Home लेख स्मृति शेष: नरेंद्र कोहली का जाना: सांस्कृतिक पुनर्जागरण के युग प्रणेता

स्मृति शेष: नरेंद्र कोहली का जाना: सांस्कृतिक पुनर्जागरण के युग प्रणेता

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शिवकुमार विवेक /राकेश अचल

तीन दिन बाद रामनवमी है। ऐसे में रामकथा की सामयिक व्याख्या करने वाले नरेंद्र कोहली के जाने का समाचार दुखद तो है लेकिन उनकी रामकथा आधारित उपन्यासों की शृंखला उन्हें अमर कर गई है। तुलसीदास को हम जिस तरह हम तत्कालीन संदर्भों में याद करते हैं, नरेंद्र कोहली को भी उसी तरह आज के संदर्भों में याद किया जाएगा। सत्तर के दशक में जब उन्होंने दीक्षा, अभियान, युद्ध जैसे उपन्यासों के माध्यम से रामचरित को आधुनिक वैज्ञानिक समाज के सामने रखना प्रारंभ किया था तो नई और पुरानी पीढ़ी दोनों को वह अतिमानवी चरित्र एकदम सहज, अपने आसपास का महामानवी चेहरा लगने लगता था। तुलसीदास की भक्तिप्रवणता ने रामकथा में कई ऐसे प्रसंग और व्याख्याएं जोड़ीं, जो मानवक्षमता से परे प्रतीत होती थीं तो बाल्मीकि ने आध्यात्मिक पुट दिया। कोहली ने उसी कथा के मानवीय रूप को तराशा।

उन्होंने न ‘छुअत शिला भई नारी सुहाई कहा, न हनुमान को बंदर बताया और न उन्हें भौतिक पहाड़ उठाकर लाते दिखाया बल्कि अहिल्या को शिलावत, हनुमान वन-नर और पहाड़ को पहाड़-सा ढेर जैसे उपमान बताकर राम के सारे कामों को ऐसे रखा जैसे कोई महामानव कार्यों का संचालन करता है। ऐसे तमाम किस्सों को उन्होंने मानवीय क्षमता के दायरे में व्याख्यायित किया। सन् 1975 में उनके रामकथा पर आधारित उपन्यास ‘दीक्षा के प्रकाशन से हिंदी साहित्य में ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण का युग प्रारंभ हुआ जिसे हिन्दी साहित्य में ‘नरेन्द्र कोहली युग का नाम देने का प्रस्ताव भी जोर पकड़ता गया ।

तात्कालिक अन्धकार, निराशा, भ्रष्टाचार एवं मूल्यहीनता के युग में नरेन्द्र कोहली ने ऐसा कालजयी पात्र चुना जो भारतीय मनीषा के रोम-रोम में स्पंदित था। महाकाव्य का जमाना बीत चुका था, साहित्य के ‘कथा तत्व का संवाहक अब पद्य नहीं, गद्य बन चुका था। अत्याधिक रूढ़ हो चुकी रामकथा को युवा कोहली ने अपनी कालजयी प्रतिभा के बल पर जिस प्रकार उपन्यास के रूप में अवतरित किया, वह तो अब हिन्दी साहित्य के इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ बन चुका है। युगों युगों के अन्धकार को चीरकर उन्होंने भगवान राम की कथा को भक्तिकाल की भावुकता से निकालकर आधुनिक यथार्थ की जमीन पर खड़ा कर दिया। साहित्यिक एवं पाठक वर्ग चमत्कृत ही नहीं, अभिभूत हो गया। किस प्रकार एक उपेक्षित और निर्वासित राजकुमार अपने आत्मबल से शोषित, पीडि़त एवं त्रस्त जनता में नए प्राण फूँक देता है, ‘अभ्युदय में यह देखना किसी चमत्कार से कम नहीं था। कोहली का यह बड़ा अवदान था। हालांकि वे अच्छे साहित्यकार थे लिहाजा यह कार्य उनके कई रचनाकार्यों में से एक था। यह उनकी साहित्यिक यात्रा के एक युग का भी अंत है।

उन्होंने जिस युग की नींव रखी वो राष्ट्रवादी सांस्कृतिक साहित्य की थी। आधुनिक युग में नरेन्द्र कोहली ने साहित्य में आस्थावादी मूल्यों को स्वर दिया था। वह एक महान साहित्यकार थे लेकिन उनके भीतर हिन्दुस्तान का एक आम आदमी भी पूरी करुणा के साथ उपस्थित था। जब उन्हें बधाई देते हुए कहा गया -‘आपको नहीं लगता की पद्मश्री देने में सरकार ने कुछ देर नहीं कर दी ? कोहलीजी मुस्कराए, फिर मेरी ओर मुखातिब होकर बोले -‘ दे दी ये क्या कम बड़ी बात है, इससे पहले की सरकारों ने तो शायद मेरे नाम पर विचार ही नहीं किया !

कोहलीजी जाहिर है कि पहले की सरकारों से नाराज थे। पहले की सरकारें यानी कांग्रेस की सरकारें। वह मौजूदा सरकार के प्रति कृतज्ञ नजर आये, प्रधानमंत्री के प्रति उनके मन में एक स्थान था कोहलीजी ने सियालकोट, लाहौर वाया जमशेदपुर दिल्ली का सफर तय किया था। 81 साल की अपनी जीवन यात्रा में उन्होंने साहित्य की लगभग हर विधा पर काम किया। उर्दू से हिंदी में आये कोहलीजी पूरे तीन दशक वह अध्यापन के क्षेत्र में रहे। 1995 में उन्होंने सरकारी नौकरी से मुक्ति हासिल कर ली।

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