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शुद्ध, पवित्र, पुनीत, पूजनीय मातृ सदृश्य नदियाँ

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  • अशोक ‘प्रवृद्ध’

आदि सनातन काल से ही भारतीय संस्कृति में जल और जल संवाहक नदियों को शुद्ध, पवित्र, पूजनीय, मातृ सदृश्य मानते हुए विशेष श्रद्धाभाव से पवित्र प्रवाह के रूप में देखे जाने की परम्परा रही है। मान्यता है कि गिरि आश्रय में अथवा नदी के संगम में ध्यान, मनन और चिंतन करने वाले व्यक्ति कोबोध की, पवित्र धी अर्थात बुद्धि की प्राप्ति होती है। वैदिक, पौराणिक, महाकाव्य सभी पुरातन ग्रन्थों में नदियों की महिमा का वर्णन किया गया है। वैदिक साहित्य में संसार को एक सतत अभिनव सृजन मानते हुए इस निरंतर सृष्टि प्रक्रिया को ‘ब्रह्मयज्ञ’ कहा गया है।

एक विराट चेतना समुद्र है, तथा यह सृष्टि और नदियां इस चेतनता की विविध प्रणालियों के समान होने के कारण ब्रह्मद्रव हैं। गंगा के विशेष महत्व के कारण उसे बारम्बार ब्रह्मद्रव कहा गया है। अन्य नदियों को भी ब्रह्मद्रव गया है। वेदों में सरस्वती को विशेष महत्व प्रदान करते हुए कहा गया है कि सरस्वती एक चेतन सरित, वाक् सरस्वती, पवित्र करने वाली, शक्ति प्रदायिनी, समृद्धि दायिनी, चेतना को उद्दीप्त करने वाली व निरंतर प्रेरणा देने वाली है। वह एक सतत फहराने वाली दिव्य केतु अर्थात ध्वज है। वेदों में सात नदियों का विशेष वर्णन करते हुए कहा गया है कि ये सात चेतना प्रवाह रूप हैं। उन्हें उषा की गौएं, सूर्य के सात घोड़े तथा सात अग्नि रूप कहा गया है। ऋग्वेद में गंगा, यमुना, सरस्वती, सिंधु और पंजाब की अन्य नदियों तथा सरयू एवं गोमती नदियों का वर्णन अंकित है।

सात नदियों के तीन दल का ऋग्वेद में विशेष श्रद्धा से वर्णन किया गया है। कुल 99 नदियों का वहां एक साथ उल्लेख है। तीन दलों की तीन प्रमुख नदियां हैं-सिंधु, सरस्वती और सरयू। गंगा इन तीनों से भी विशिष्ट होने के कारण ऋग्वेद के प्रसिद्ध नदी सूक्त में चेतन गंगा की प्रार्थना की गई है। ऋग्वेद में जल और नदियों के प्रति अत्यधिक श्रद्धा पूर्ण अंकन हुआ है, और उन्हें वैदिक शक्ति की अभिव्यक्ति एवं पूजनीय माना गया है।

अथर्ववेद में भी जल को पवित्र करने वाला कहा गया है। ‘तैतिरीय संहिताÓ के अनुसार सभी देवता जलों के मध्य में केंद्रित हैं। भारतीय संस्कृति में जल कोपवित्र, और स्वाभाविक जल को विशेषत: पवित्र माना गया है। नदियों, मंदिरों से जुड़ी वापियां, झीलें, गहरे कुंड और पर्वतीय प्रपात को स्वाभाविक जल की संज्ञा प्राप्त है। विश्व के प्रथम कानून ग्रन्थ ‘मनुस्मृतिÓ में नदी की परिभाषा दी गई है। उसके अनुसार जो कम से कम 8000 धनुष की लंबाई अर्थात कम से कम लगभग 15 किलोमीटर लंबी हो, वह नदी है। जो इससे छोटे नाले आदि हैं, वे गर्त कहलाते हैं।

स्मृति शास्त्रों के अनुसार श्रावण और भादो में नदियां रजस्वला होती हैं। इसलिए इन दिनों उनमें स्नान वर्जित है। समुद्र में मिलने वाली नदियों में ही इन दिनों स्नान किया जा सकता है। मनुस्मृति में श्रद्धापूर्वक प्रणाम कर जल में प्रविष्ट होने की आज्ञा देते हुए कहा गया है कि शरीर को नदी, झील कुंड अर्थात जल के भीतर नहीं रगडऩा चाहिए, किनारे पर आकर शरीर को रगड़ मैल छुड़ाना चाहिए।

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