौलत हम यहां तक पहुंचे हैं। अगर उन लाखों ज्ञात-अज्ञात क्रांतिकारियों ने आजादी के यज्ञ में अपनी आहुति नहीं दी होती तो हम आज यहां तक नहीं पहुंचते। देश के दिल मध्यप्रदेश ने भी बरतानवी हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए अपने हजारों सपूतों को खोया है। आजादी के पचहत्तर बरस बाद हमारा यह फर्ज बनता है कि अपने उन पूर्वजों को याद करें और उन्हें अपनी धड़कनों का हिस्सा बनाएं।

यूं तो भारत की आजादी का आंदोलन 1857 से ही परवान चढ़ गया था,जब मेरठ से मंगल पांडे ने क्रांति की ऐसी मशाल जलाई,जिससे देखते ही देखते सारे हिंदुस्तान भर में विचारों के सैकड़ों सूरज दहकने लगे। इसके बाद गोरी हुकूमत ने छल बल और भय से आम अवाम को आतंकित करना शुरू कर दिया। विरोध में मध्यप्रदेश के गांव-गांव में आजादी के मतवाले सिर पर कफन बांधकर निकल पड़े। इनमें चांद थे ,सूरज थे,तारे थे और टिमटिमाते हुए जुगनू भी थे।

उन दिनों आज के मध्यप्रदेश जैसी भौगोलिक सीमा नहीं थी,फिर भी हम याद कर सकते हैं कि किस तरह मध्यभारत,चम्बल,बुंदेलखंड,विंध्यप्रदेश , महा कौशल ,मालवा और निमाड़ में देशभक्तों ने कुर्बानियां दीं। एक तरफ ग्वालियर में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपना बलिदान दिया तो दूसरी ओर निमाड़ के भावरा जैसे छोटे से आदिवासी गांव से चंद्रशेखर आजाद नामका ऐसा विलक्षण क्रांतिकारी पैदा हुआ ,जिसने गोरी सत्ता की चूलें हिला दीं।

जबलपुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वतंत्रता के आंदोलन में नई आग भरी तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मध्यप्रदेश की लगातार यात्राओं के माध्यम से यहां लोगों को अपने देश के लिए सत्याग्रही बनने की प्रेरणा दी। लेकिन आज उन गुमनाम शहीदों के योगदान को याद करेंगे ,जिन्होंने खामोशी से मादरे वतन के लिए अपना बलिदान कर दिया। उनके नाम भी हम शायद नहीं जानते मगर उनकी देश सेवा के किस्से भारत ही नहीं ,विश्व इतिहास में उन्हें अमर बनाते हैं। क्रांति की चिंगारी तो 1857 में ही सुलग गई थी और तब से 1947 याने नब्बे साल तक हर गांव ,कस्बा और शहर अपने स्तर पर जुल्मी शासकों से लड़ता रहा।

ऐसे में हर शहीद का नाम ही लिखना शुरू किया जाए तो एक ग्रन्थ तैयार हो जाए। इसलिए आज के मध्यप्रदेश में भौगोलिक तौर पर शामिल अलग-अलग क्षेत्रों के अनाम क्रांतिकारियों की चंद गाथाओं को ही समेटने का प्रयास किया गया है। शुरुआत बुंदेलखंड से करते हैं। इस इलाके में चरणपादुका नामक स्थान पर जो गोलीकांड हुआ ,वह जलियां वाला बाग के बर्बर हत्याकांड से भी भीषण और लोमहर्षक था। अफसोस ! हम चरण पादुका के शहीदों के बारे में अधिक नहीं जानते। अपनी पाठ्यपुस्तकों में भी हम इसको स्थान नहीं दे पाए हैं , लेकिन इस हत्याकांड ने समूचे बुंदेलखंड में गुलामी की जजीरों को तोडऩे के लिए लोगों को मजबूर कर दिया था और रामसहाय तिवारी बड़े लोकनायक के रूप में सामने आए थे। तिवारी जी को कम लोग ही जानते हैं लेकिन मेरा यह सौभाग्य है कि उनसे मैं मिला हूं।

