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कितूर की वीररानी रानी चेन्नम्मा

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वीर रानी चेन्नम्मा कर्नाटक के छोटे प्रांत कित्तूर के महाराज मल्ल्सर्ज की छोटी रानी थी। उन्होंने 23 सितंबर 1824 को कित्तूर के किले पर अंग्रेजों की संगठित शक्ति को ललकारा और अपने प्रांत और धरती के लिए बलिदान दिया। 23 अक्टूबर 1778 को कित्तूर के काकतीय राजवंश में जन्मी रानी चेन्नम्मा अनेक भाषाओं की ज्ञाता, घुड़सवारी व शस्त्र संचालन में दक्ष थीं। स्वाभिमानी कलाप्रेमी बहादुर राजा मल्लसर्ज कित्तूर को सम्पन्न राज्य बनाना चाहते थे। पूना के पेशवा से मतभेद के कारण उन्हें कैद करवा दिया गया तथा 1816 में उनके देहावसान के बाद रानी ने राजकाज संभाला।

अपने और बड़ी रानी के पुत्र की भी अल्पायु में मृत्यु के बाद रानी ने दत्तक पुत्र गुरुलिंग मल्लसर्ज का राज्याभिषेक आयोजन रखा। अंग्रेजों ने षडयंत्र रचकर लालची सरदारों को मिला लिया। धारवाड़ के कलेक्टर थैकरे ने दत्तक पुत्र गुरुलिंग मल्लसर्ज को कित्तूर राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और राज्य हड़प नीति के तहत राज्य को विलय करने की योजना बनाई। थैकरे ने रानी चेन्नम्मा को आदेश दिया कि वह राज्य की संरक्षिका के पद को छोड़ दें और सभी अधिकार राज्य के दीवान मल्लप्पा शेट्टी को सौंप दे।

रानी जानती थी कि दीवान मल्लप्पा शेट्टी ओर वेंकटराव दोनों बिक चुके हैं, और राज्य बाहरी व आंतरिक दोनों ओर से घिर गया है। रानी ने संकट जान युद्ध की तैयारी का आह्वान किया – यह संग्राम केवल कित्तूर के लिए नहीं है यह हमारी पुण्य भूमि भारत के लिए है।

जन-जन रानी के साथ था। गुरु सिद्दप्पा, बालण्णा, रायण्णा, जगवीर और चेन्नवासप्पा जैसे योद्धा उनके साथ खड़े थे। रानी के आह्वान पर सारा कित्तूर राज्य युद्ध की तैयारी में जुट गया। रानी ने युद्ध पूर्व तैयारी का स्वयं निरीक्षण किया। अंग्रेजी सेना ने कित्तूर को घेर लिया। 23 सितंबर 1824 को रानी ने युद्ध किले का फाटक खोला और युद्ध का संचालन किया। योद्धा के वेश में रानी सिंहनी की भांति गरजी और घमासान युद्ध शुरू हो गया। रानी की तलवार वेग से शत्रुओं को काट रही थी। रणभूमि में दुश्मनों की कटी लाशें बिछ गयी। रानी ने थैकरे को भी मार गिराया। थैकरे के मरते ही अंग्रेजी सेना भाग खड़ी हुई। गद्दार मल्लप्पा शेट्टी और वेंकटराव को कैद कर लिया गया। दोनों को मृत्युदंड दिया गया।

इस घटना से कित्तूर के आसपास के राज्यों को भी जोश आ गया। अंग्रेजों ने इसे दबाने के लिए 3 दिसंबर 1824 को बड़ी फौज लेकर कित्तूर पर हमला किया। अंग्रेजों की सेना संख्या बल तथा हथियारों से समृद्ध होने के बावजूद रानी चेन्नम्मा और उनके योद्धाओं ने अपने आत्मबल के दम पर अंग्रेजी फौज को पराजित कर दिया। अंग्रेज इस हार से तिलमिला गये। तीसरी बार कित्तूर पर आक्रमण किया। रानी ने फिर अंग्रेजी सेना से युद्ध किया।

गद्दार मल्लप्पा शेट्टी का विश्वासपात्र कित्तूर का किलेदार शिववासप्पा अंग्रेजों से जा मिला। उसने किले के अंदर का भेद अंग्रेजों को बता दिया। गद्दार भेदियों और अंग्रेज जासूसों ने बारूद नष्ट करवा दी। अंतत: रानी की हार हुई। रानी चेन्नम्मा उनकी पुत्रवधु जानकी देवी को बंदी बना लिया गया। रानी के विश्वसनीय रायण्णा, जगवीर, नागरकट्टी, चेन्नवासप्पा तथा बालण्णा को फांसी दी गयी। 2 फरवरी 1829 को जेल में ही रानी चेन्नम्मा शहीद हो गईं।

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