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विश्व शांति में शांति रक्षकों की भूमिका

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  • शांति अभियानों में संलग्न एक लाख से ज्यादा शांतिरक्षक

29 मई 1948 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा पहला संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन स्थापित किया गया था। उस समय इसरायल तथा अरब देशों के बीच फैली अशांति को दूर करने के लिए वहां यूएन द्वारा शांति रक्षक सैनिकों की तैनाती की गई थी।

योगेश कुमार गोयल

24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र अधिकार पत्र पर 50 देशों के हस्ताक्षर होने के साथ ही संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी, जो एक ऐसा अंतर्राष्ट्रीय संगठन है, जो अपनी स्थापना के बाद से ही विश्व शांति के साथ-साथ मानवाधिकार, अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति तथा अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को सुविधाजनक बनाने के लिए कार्यरत है। इसकी स्थापना द्वितीय विश्वयुद्ध के विजेता देशों ने मिलकर इस उद्देश्य से की थी ताकि संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष के मामलों में हस्तक्षेप करने से भविष्य में पुन: विश्वयुद्ध जैसे हालात न उभरने पाएं। इन देशों में अमेरिका, यूके, फ्रांस, रूस इत्यादि दुनिया के शक्तिशाली देश शामिल थे। संयुक्त राष्ट्र के संस्थापकों को उम्मीद थी कि वे इसके जरिये युद्ध को सदा के लिए रोक पाएंगे किन्तु 1945 से 1991 के शीत युद्ध के समय विश्व के विरोधी भागों में विभाजित होने के कारण शांति रक्षा संघ को बनाए रखना बहुत कठिन हो गया था।

29 मई 1948 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा पहला संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन स्थापित किया गया था। उस समय इसरायल तथा अरब देशों के बीच फैली अशांति को दूर करने के लिए वहां यूएन द्वारा शांति रक्षक सैनिकों की तैनाती की गई थी। संयुक्त राष्ट्र द्वारा अफ्रीका, अमेरिका, एशिया, यूरोप तथा मध्य पूर्व में 71 शांति अभियानों की स्थापना की गई। दुनियाभर में शांति बहाल करने में संयुक्त राष्ट्र के शांति रक्षकों की अहम भूमिका रहती है, जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपनी जान दांव पर लगाकर कार्य करते रहे हैं और फिलहाल विश्वभर में एक लाख से भी अधिक पुरूष व महिला बतौर शांति रक्षक यूएन के शांति अभियानों में संलग्न हैं, जिनमें विभिन्न देशों में करीब 96 हजार सैनिकों और पुलिसबल के अलावा लगभग 15 हजार आम नागरिक और हजारों स्वयंसेवक यूएन के शांति रक्षा मिशन में शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन में सबसे ज्यादा संख्या इथोपिया और बांग्लादेश के शांति रक्षकों की है और इन दोनों देशों के बाद इसमें सर्वाधिक योगदान देने वाले देशों में भारत है। फिलहाल सात हजार से भी अधिक भारतीय सैन्य और पुलिस जवान अफगानिस्तान, कांगो, हैती, लेबनान, लाइबेरिया, मध्य पूर्व, साइप्रस, दक्षिण सूडान, पश्चिम एशिया और पश्चिम सहारा में संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों में शांति रक्षा के लिए तैनात हैं।

जहां तक यूएन के शांति मिशनों में भारत की भूमिका की बात है तो सबसे पहले नवम्बर 1950 से जुलाई 1954 तक चले कोरियाई युद्ध के दौरान भारत की ओर से इस मिशन में 17 अधिकारी, 9 जूनियर कमीशंड अधिकारी (जेसीओ) तथा 300 सैनिक तैनात किए गए थे। भारत हथियारों से लैस एक दल को 1956 से 1967 के बीच संयुक्त राष्ट्र की आपातकालीन सेना में भेजने वाला देश भी बना था। उस अवधि के दौरान भारत की ओर से 393 अधिकारी, 470 जेसीओ तथा 12383 जवान संयुक्त राष्ट्र के मिशन में शामिल हुए थे। 1960 से 1964 तक चले यूएसओसी कांगो मिशन में भारतीय वायुसेना के छह कैनबरा बॉम्बर एयरक्राफ्ट भी तैनात किए गए थे, जिनमें 467 अधिकारी, 401 जेसीओ तथा 11354 जवानों ने हिस्सा लिया था और उस मिशन में 39 सैनिकों ने अपने प्राण भी गंवाए थे। 1992 से 1993 तक कम्बोडिया में भारत ने सीजफायर की निगरानी की थी तथा चुनाव के दौरान भी कम्बोडिया की सहायता की थी। उस दौरान भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र के इस मिशन में 1373 सैनिकों की तैनाती की गई थी।

संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 2002 में प्रस्ताव संख्या ए/ईएस/57/129 के जरिये आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए पहली बार ‘शांति रक्षा मिशन’ को अधिकार दिए गए और 29 मई को ‘शांति रक्षक दिवस’ के रूप में नामित किया गया, तभी से प्रतिवर्ष इसी दिन को ‘संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की अपनी कोई स्वतंत्र सेना नहीं होती और शांति रक्षा का प्रत्येक कार्य सुरक्षा परिषद द्वारा अनुमोदित होता है। यूएन के शांति रक्षा कार्यों में भाग लेना वैकल्पिक होता है और कनाडा तथा पुर्तगाल ही विश्व में अब तक सिर्फ दो ऐसे देश हैं, जिन्होंने प्रत्येक शांति रक्षा अभियान में हिस्सा लिया है। शांति रक्षक दल संयुक्त राष्ट्र को उसके सदस्य देशों द्वारा प्रदान किए जाते हैं, जो प्राय: ऐसे क्षेत्रों में भेजे जाते हैं, जहां हिंसा कुछ समय पहले से बंद है ताकि वहां शांति संघ की शर्तों को लागू रखते हुए हिंसा को रोककर रखा जा सके।

यूएन का शांति रक्षा मिशन इस साल अपनी 73वीं सालगिरह मना रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस का कहना है कि दुनियाभर में हिंसक संघर्षों में फंसे लाखों लोगों के लिए शांति रक्षा एक आवश्यकता एवं आशा है तथा शांति रक्षा को और ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए जरूरत है कि हम सब मिलकर इसके लिए काम करें ताकि लोगों को सुरक्षा दी जा सके और शांति को बढ़ावा मिल सके। उनका कहना है कि वैश्विक शांति और सुरक्षा में संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षा एक अहम निवेश है लेकिन इसके लिए मजबूत अंतर्राष्ट्रीय संकल्प चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा अब ‘एक्शन फॉर पीस कीपिंग’ पहल की शुरूआत की गई है, जिसका मूल उद्देश्य यूएन मिशनों को मजबूत, सुरक्षित और भविष्य के लिए उपयुक्त बनाना है। यूएन के पिछले 73 वर्षों के शांति रक्षक अभियानों में जहां अब तक दुनियाभर के 3800 से भी ज्यादा शांति रक्षकों ने अपने प्राणों की आहूति दी, वहीं इनमें भारत के शहीद हुए शांति रक्षकों की संख्या करीब 170 है, जो किसी भी अन्य देश के मुकाबले सर्वाधिक है। वर्ष 2017 में संयुक्त राष्ट्र के किसी भी शांतिरक्षक अभियान में भारत के किसी भी शांतिरक्षक को अपने प्राणों की आहूति नहीं देनी पड़ी थी।

अंतर्राष्ट्रीय संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षक दिवस वैश्विक शांति के लिए अपने प्राणों की आहूति देने वाले ऐसे संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षकों की स्मृति के सम्मान में मनाया जाता है, जिन्होंने शांति स्थापना में अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। इस दिन संयुक्त राष्ट्र के शांति प्रबंधन कार्यों में अपने उच्च स्तर की व्यावसायिकता, समर्पण और साहस का प्रदर्शन करते अपनी जान गंवाने वाले शांति रक्षकों को श्रद्धांजलि दी जाती है। शांति रक्षकों को मरणोपरांत ‘डैग हैमारस्जोल्ड मैडल’ प्रदान किया जाता है। यह पदक कर्त्तव्य निर्वहन के दौरान अदम्य साहस और बलिदान के लिए दिया जाता है। इस सम्मान की स्थापना वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र के दूसरे महासचिव डैग हैमारस्जोल्ड की स्मृति में की गई थी, जिनकी 1961 में एक विमान हादसे में मौत हो गई थी। शांति रक्षक अत्यधिक जोखिम उठाते हुए प्रतिदिन विभिन्न देशों में पुरूषों, महिलाओं और बच्चों की हिंसा से रक्षा करते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा 31 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं)

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