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अमेरिका में सिखों पर नस्लीय हमला: इंडियानापोलिस में नस्लीय हमले में चार सिखों की मौत

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अमेरिका के इंडियानापोलिस में 16 अप्रैल 2021 को हुए नस्लीय हमले में चार सिख समुदाय के लोग मारे गए हैं। नतीजतन इस भारतीय समुदाय ने भय और अनिश्चितता का महौल है। स्थानीय सिख संगठन कोअलिशन ने कहा है कि यहां अमेरिकी नागरिकों की तुलना में सिखों को ज्यादा भेदभाव और नस्लीय उत्पीडऩ का शिकार होना पड़ता है।

प्रमोद भार्गव

अमेरिका के इंडियानापोलिस में 16 अप्रैल 2021 को हुए नस्लीय हमले में चार सिख समुदाय के लोग मारे गए हैं। नतीजतन इस भारतीय समुदाय ने भय और अनिश्चितता का महौल है। स्थानीय सिख संगठन कोअलिशन ने कहा है कि यहां अमेरिकी नागरिकों की तुलना में सिखों को ज्यादा भेदभाव और नस्लीय उत्पीडऩ का शिकार होना पड़ता है। यह हमला 19 वर्षीय श्वेत अमेरिकी ब्रैंडन स्कॉट ने किया था। इस सरकारी कर्मचारी ने गोलीबारी में आठ लोगों की हत्या के बाद स्वयं आत्महत्या कर ली। इस हत्यारे ने हॉल फेडएक्स का वह परिसर चुना, जिसमें सबसे ज्यादा सिख समुदाय के सरकारी कर्मचारी रहते हैं। इस घटना को अमेरिका में रहने वाले प्रवासी भारतीय मानकर चल रहे हैं कि यह हमला एशियाई मूल के लोगों और प्रवासियों के खिलाफ श्वेत अमेरिकी नागरिकों में पनप रही नस्लीय नफरत का परिणाम है।

कोरोना फैलने के बाद अमेरिका में कालों पर गोरों द्वारा नस्लीय टिपप्णियों और हमलों की संख्या भी ज्यादा बढ़ गई है।
प्रवासी मुक्त अमेरिका के मुद्दे पर चुनाव जीते डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही अवसरों की भूमि माने जाने वाले अमेरिका में नस्लीय भेद हिंसा का रूप लेने लगा था। लेकिन बाइडेन के राष्ट्रति बनने के बाद उम्मीद जगी थी कि अब नस्लीय भेद कम होगा। किंतु इस ताजा हमले ने जता दिया है कि गोरों में नस्लीयता चरम पर है। ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद पहला हमला दो भारतीय युवा इंजीनियरों पर हुआ था। इनमें से हैदराबाद के एक श्रीनिवास कुचिवोतला की मौके पर ही मौत हो गई। दूसरा अलोक मदसानी घायल हो गया था। यह हमला 51 वर्षीय सेवानिवृत्त अमेरिकी नौसैनिक एडम पुरिनटोन ने किया था। गोली दागते हुए उसने नस्लीय टिप्पणी करते हुए कहा भी ‘निकल जाओ मेरे देश से आतंकी।Ó हमलावर ने इन भारतीयों को अरबी नागरिक मानकर गोली चलाई थी। हालांकि अमेरिका में नस्लीय हमले कोई नहीं बात नहीं हैं, बराक ओबामा के दूसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने के बाद से ही गैर अमेरिकी लोगों पर हमलों का सिलसिला जारी है।

ओबामा जब अमेरिका के दूसरी बार राष्ट्रपति चुने गये थे तब यह बात उजागर हुई थी कि अमेरिका में नस्लीयता बढ़ रही है। क्योंकि 39 फीसदी गैर अमेरिकियों के वोट ओबामा को हासिल हुये थे। इनमें अफ्रीकी और एशियाई मुल्कों के लोग थे। मूल अमेरिकियों के केवल 20 फीसदी वोट ओबामा को मिले थे। यह इस बात की तसदीक थी कि अमेरिका में नस्लीयता की खाई लगातार चैड़ी हो रही है और प्रशासन उसे नियंत्रित नही कर पा रहा है। 5 अगस्त 2015 को रंगभेदी मानसिकता के चलते ही गुरुद्वारे पर हुए हमले में सात सिख मारे गए थे। बाद में हमलावर वेड माइकल पेज ने खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी। श्वेत नस्लवादी पेज फौज में नौकरी कर चुका था।

