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राजमाता : पुण्य स्मरण : ऐसी हो भाजपा सरकार की कार्यप्रणाली

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श्रीमती विजयाराजे सिंधिया ने कहा था-भाजपा के मंत्री व विधायक ऐसा आचरण करें जो अनुकरणीय हो

राजमाता का कुशाभाऊ ठाकरे को ऐतिहासिक पत्र


मध्यप्रदेश में 90 के दशक में भारतीय जनता पार्टी के हाथ में दोबारा प्रदेश की सत्ता आने के बाद राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री कुशाभाऊ ठाकरे को 5 फरवरी 1990 को एक पत्र लिखा जिसमें सरकार के कुशल संचालन तथा जनता और संगठन की अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। राजमाता ने अपने इस पत्र में उन गलतियों का खुलासा भी किया था जो पिछली कांग्रेस सरकारों ने कीं और अपेक्षा व्यक्त की कि भाजपा सरकार उन्हें न दोहराए। राजमाता की हिदायतें और सुझाव आज भी उतनी ही प्रासंगिक और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और मंत्रियों के लिए अनुकरणीय हैं। राजमाता का पत्र इस प्रकार है-


माननीय श्री कुशाभाऊ ठाकरे
महामंत्री भारतीय जनता पार्टी भोपाल

अंततोगत्वा मध्यप्रदेश की जनता ने भारतीय जनता पार्टी के हाथों में इस प्रदेश की बागडोर सौंप दी। ईकाई कुशासन के खिलाफ पार्टी के असंख्य कार्यकर्ताओं के कठोर परिश्रम, अविराम प्रयत्नों और सतत संघर्ष से ही यह स्थिति निर्मित हुई है। मध्यप्रदेश में हमारी सरकार की सफलता पूरे देश को ही भाजपा के प्रभाव क्षेत्र में लाने का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। उम्मीदों और अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए आज यह आवश्यक है कि जब हम सरकार बना रहे हैं तो हमारी सरकार का लक्ष्य, उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनाए जाने वाले मार्ग और उस मार्ग पर चलने के नियम अभी से सुनिश्चित कर लेना चाहिए। हमारे सामने गत 40 वर्षों का कांग्रेस शासन और उसकी विफलताएं हैं।

हमारे सामने हमारी पिछली सरकारें और उनके कार्यकलाप भी हैं। सर्वप्रथम तो मैं यह आग्रह करना चाहती हूं कि हमारी सरकार की कार्य संस्कृति कांग्रेस सरकार की संस्कृति से भिन्न होनी चाहिए। विगत वर्षों में कांग्रेस और भ्रष्ट नौकरशाही ने जो प्रक्रिया विकसित की है वही भ्रष्टाचार की जननी है। हमें ऐसी कार्य संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें त्वरित गति से काम हों तथा जनता का धन शत-प्रतिशत जनता के कामों में ही लगे। भ्रष्टाचारविहीन शासन प्रणाली, जनता के प्रति पूरी तरह जिम्मेदार रहने वाला प्रशासन तंत्र तथा संगठन के प्रति पूरी तरह जवाबदार रहने वाली कार्यपालिका और विधायिका यह हमारी सरकार के प्रमुख लक्षण होने चाहिए। इसे जातिवाद और भाई भतीजावाद के जहर से पूरी तरह मुक्त रखना अनिवार्य है।

हमें स्पष्ट समझना होगा कि केवल कुछ व्यक्तियों के लिए मंत्री पद या किसी और पद की गुदगुदी कुर्सी उपलब्ध कराने के लिए या उससे जुड़ी सुविधाएं मात्र जुटाने के लिए यह सरकार नहीं होगी। उनके रिश्तेदारों, जाति वालों या उनके इर्द-गिर्द मंडराने वाले लोगों के इशारों पर या उनके हितों के संरक्षण के लिए हमारी सरकार के फैसले नहीं होने चाहिए। अब जनता को इस तरह नाते रिश्तेदारों द्वारा चलने वाली सरकारों से सख्त नफरत हो गई है और जब भी उसे मौका मिलता है वह उन्हें सबक सिखाने से नहीं चूकती। मेरे कुछ सुझाव हैं-मंत्रियों का मार्गदर्शन करने के लिए या इनकी जवाबदारी सुनिश्चित करने के लिए एक सलाहकार समिति या संचालन समिति गठित की जानी चाहिए, जिसमें मुख्यमंत्री भी एक सदस्य हो।

