‘सर पे लाल टोपी रुसी..’ वाले राजकपूर का जूनून..

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विचार आया कि क्यों न इसे उस जगह पर शूट किया जाये, जहां से बम्बई की दूरी 420 मील है। जब खोज की गई तो ये दूरी मध्यप्रदेश के देवास से मक्सी जिला शाजापुर के बीच पाई गई जूनूनी राज साहब एक छोटी टीम को तैयार कर इसी जगह शूटिंग के लिए निकल पड़े…।

राजीव सक्सेना, धारावाहिक निर्माता व समीक्षक

त करीबन पैसठ बरस पहले शोमेन राजकपूर साहब के दिल में जब ‘श्री चार सौ बीस’ नाम से फि़ल्म बनाने खयाल आया तो उनके विचार को उनके पसंदीदा राइटर ने पटकथा का आकार दिया। नायक गांव का एक भोला भाला नौजवान सपनों की गठरी के साथ पैदल ही बम्बई की सड़क पकड़ लेता है। वहां जो कुछ बीता, उसकी दिलचस्प लेकिन संजीदा कहानी…।

फि़ल्म के लिए शैलेन्द्रजी के लिखे गीत…’ मेरा जूता है जापानी, पतलून इंग्लिशतानी.. सर पे लाल टोपी.. रुसी…फिर भी दिल है हिंदुस्तानी.. को फिल्म का शुरुआती गाना बनाने के फैसले के साथ इस गीत के साथ पहली बार आर के स्टूडियो से बाहर ही नहीं, हाइवे की आउटडोर लोकेशन पर फिल्माने का फैसला भी लिया।

विचार आया कि क्यों न इसे उस जगह पर शूट किया जाये, जहां से बम्बई की दूरी 420 मील है। जब खोज की गई तो ये दूरी मध्यप्रदेश के देवास से मक्सी जिला शाजापुर के बीच पाई गई जूनूनी राज साहब एक छोटी टीम को तैयार कर इसी जगह शूटिंग के लिए निकल पड़े। ठाणे से नासिक के बीच ही कहीं सड़क पर शूटिंग कर लेने के टीम के सुझाव को भी बताया जाता है कि राज साहब ने ठुकरा दिया। गीत का कुछ हिस्सा जरूर महाराष्ट्र की सीमा में फिल्माया गया लगता है।

तीन कारों और एक बड़ी लारी के साथ नासिक धुलिया होते हुए देर रात राज साहब का लवाजमा इंदौर के पास मानपुर पहुंचा, जहाँ इंदौर के एक वितरक की मदद से सरकारी डाक बंगले में राज साहब और टीम ने रात बिताई। मानपुर के डाक बंगले में लगी इस टीम की तस्वीर के पीछे की कहानी दूरदर्शन के मेरे फिल्म बेस्ड शो ‘फिल्मी बतियां के एक एपिसोड के लिए इस कस्बे के बुजुर्गों ने सुनाई।

एक बुजुर्ग ने यह भी कहा कि राजकपूरजी बम्बई के आसपास भी माइलस्टोन लगाकर गाने की शूटिंग कर सकते थे लेकिन धन्य है काम को लेकर उनका समर्पण, जो पांच सौ मील का सफर तय करके ठीक उसी जगह पहुंचे।
मक्सी – शाजापुर के बीच.एक जगह लकड़ी के चिन्ह बनवाकर लगाए गए, सिर्फ एक गीत के मुखड़े के लिए इतनी मशक्कत। इस कदर कवायद.. राजकपूर जी के ही बस की बात रही होगी। मक्सी के सरकारी डाक बंगले में भी उस फि़ल्मांकन के प्रमाण की तस्वीर फ्रेम की हुई मौजूद है।

आगरा – बंबई राजमार्ग पर उस वक्तत गुजर रहे राजस्थानी चरवाहों को देखकर राजकपूर साहब ने गीत में ऊँटों के साथ उन्हें भी खूबसूरती से इस्तेमाल किया। अपनी तरह के अलहदा फिल्मकार, अभिनेता राजकपूर साहब को सादर नमन।

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