इसके पहले न्यूजर्सी में 24 दिसंबर 2014 को गुजराती व्यापारी अश्वनी पटेल और फरवरी 15 में अमित पटेल की हत्याएं हुई थीं। 6 फरवरी 2015 को सुरेश भाई पटेल पर पुलिसकर्मियों ने ही बर्बर हमला किया था। इस हमले में वे स्थाई विकलंगता के शिकार हो गए थे। बाद में अदालत ने हमलावर पुलिसकर्मी एरिक पार्कर को बरी कर दिया था। सुनंदों सेन को एक अमेरिकी महिला ने चलती भूमिगत रेल से सिर्फ इसलिए धक्का दे दिया था, क्योंकि वह रंगभेदी मानसिकता के चलते गैर अमेरिकियों से नफरत करने लगी थी। ऐरिका मेंडेज नाम की इस महिला ने अदालत में बेझिझक कबूल भी किया कि वह हिंदुओं, सिख और मुसलमानों से नफरत करती है, इसलिए उसने सेन की हत्या करके कोई गलत काम नही किया है। अमेरिका में विस्कोन्सिन गुरुद्वारे पर हुए हमले के बाद ही यह तय हो गया था कि यहां अश्वेतों के लिए नही रहने लायक पृष्ठभूमि तैयार हो रही है। इस घटना के बाद जिन तथ्यों का खुलासा हुआ वे हैरानी में डालने वाले रहे हैं।

दरअसल अश्वेत बाराक ओबामा को राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद पर बैठते ही अमेरिका में बाकायदा श्वेतों को सर्वोच्च ठहराने का सांगठनिक आंदोलन शुरू हो गया था। लिहाजा यहां हमले नितांत सोची-समझी साजिशें हैं। गुरुद्वारे पर जिस वेड माइकल पेज नामक सख्स ने हमला किया था, वह कोई मामूली सिरफिरा व्यक्ति नहीं था, बल्कि अमेरिकी सेना के मनोविज्ञान अभियान का विशेषज्ञ था। और नस्लीय आधार पर गोरों को सर्वश्रेष्ठ मानने वाले नव-नाजी गुट ‘एंड एपैथीÓ से जुड़ा था। एरिका मेंडेज भी दक्षिणपंथी सोच की महिला है और एंड एपैथी समूह की विचारधारा से प्रभावित है। इसी सोच का एडम पुरिनटोन बताया जा रहा है। यही सोच युवा ब्रैंडन स्कॉट की रही है। यह आंदोलन इसलिए भी परवान चढ़ रहा है, क्योंकि इसे दक्षिणपंथी बंदूक लॉबी से भी समर्थन मिल रहा है। नतीजतन अमेरिका में उग्रवादी गोरों के निशाने पर हिंदू, सिख और मुस्लिम आ रहे हैं।

ओबामा जब दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे, तब गैर अमेरिकियों में यह उम्मीद जगी थी कि वह अपने इतिहास की श्वेत-अश्वेत के बीच जो चैड़ी खाई है उसे पाट चुके है, क्योंकि अमेरिका में रंगभेद, जातीय भेद एवं वैमनस्यता का सिलसिला नया नहीं है। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। इन जड़ों की मजबूती के लिये इन्हें जिस रक्त से सींचा गया था वह भी अश्वेतों का था। अमेरिकी देशों में कोलम्बस के मूल्यांकन को लेकर दो दृष्टिकोण सामने आये हैं। एक दृष्टिकोण उन लोगों का है, जो अमेरिकी मूल के हैं और जिनका विस्तार व अस्तित्व उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका के अनेक देशों में है। दूसरा दृष्टिकोण या कोलम्बस के प्रति धारणा उन लोगों की है जो दावा करते हैं कि अमेरिका का वजूद ही हम लोगों ने खड़ा किया है। इनका दावा है कि कोलम्बस अमेरिका में इन लोगों के लिए मौत का कहर लेकर आया। क्योंकि कोलम्बस के आने तक अमेरिका में इन लोगों की आबादी 20 करोड़ के करीब थी, जो अब घटकर 10 करोड़ के आस-पास रह गई है। इतने बड़े नरसंहार के बावजूद अमेरिका में अश्वेतों का संहार लगातार जारी है। अवचेतन में मौजूद इस हिंसक प्रवृत्ति की जकडऩ से आज भी अमेरिका मुक्त नहीं हो पाया है।