चुनाव के दौरान हमने जनता को जो आश्वासन दिए हैं उनकी पूर्ति के लिए एक समयबद्ध कार्यक्रम बनाया जाना चाहिए और उसके क्रियान्वयन पर सतत निगाह रखने की भी व्यवस्था की जाना अनिवार्य है। मुख्यमंत्री और मंत्रियों की सहायता के लिए विभिन्न विषयों के जानकार सलाहकार मंडल या सलाहकार संगठन के स्तर पर नियुक्त होने चाहिए। प्रत्येक विभाग के लिए या कुछ विभागों को मिलाकर बनाए गए विभाग समूह के लिए ऐसे विशेषज्ञों को सलाहकार नियुक्त किया जाना चाहिए जो हमारे विश्वसनीय एवं शुभचिंतकों में हों। किसी योजना का पहले भूमि पूजन, फिर शिलान्यास, फिर उद्घाटन, जनता को समर्पण आदि अनेक नामों से प्रत्येक स्थान पर पत्थर लगाना और उनके नाम पर चाटुकारिता से परिपूर्ण भव्य समारोह आयोजित करना, जनता के धन का दुरुपयोग करना एक परंपरा का रूप ले चुका है।

यह परंपरा समाप्त होनी चाहिए। इसी तरह गार्ड ऑफ ऑनर, लाल बत्तियां, सरकारी वाहनों की लंबी चौड़ी कतारें, अधिकारियों द्वारा काम छोड़कर मंत्रियों के आगे पीछे भीड़ लगाकर घूमना, सरकारी साधनों का निजी कार्यों में दुरुपयोग करना आदि ऐसे कई मुद्दे हैं जिन पर हमारी सरकार को पहले दिन ही निर्णय लेना चाहिए और उस का कठोरता से पालन होना चाहिए। अनुभव कहता है कि हमारे विधायकों का अधिकांश समय स्थानांतरण और नियुक्तियों की सिफारिशों में जाता है और मंत्री के पास आने वाले आवेदनों में बड़ी मात्रा में यही प्रकरण होते हैं। इस प्रकार के प्रकरणों के निराकरण के लिए एक अलग व्यवस्था हो। कांग्रेस की सरकार में उद्योग का रूप ले चुके इस कारोबार ने प्रशासन को इतना प्रदूषित कर दिया है कि इसको रोकने का कठोर और पुख्ता इंतजाम करना चाहिए।

बहुमुखी व्यक्तित्व की महान नेत्री

भारत के सार्वजनिक जीवन में राजमाता जी का स्थान अतुलनीय है। ध्येय देवता के प्रति अविचल कर्तव्य के पथ पर अविराम यात्रा, अपने विश्वासों के लिए राजमहल के सुख उपभोग को तिलांजलि देकर कारागार की यात्रा को सहर्ष स्वीकार करने की उनकी सिद्धता, समाज के हित के लिए परिवार के मोह और ममता से मुंह मोड़ लेने का उनका मनोधैर्य नई पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक ही नहीं, भावी संतति के लिए अनुकरणीय भी सिद्ध होगा।

-अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्री

शुभ वस्त्रांकित, कृषकाय, सौम्य किंतु तेजस्वी मूर्ति राजमाता जी जब देवी के प्रति श्रद्धा विनम्र प्रणाम करके अपना संबोधन प्रारंभ करती तब ऐसा लगता कि साक्षात दुर्गा भवानी अपने सारे शस्त्र त्यागकर सौम्य परिधान पहने सारे संसार का मातृत्व अपने आंचल में समेटे प्रकट हो गई हैं। यह उनके ममतामयी व्यक्तित्व का चमत्कार है जिससे जन-जन में वह राजमाता के नाम से लोकप्रिय हुईं।

-सुमित्रा महाजन, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष

वे राजमाता अवश्य कहलाईं किंतु उनका स्वभाव, उनकी वृत्ति, उनकी कार्यशैली एवं उनके हृदय की विशालता उन्हें सहज ही लोकमाता के स्नेह मंडित सिंहासन पर विराजमान करती है। मुझे तो उन्हें केवल मां कहने में ही असीम तृप्ति का अनुभव होता है। वस्तुत: उनमें ममतामय मातृत्व का रूप साकार होता है। उनका व्यक्तित्व सांस्कृतिक, विशेषत: धार्मिक वृत्ति से विभूषित है।

-नानाजी देशमुख

राजनीति में रुचि रखने के कारण वे स्वाभाविक रूप से उस राजनैतिक दल के साथ जुड़ीं, जिसका देश की राजनीति में उन दिनों अप्रतिहत प्रभुत्व था। वे निर्वाचनों में सहजता से जीतती भी रहीं। इधर महलों की सुख-सुविधा और उधर सत्ता के गलियारों में सम्मान का स्थान होते हुए भी क्या हो गया कि उन्होंने सत्तारूढ़ कांग्रेस को त्यागकर कांटों से भरा पथ अपनाया? इसका कारण था उनका असीम संवेदनशील, परपीड़ा कातर स्वभाव और तात्कालिक राजनीतिक घटना।

-कुप सी सुदर्शन, पूर्व सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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