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स्वभावत : क्रांतिकारी थे रासबिहारी बोस

  • शिवकुमार शर्मा
    अंग्रेज सरकार की चूलें हिला देने वाले क्रांतिकारी रासबिहारी बोस का नाम भारतीय स्वातंत्र्य आन्दोलन के क्रांतिकारियों की अग्रपंक्ति में आता है। उनका जन्म पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के सुबलदह गांव में 25 मई 1886 को बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम भुवनेश्वरी देवी तथा पिता का नाम विनोद बिहारी बोस था। उनका बचपन अपनी बहन सुशीला सरकार के साथ इसी गांव में व्यतीत हुआ। बचपन से ही अंग्रेजी सरकार के अत्याचारों को देखते,सुनते रहने उनके हृदय में देश भक्ति का प्रस्फुटन होने से अंग्रेजी सत्ता के प्रति आक्रोश उनके व्यवहार में समाहित हो गया था। 1905 के बंगाल विभाजन के समय से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने लगे थे । उनकी इच्छा थी कि बे ब्रिटिश फौज में भर्ती हों और वहां से सैन्य गतिविधियां सीख सकें ताकि भविष्य में अंग्रेजों के विरुद्ध लोहा लेने के लिए उस शिक्षा को काम में ला सकें। पिता नहीं चाहते थे कि फौज की नौकरी करें परंतु हठ कर के वह सेना में भर्ती होने के लिए गए परंतु किसी कारण से भर्ती नहीं हो सके तो शिमला छापा खाने में नौकरी कर ली। मालिक से झगड़ा हो गया तो नौकरी छोड़ दी । 1906 में 11 जून में वन विभाग के शोध संस्थान में दूसरी नौकरी की, वहां वे सरदार पूर्ण सिंह के सहायक के रूप में रहे । रसायन विभाग के प्रभारी के साथ काम करने के दौरान तमाम विस्फोटक रसायनों की जानकारी प्राप्त की जिनका उपयोग बम बनाने में हो सके। शिमला के टैगोर विला के एक कमरे केवल बम बनाने का काम होता था। यहां उनके साथ अतुल बोस ,हरीपद बोस शैलेन्द्र बनर्जी जैसे क्रांतिकारी जुड़े। यहां पर एक बारात में सम्मिलित होकर पहुंचे जितेंद्र मोहन चटर्जी से मुलाकात हुई जो एक क्रांतिकारी समिति के संघटक थे। वे पंजाब में भी क्रांतिकारियों से घनिष्ठ रूप से जुड़े थे। उनके माध्यम से रासबिहारी बोस उत्तर प्रदेश व पंजाब के क्रांतिकारियों से जुड़ सकें। 1908 में अरविंद घोष और जतिन मुखर्जी के साथ अलीपुर बम कांड में शामिल हुए ट्रायल से बचने के लिए बंगाल छोड़ना पड़ा। मां की बीमारी की खबर के कारण 1911 में माता जी का देहांत हो गया वहां कुछ दिन रुके। चंद्र नगर फ्रांसीसियों के अधिकार में था। यह क्रांतिकारियों का गढ़ था जब भी दूसरे राज्य में क्रांतिकारियों पर पुलिस का दबाव होता तो भी चंद्र नगर में आकर रहने लगते यहां बम बनाने के कई कारखाने और बड़े भंडार भी थे।यहां रासबिहारी बोस का संपर्क क्रांतिकारी शिरीश चंद्र बोस तथा मोहनलाल राय से संपर्क हुआ। 1937 में भारतीय स्वायत्त संघ की स्थापना की सभी भारतीयों का आह्वाहन किया तथा भारत को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया1942 में टोक्यो में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की ।
    भारत की स्वाधीनता हेतु एक सेना बनाने का प्रस्ताव पेश किया यहां से आजाद हिंद फौज की शुरुआत हुई ,जिसकी कमान बाद में सुभाष चंद्र बोस को सौंपी। नेशनल आर्मी इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की ही सैन्य शाखा थी। भारत की आजादी के पूर्व ही स्वाधीनता के साधक रासबिहारी बोस क्षय रोग के कारण 21 जनवरी 1945 को संसार से विदा हो गये। जापान की सरकार ने उन्हैं ‘द सेकंड ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन’से सम्मानित किया 26 दिसंबर 1967 को भारतीय डाक तार विभाग ने उनके सम्मान में एक विशेष डाक टिकट जारी किया।

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