Home लेख कांग्रेस में सक्रिय डॉ. हेडगेवार का क्रांतिकारी संपर्क

कांग्रेस में सक्रिय डॉ. हेडगेवार का क्रांतिकारी संपर्क

37
0
  • स्वतंत्रता आंदोलन व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-2

डॉक्टर हेडगेवार की गिनती लोकमान्य तिलक के अनुयायी होने के कारण कांग्रेस के गरम दल में की जाती थी। नागपुर अधिवेशन के अध्यक्ष लोकमान्य तिलक बनें, इसका प्रयत्न डॉक्टर हेडगेवार व डॉक्टर मुंजे कर रहे थे, परंतु 31 जुलाई को तिलकजी के निधन के कारण इस इच्छा पर वज्रपात हो गया । हेडगेवारजी स्वदेशी, सामाजिक सुधार या समाचार पत्र के प्रकाशन एवं प्रचार-प्रसार में भी बढ़-चढक़र योगदान करते थे। कलकत्ता में रहते हुए उनका सम्बन्ध क्रांतिकारियों से भी आ चुका था।

  • नरेन्द्र जैन, प्रचार प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मध्यक्षेत्र
    narendra21021957@gmail.com

स्वामी विवेकानंद ने धर्मनिष्ठ, राष्ट्रसमर्पित और समाजभक्त युवाओं की कल्पना की थी। डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना कर विवेकानन्द के स्वप्नों को चरितार्थ करने का कार्य अपने हाथों में लिया। दुर्भाग्यवश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के समय से ही कांग्रेसी, संघ को सकारात्मक दृष्टि से नहीं देख पा रहे थे। प्रारम्भिक समय में ही इसका कारण स्पष्ट था। संघ संस्थापक संघ की स्थापना के पूर्व से ही कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता थे।

अपनी नि:स्वार्थ, सर्वस्व समर्पण की भावना से देश की स्वतंत्रता के लिये जीवन का एक-एक क्षण झोंकने की वृत्ति ने उन्हें निरपेक्ष नेता के रूप में स्थापित कर दिया था। 1922 में वे प्रांत के सह मंत्री के दायित्व को सम्हाल रहे थे। कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में वे वालंटियर्स का नेतृत्व करते हुए अधिवेशन की व्यवस्थाएं सम्हाल चुके थे। उसी समय प्रांतीय कांग्रेस द्वारा बनाये असहयोग मंडल में भी डॉक्टर साहब को सम्मिलित किया गया। कलकत्ता के ‘मॉडर्न रिव्यू’ ने मार्च 1921 के अंक में लिखा – स्वागत समिति की विषय नियामक समिति में प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया ‘कांग्रेस का ध्येय हिंदुस्तान में प्रजातंत्र की स्थापना कर पूँजीवादी देशों के चंगुल से विश्व के देशों की मुक्ति है।’ पत्र के अनुसार यह प्रस्ताव नागपुर नेशनल यूनियन के डॉक्टर हेडगेवार, विश्वनाथ केलकर आदि तरुणों की प्रेरणा से आया था।

यदि कांग्रेस में व्याप्त गुटों के आधार पर विचार करें तो डॉक्टर साहब की गिनती लोकमान्य तिलक के अनुयायी होने के कारण गरम दल में की जाती थी। नागपुर अधिवेशन के अध्यक्ष लोकमान्य तिलक बनें, इसका प्रयत्न डॉक्टर मुंजे एवं डॉक्टर हेडगेवार कर रहे थे, परंतु 31 जुलाई को तिलकजी के निधन के कारण इस इच्छा पर भी वज्रपात हो गया । इसके अतिरिक्त हेडगेवारजी स्वदेशी, सामाजिक सुधार या समाचार पत्र के प्रकाशन एवं प्रचार-प्रसार में भी बढ़-चढक़र योगदान करते थे।

कलकत्ता में रहते उनका सम्बन्ध क्रांतिकारियों से भी आ चुका था। डॉक्टर साहब ‘किसी भी कीमत पर’ मुसलमान को कांग्रेस के साथ लाने की संगठन में पनप रही प्रवृत्ति से असहमत थे। वे कहते थे ‘उस समय प्रत्येक प्रश्न की कसौटी मुसलमान को प्रसन्न करना बन गई थी।’ जब श्री बढ़े ने गोरक्षण को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने का आग्रह गाँधीजी से किया, तब कहा गया कि इससे मुसलमानों की भावनायें दुखेंगी। अत: कांग्रेस यह प्रश्न हाथ में नहीं ले सकती।

