आधुनिक काल में जियो और जीने दो की प्रासंगिकता

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  • बलदेव राज भारतीय

अपने आपको आधुनिक या मॉडर्न कहने वाला मनुष्य इतना मॉडर्न हो जायेगा कि वह मनुष्य कहलाने लायक भी न रहे, ऐसी आधुनिकता भला किस काम की। स्वयं को सभ्य मानने वाला मनुष्य इतना असभ्य भी हो जायेगा यह विश्वास कर पाना भी कठिन होता है। वैसे तो मनुष्य कभी अपनी गलती स्वीकार नहीं करता क्योंकि वह स्वयं श्रेष्ठता के दंभ में जीते हुए स्वयं को सभी प्राणियों से श्रेष्ठ मानता है। …और उसकी श्रेष्ठता को कोई चुनौती दे यह उसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं। वह स्वयं को रूढि़वादिता से दूर और तर्कशील बताकर स्वयं वैज्ञानिक आचरण को अपनाने की बात कहता है। परंतु उसका अतिवादी व्यवहार इस सम्पूर्ण जगत के लिए विनाश का कारण बनता जा रहा है।

वह मानवता के सभी संस्कार भूल कर अपने स्वार्थ में इस कदर अंधा हो चुका है कि अपनी शक्ति के झूठे प्रदर्शन के लिए वह पृथ्वी जैसे ग्रह को दांव पर लगा चुका है। मनुष्य कर क्या रहा है? वह सम्पूर्ण विश्व के विनाश की तैयारी कर रहा है। रूस, चीन और अमेरिका जैसे देशों ने ऐसे ऐसे हथियार बना लिए हैं जिनसे संपूर्ण पृथ्वी को पांच पांच बार नष्ट किया जा सकता है। लेकिन क्या विज्ञान इतनी तरक्की कर गया है कि जिस पृथ्वी को वह पांच पांच बार नष्ट कर सकता है वैसी एक पृथ्वी बना सकता है? शायद नहीं।

तो फिर जिस वस्तु का मनुष्य निर्माण नहीं कर सकता, उसको नष्ट करने का हक उसे कैसे प्राप्त हो गया?मनुष्य के लिए आवश्यक है कि यदि उसे अपने आपको सर्वश्रेष्ठ बनाना है, सभ्य कहलाना है तो अपने सभी असभ्य आचरण छोड़ कर मानवता के धर्म का पालन करे। इस पृथ्वी को जीने लायक ग्रह बनाकर रखे। यह हथियारों की होड़ समाप्त हो। स्वयं भी जिएं और दूसरों को भी जीने दे। गांधी जी सहित विश्व के श्रेष्ठ विचारकों के विचार भी यही संदेश देते हैं।

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