वे चरण पादुका आंदोलन के सूत्रधार थे। और उनसे ही मुझे 1978 में इसकी पूरी कहानी सुनने का अवसर मिला था। तिवारी जी ने कुछ इस तरह उस घटना को याद किया ,’उन दिनों नौगांव में गोरी सरकार का पोलिटिकल एजेंट रहता था। यह स्थान सैनिक प्रशिक्षण का भी बड़ा ठिकाना था। बात 1930 की है,जब मिस्टर फिशर यहां पोलिटिकल एजेंट थे। वे आसपास की बुंदेली रियासतों पर रौब गांठते थे और राजे रजवाड़े उनकी जी हुजूरी करते रहते थे। अंग्रेज अनाप शनाप कर लगाने के लिए रियासतों को प्रोत्साहित करते थे। गरीब जनता इन करों के बोझ तले पिसती थी। इन करों में एक तो ऐसा था जो पिता के मरने पर उसके बेटे से चौथ की तरह वसूला जाता था। इसी तरह किसी विधवा का पुनर्विवाह हो तो उसे कर चुकाना पड़ता था। इसके अलावा जजिया कर ,चमड़ा कर,चुलियावन,गुलियावन,नजराना ,चुजयावन,मड़वा शादी ,ब्याई ,झरी ,मड़वा कास्त,जो खेत में लकड़ी की मड़ैया बनाने के लिए देना होता था। इसके अलावा हल जोतने के लिए उसमें लगी लकड़ी का कर भी चुकाना पड़ता था ।

रामसहाय तिवारी जी ने इसके विरोध में आंदोलन छेड़ दिया। वे चंद्रशेखर आजाद के संपर्क में थे और उनका भी इस आंदोलन को पूरा समर्थन था। चार सितंबर 1929 को पन्ना जिले के पांडव प्रपात में आजाद की अध्यक्षता में एक बैठक भी हुई थी। इसी आंदोलन में तिवारी जी को 2 साल की सख्त सजा भी हुई थी। उसके बाद उनका घर लूट लिया गया। उनकी संपत्ति कुर्क कर ली गई और उन्हें जेल में डाल दिया गया। आंदोलन तेज होता रहा और गोरी पल्टन उसे कुचलती रही। इस कड़ी में 14 जनवरी,1931 को उर्मिल नदी किनारे चरणपादुका स्थान पर मकरसंक्रांति का मेला चल रहा था। इसी मेले में आंदोलनकारियों ने अपनी बैठक बुलाई थी। तिवारी जी जेल में थे।

उनके स्थान पर लल्लूराम अध्यक्षता कर रहे थे। सभा में करीब 70000 लोग मौजूद थे। तभी इस काण्ड के खलनायक पोलिटिकल एजेंट मिस्टर फिशर पंद्रह गाडिय़ों में इंदौर से लाई गई सशस्त्र कोल भील पल्टन के साथ पहुंचे और चारों तरफ से घेरकर मशीनगनें तैनात कर दीं। सभा शांतिपूर्वक चलती रही। इसी बीच फिशर ने सभा पर गोली चालने का हुक्म दे दिया। निहत्थे गांव वालों पर ताबड़तोड़ गोलियों की बौछार होने लगी। सरकारी सूचना के मुताबिक 21 ग्रामीण मौके पर ही मारे गए। लेकिन गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार इसमें 100 से अधिक लोगों की हत्या हुई।

सैकड़ों लोग घायल हो गए। इस सामूहिक गोलीकांड में आंदोलन के छह निहत्थे नेताओं की लाशें बरामद हुई थीं। इनके नाम हैं – सेठ सुंदरलाल ,चिरकू महतों ,धर्मदास कुर्मी ,रामलाल कुर्मी ,हलके कुर्मी और रघुराज सिंह कटिया। इस आंदोलन के नेता रामसहाय तिवारी जेल से छूटे और कुछ दिन बाद फिर सलाखों के पीछे पहुंचा दिए गए। उन्होंने जिंदगी के करीब 25 साल कैद में काटे। इन गुमनाम शहीदों के बारे में कितने लोग जानते हैं। तब से आज तक हर मकरसंक्रांति पर चरण पादुका में बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं और अपने लाड़ले शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं –
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले / वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा /
बुंदेलखंड से सटे बघेलखण्ड में 1857 के क्रांतिकारी दल की कहानियां राष्ट्रीय स्तर पर भले ही लोग नहीं जानते पर इलाके के गांव-गांव में दल के शहीदों का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है। इस दल के मुखिया रणमत सिंह थे । वे 1857 में गदर के दरम्यान अंग्रेजी फौज में थे।