इस पर गाँधीजी ने श्री बढ़े से कहा-‘वे बैठक छोडक़र चले जाएं’, लेकिन जब बढ़े अपनी जि़द पर अड़ गये तो गाँधीजी ने अ. भा. कार्यकारिणी की बैठक ही स्थगित कर दी। इस घटना से डॉक्टर साहब के विचारों को बड़ा धक्का लगा। डॉक्टर साहब का मानना था कि देश में ईसाई, पारसी, यहूदी दूसरे लोग भी रहते हैं, फिऱ भी केवल हिंदू-मुसलमान की बात करने से मुसलमानों के मन में ‘वे अलग हस्ती रखते है’ का भाव जागृत होगा।

डॉक्टर साहब का मानना था कि इससे पृथकता का भाव उत्पन्न होगा। ऐसे ही नागपुर अधिवेशन की स्वागत समिति एवं विषय समिति के सदस्य के नाते उन्होंने पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव तैयार कर गाँधीजी के सामने रखा परंतु गाँधीजी ने यह कहते हुए कि ‘स्वराज में ही पूर्ण स्वतंत्रता का भाव समाहित है’, टाल दिया। तमाम असहमति एवं विरोध के बावजूद डॉक्टर साहब की मान्यता थी कि स्वतंत्रता का संघर्ष कांग्रेस के माध्यम से लड़ा जाना चाहिये, इसमें किसी भी प्रकार के मतभेद को आड़े नहीं देना चाहिए । जैसे विभिन्न नदी नाले अलग-अलग मार्गों से चलकर आगे बढक़र समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार विभिन्न प्रयत्नों का एक ही परिणाम होना चाहिये-देश की पूर्ण स्वतंत्रता।
कांग्रेस में सक्रिय होने के बाद भी उनके सम्बन्ध क्रांतिकारियों से बने हुए थे। वे गुप्त रूप से क्रांतिकारी गतिविधियों में संलग्न रहते थे। डॉक्टर साहब की मूल प्रकृति सशस्त्र क्रांति में विश्वास की ही थी।

वैद्यकीय की पढ़ाई के लिये कलकत्ता चुनने के पीछे भी यही कारण था। कलकत्ता को क्रांतिकारी आन्दोलन की काशी कहा जाता था। डॉक्टर साहब ने क्रान्तिकारी गतिविधि को अधिक गहराई से जानने और प्रशिक्षण के लिए कलकत्ता को चुना था। उनकी मान्यता थी कि जिस भी पद्धति से संभव हो स्वतंत्रता प्राप्त होना चाहिये। डॉक्टर साहब के शब्दों में ‘देश की स्वतंत्रता के लिये अंग्रेजों के जूते से पालिश करने से लेकर उसी जूते से उनका सिर लहूलुहान करने तक हमें कोई संकोच नहीं होना चाहिये।’

अपने कलकत्ता के आवास में डॉक्टर साहब क्रांतिकारी गतिविधियों से पूरी निष्ठा के साथ जुड़े रहे। वे पहले ही वर्ष में ही अनुशीलन समिति के अंतरंग सदस्य बन चुके थे। क्रांतिकारियों के बीच वे ‘कोकेन’ नाम से जाने जाते थे और विदर्भ और कलकत्ता के बीच कड़ी के रूप में काम कर रहे थे। अनेक बार वे कलकत्ता से नागपुर पिस्तौल-कारतूस आदि लेकर आते थे। नागपुर लौटने के बाद भी वे क्रांतिकारी गतिविधि का संचालन करते रहे थे। अप्पाजी जोशी,बाबूराव हरकरे,नाना जी पुराणिक सहित अनेक क्रांतिकारी डॉक्टर साहब के साथ क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करते थे। सांडर्स वध के बाद अपने फरारी के समय राजगुरु की व्यवस्था डॉक्टर साहब ने भैयाजी दाणी के गाँव के खेत पर की थी। गंगा प्रसाद और भाऊजी कांवरे डॉक्टर साहब के मित्र थे। डॉक्टर साहब उन्हें पूरी मदद करते थे। इसके साथ ही वे नागपुर की अन्यान्य संस्थाओं में पदाधिकारी भी रहे थे। (क्रमश:)

Previous articleसरकारी प्रक्रिया अगर कठिन, तब अनधिकृत कॉलोनियां बनने की संभावना अधिक: भूपेंद्र सिंह
Next articleतालिबान, शरिया कानून और भारत

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here