अमेरिका में कालों के साथ इस हद तक बुरा बर्ताव रहा है कि उन्हें नागरिक अधिकारों के प्रति लंबा संघर्ष करना पड़ा, तब कहीं जाकर 1965 में कालों को गोरे नागरिकों के बराबर मताधिकार दिया गया। इसके पहले तक काले मताधिकार से वंचित थे। इस अधिकार के मिलने के बाद ही ओबामा का एक श्वेत राष्ट्र का राष्ट्रपति बनना संभव हुआ। बावजूद गोरों और कालों के बीच सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक असमानताएं बनी हुई है। अमेरिका में गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले लोग करीब 4.5 करोड़ हैं, इनमें से 80 फीसदी काले हैं। अभी भी अमेरिका में कुल जनसंखया के बरक्श कालों की संख्या मात्र 15 फीसदी है। लेकिन वहां की जेलों में अपराधियों की कुल संख्या में 45 फीसदी कैदी काले हैं। यह अमेरिकी रंगभेद की बदरंग तस्वीर है।

अमेरिका में नस्लीय भेद कई स्तरों पर देखने को मिल रहा है। वहां कि ईसाई मिशनरियों ने बाबा रामदेव की योग शिक्षा पर इसलिए रोक लगा दी थी, क्योंकि यह शिक्षा हिंदुओं की सनातन परंपरा से जुड़ी हुई है। फिल्म कलाकार शहरूख खान और शिल्पा शेट्टी को भी अमेरिका में नस्लीय भेद का सामना करना पड़ा है। अमेरिका के ट्राई वैली नाम के विवि में पढऩे वाले छात्रों के टखनों में रेडियो कॉलर पहना दिए गए थे। यह पशुवत व्यवहार इसलिए किया गया था, जिससे छात्र भाग न जाएं। दरअसल भारतीयों की श्रमसाध्य कर्तव्य निष्ठा का लोहा अमेरिका समेत पूरा विश्व मान रहा है। किंतु भारतीयों का यही समर्पण और सज्जनता अमेरिका के चरमपंथियों को परेशान कर रही है। भारतीय डॉक्टर व इंजीनियरों को अमेरिकी लोग बेरोजगारी का कारण भी मान रहे है।

आज लगभग पूरी दुनिया में बाजारवादी सोच को बढ़ावा मिल रहा है। इस विस्तारवादी सोच की आड़ में बहुराष्ट्रवाद, राजनीतिक चेतना, समावेशी उपाय और सांस्कृतिक बहुलता पिछड़ते दिखाई दे रहे हैं। परिणामस्वरूप सामाजिक सरोकार और प्रगतिशील चेतनाएं हशिए पर धकेली जा रही हैं। उपेक्षापूर्ण कार्यशैली की यही परिणति प्रतिरोधी शंखनाद का ऐसा चेहरा है, जो मनुष्यताद्रोही है। गोया, बाजारवादी संस्कृति की यह क्रूरता और कुरूपता सांस्कृतिक बहुलतावाद को भी खतरा बन गई है। अमेरिका और अन्य यूरोपीय मूल के लोगों में ही नहीं, एशियाई और दक्षिण व मध्य एशियाई मूल के लोगों में भी प्रतिरोध की यही धारणा पनप रही है। इन धारणाओं पर अंकुश कैसे लगे इस परिप्रेक्ष्य में संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं को सोचने की जरूरत है।

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