Home लेख पं. दीनदयाल उपाध्याय जी की जयंती : विकास के स्वप्नदृष्टा

पं. दीनदयाल उपाध्याय जी की जयंती : विकास के स्वप्नदृष्टा

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भारतीय संस्कृति और परंपरा के अनुरूप राष्ट्र की चित्ति से विराट तक की कल्पना की। उनके विकास का आधार एकात्ममानव दर्शन था। सम्पूर्ण जीवन की रचनात्मक दृष्टि। विकास का यह मौलिक, निज, स्वाभाविक और व्यावहारिक पक्ष दीनदयाल जी ही रख सकते हैं।

  • रंजना चितले, कथाकार व रंगकर्मी

पं. दीनदयाल उपाध्याय जी एक ऐसे स्वप्न दृष्टा थे जिन्होंने स्वतंत्र भारत की संपूर्ण व्यवस्थाओं में स्वातंत्र्य के बोध की कल्पना की थी। उन्होंने व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और संस्कृति के विकास का समूचा दर्शन व्यक्त किया है। सामाजिक व्यवस्था, राजनैतिक व्यवस्था, कृषि और प्रशासनिक व्यवस्था में भी उन्होंने स्वतंत्रता के बोध का स्वरूप तैयार किया। देश के विकास को लेकर पं. दीनदयाल उपाध्याय जी चिंतन थे।

उन्होंने राष्ट्र निर्माण और भविष्य की संकल्पना पर गहन चिंतन किया। भारतीय संस्कृति और परंपरा के अनुरूप राष्ट्र की चित्ति से विराट तक की कल्पना की। उनके विकास का आधार एकात्ममानव दर्शन था। सम्पूर्ण जीवन की रचनात्मक दृष्टि। विकास का यह मौलिक, निज, स्वाभाविक और व्यावहारिक पक्ष दीनदयाल जी ही रख सकते हैं।

यह वह समय था जब अनेक विचारधाराएं एक साथ थीं। विदेशी जीवन, विदेशी विचार, स्वदेशी जीवन, स्वदेशी चिंतना, पुरातन संस्कृति, पश्चिम के आंदोलनों, राजनीतिक-आर्थिक क्षेत्रों से उपजे विचार, माक्र्सवाद, समाजवाद, पूंजीवाद और प्रजातंत्र। इन सभी अवधारणाओं और विचारधाराओं के पशोपेश में देश उलझा था। पं. दीनदयाल जी ने इन परिस्थितियों में व्यष्टि से समष्टि का सिद्धांत दिया।उनका मत था कि हम सम्पूर्ण मानव के ज्ञान और उपलब्धियों का संकलित विचार करें। इसमें जो हमारा है उसे युगानुकूल और जो बाहर का है उसे दिशानुकूल ढाल कर आगे बढ़ें।


उन्होंने विकास की दिशा को भारतीय संस्कृति के एकात्ममानव दर्शन के मूल में खोजा और स्वराज्य की सार्थकता को अपनी संस्कृति की अभिव्यक्ति से ही संभव समझा। जिसमें विकास के साथ आनंद है। क्योंकि भारतीय संस्कृति में एकात्म है। वह सम्पूर्ण जीवन का, सम्पूर्ण सृष्टि का संकलित विचार करती है। यही एकात्म दृष्टि व्यष्टि से समष्टि की रचना करती है और यही विकास का व्यापक पक्ष है। सार्वभौम है। प्रासंगिक है। इसमें श्रीकृष्ण के वासुदेव कुटुम्बकम की अवधारणा से लेकर आज के ग्लोबलाईज्ड युग का समावेश है।

दीनदयालजी ने विकास पथ पर बढऩे से पहले राष्ट्र को समझने का आग्रह किया। राष्ट्र की व्याख्या करते हुए बताया कि राष्ट्र का अस्तित्व उसके नागरिकों के जीवन का ध्येय भाव है। जब एक मानव समुदाय के समक्ष एक मिशन, विचार या आदर्श रहता है और वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृभाव से देखता है तो वह राष्ट्र कहलाता है। इनमें से एक का भी अभाव रहा तो राष्ट्र नहीं बनेगा।

जिस प्रकार आत्मा के कारण व्यक्ति का शरीर रहता है ठीक उसी प्रकार राष्ट्र की आत्मा चित्ति है। यह चित्ति उसके चित्त से जन्मी है, जन्मजात, किसी कारणों से नहीं बनी। चित्ति ही वह मापदंड है जिससे मान्य या अमान्य किया जाता है। इसी के आधार पर राष्ट्र खड़ा होता है। अत: हर व्यक्ति राष्ट्र की आत्मा को प्रकट करने का साधन है। प्रत्येक व्यक्ति में परस्परपूरकता का भाव होगा तभी एकात्म होगा और एकात्म भाव से राष्ट्र का विकास संभव होगा। उन्होंने परस्पर पूरकता और एकात्म को व्यवहार का मापदंड बताया।

दीनदयाल जी ने हमें समग्र दृष्टि, समग्र संकल्प और एकात्म भाव के साथ आगे बढऩे का मार्ग दिया। उन्होंने आह्वान किया कि हमें राष्ट्र को सबल, समृद्ध और सुखी बनाने के लिये राष्ट्र रचना का व्यावहारिक प्रयत्न करना होगा, अनेक रूढिय़ां खत्म करनी होंगी, बहुत सुधार करने होंगे। उन्होंने राष्ट्र की आधार चित्ति से राष्ट्र की धारणा विराट की कल्पना दी। विराट राष्ट्र की वह कर्मशक्ति है, जो चित्ति से जागृत और संगठित होती है, जहां विराट जागृत रहता है, वहां संघर्ष नहीं होता, भिन्नता नहीं होती, परस्पर पूरकता होती है, इसलिये दीनदयाल जी के विकास मंत्र में विराट को जागृत करने की प्रेरणा थी। प्राचीन के प्रति गौरव, वर्तमान का यथार्थ आंकलन और भविष्य की महत्वाकांक्षा के साथ पूरे मन से काम करने का संकल्प। इसी विकास में अपनी परंपरा के आधार पर विश्व ज्ञान समाहित है।

पंडित दीनदयाल जी के विकास पथ में मानव विकास के साथ समूची सृष्टि के एकात्म का भाव है। यदि हम राष्ट्र की चित्ति और विराट की व्याख्या को समझें तभी दीनदयाल जी की संकल्पना और विकास की दिशा सार्थक होगी।

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