जब उन दिनों सैनिक छावनियों में गदर की रोटी पहुंची तो रणमत सिंह भी आजादी के आंदोलन में कूद पड़े। उनके साथ बल्लू सिंह,श्यामले ,श्याम शाह,मथानी लुहार,हसन खान और दशमत सिंह जैसे अनेक मतवाले थे। हमने इनमें से कितने लोगों का नाम सुना है ? लेकिन उस दौर में वे जान हथेली पर लेकर निकल पड़े थे। समूचे बघेलखण्ड में उन्होंने गोरी सरकार के छक्के छुड़ा दिए। उन्होंने नौगांव की अंग्रेज छावनी पर आक्रमण किया। डरकर लगभग सौ अंग्रेज अपने परिवारों के साथ जान बचाकर भाग निकले। जंगलों में भटककर अनेक गोरे अफसरों की जान चली गई। बचे खुचे इलाहाबाद के रास्ते किसी तरह कलकत्ता पहुंचे।

नागौद जेल पर इन क्रांतिकारियों ने 13 जुलाई ,1857 को हमला बोला और अपने 60 साथियों को छुड़ा लिया। इलाके में तैनात कैप्टन पी जी स्कॉट ने अपने रिकॉर्ड में लिखा कि क्रांतिकारियों ने जेल के प्रहरियों को भी साथ ले लिया था। इसके बाद वे फायरिंग करते हुए छावनी की तरफ बढ़े। उनके तेवर देखते हुए अंग्रेज नागौद से भाग निकले। उनकी पल्टन से भिलसाय, कुटरा, लमकुस ,तारा ,इटवा,करतल और वीरा स्थानों पर क्रांतिकारियों की जंग हुई। भिलसाय के युद्ध में रणमतसिंह घायल हो गए। फिर भी वे चित्रकूट,डमौरा में अंग्रेजों को छकाते हुए प्रयाग याने इलाहाबाद तक जा पहुंचे। क्योंटी के किले पर गोरी पल्टन के साथ जमकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में अंग्रेज कर्नल रणमत सिंह के हाथों मारा गया।

अनेक अंग्रेज सैनिक इसमें क्रांतिकारियों ने मार डाले। इसके बाद रहती और मरवास क्षेत्र में उन्होंने गोरी सेना से डटकर लोहा लिया।हालत यह हो गई कि अँग्रेज रणमत सिंह के नाम से थर थर काँपने लगे थे। हालाँकि अतीत के अध्यायों में भारतीयों की इन कहानियों का ब्यौरा कम ही मिलता है।इन जंगों में रण मत सिंह के अपने साथी भी बड़ी संख्या में शहीद हुए थे।वे दल का पुनर्गठन करना चाहते थे। इस नाते रीवा राज्य के गाँवों में जाना चाहते थे।उन्होंने रीवा के तत्कालीन महाराजा रघुनाथ सिंह से इस बारे में बातचीत की।

महाराजा ने सुरक्षा का हवाला देकर उन्हें रीवा बुलाया।पर, उनका दीवान दीनबंधु पांडे ग़द्दार निकला। उसने गोरों को खबर कर दी और रणमतसिंह को धोखे से बंदी बना लिया गया। इससे पहले उनके भतीजे अजीत सिंह और दाहिने हाथ श्याम शाह को दो गद्दारों के कारण शहीद हो गए थे।रणमत सिंह को गिरफ़्तार कर बांदा की जेल में भेज दिया गया। बांदा से वे कानपुर ले जाए गए। वहाँ अगस्त 1858 में उन्हें फाँसी दे दी गई। बघेलखण्ड के इस क्रांतिवीर का नाम आज़ादी के आंदोलन में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा।

बघेलखण्ड के बाद बढ़ते हैं महाकौशल की ओर।जबलपुर महाकौशल की राजधानी मानी जाती है। यह शहर हिंदुस्तान के स्वाधीनता संग्राम की अनेक कडिय़ों का प्रत्यक्षदर्शी रहा है।यहाँ के अनेक सेनानियों के बारे में हमने इतिहास की अनेक पुस्तकों में पढ़ा है, लेकिन 1857 में भी जबलपुर ने पूरे राज्य में सबसे पहले क्रांति की मशाल जलाई थी।

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