Home लेख अंग्रेज पार्टी पर बम फेंककर बलिदान देने वाली प्रीतिलता

अंग्रेज पार्टी पर बम फेंककर बलिदान देने वाली प्रीतिलता

22
0
  • रमेश शर्मा

भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में ऐसे असंख्य बलिदान हुये जिनका इतिहास की पुस्तकों में वर्णन शून्य जैसा है । जबकि उनक कार्य स्वर्णाक्षरों में उल्लेख करने लायक हैं। इनमें से एक हैं महिला क्रांंतिकारी प्रीति लता वोददार जिन्होंने 24 सितम्बर 1932 में अंग्रेजों की पुलिस से मुकाबला करते हुए अपना बलिदान दिया। 1857 की क्रांंति के बाद वे पहली ऐसी क्रांतिकारी महिला हैं जिन्होंने रानी लक्ष्मीबाई की भांति लड़ते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया।

क्रांतिकारी प्रीति लता का जन्म 5 मई 1911 को बंगाल के चटगांव क्षेत्र में हुआ था। यह क्षेत्र अब बंगलादेश में है । वे एक सामान्य परिवार से आतीं थीं। लेकिन परिवार में शिक्षा का वातावरण था । उनके पिता नगर पालिका में क्लर्क थे। लेकिन सरकार में और अंग्रेज अफसरों के व्यवहार में भारतीयों के प्रति सम्मान का भाव न था। इस बात की भी चर्चा घर में होती थी। इन सब बातों का प्रीति लता के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा । प्रीति लता पढऩे में बहुत कुशाग्र थी।

उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और आगे की पढ़ाई के लिये ढाका के इंडेन कालेज में दाखिला लिया। 1929 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। वे ढाका बोर्ड की प्रावीण्य सूची में पांचवे नम्बर पर रहीं । इण्टरमीडिएट के बाद कलकत्ता से दर्शन शास्त्र में डिग्री प्राप्त की। लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों ने उनकी डिग्री रोक दी। इसका कारण यह था कि जब डिग्री लेने पहुंची तो उन्हें ब्रिटिश एम्पायर के प्रति वफादारी की शपथ लेनी थी। जो उन्होंने मना कर दिया। वे बिना डिग्री लिये ही कलकत्ता से चटगांव आ गयीं।

उन दिनों चटगांव क्षेत्र क्रांतिकारियों का बड़ा केन्द्र था। वे क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गयीं। उनसे मिलने के लिये सुप्रसिद्ध क्रांंतिकारी सूर्यसेन ने सावित्री नामक एक महिला को भेजा। सावित्री एक साधारण-सी गृहणी थी पर वे क्रांतिकारियों के संपर्क का काम करतीं थीं। प्रीति लता सावित्री की सलाह पर सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी रामकृष्ण विश्वास से मिलीं। इस मुलाकात के बाद प्रीतिलता क्रांतिकारियों के बीच संपर्क का काम करने लगीं। जब राम कृष्ण विश्वास जेल गये तो वे जेल में भी मिलने गयीं। इसके बाद उनका संपर्क क्रांतिकारी सूर्यसेन से बना।

प्रीतिलता ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी से जुड़ गयीं और युद्ध व हथियार चलाने का प्रशिक्षण क्रांतिकारी निर्मल सेन से लिया। पर समय के साथ यह समूह पुलिस की निगाह में आ गया। सूर्यसेन के नेतृत्व में काम कर रहे इस समूह पर पर दस हजार का इनाम घोषित किया गया। इस पुरस्कार के लालच में कुछ लोग निगरानी करने लगे और काम में कठिनाइयां आने लगीं। सभी क्रांतिकारी अदृश्य और छद्म वेश और नाम से अपना काम करना आरंभ किया। ये लोग अधिक दिनों तक छिपकर न रह सके। उनके ठिकाने का पता पुलिस को लग गया। पुलिस ने छापा मारा। इस मुठभेड़ में क्रांतिकारी अपूर्व सेन और निर्मल सेन का बलिदान हो गया। लेकिन प्रीतिलता और सूर्यसेन निकलने में सफल हो गया। वे अंतत: सावित्री देवी के घर रहने लगे।

सावित्री अंग्रेजों के मनोरंजन क्लब में काम करती थी अतएव उन पर किसी को कोई संदेह न था। मनोरंजन क्लब में शराब नाच के अतिरिक्त किशोर वय की भारतीय लड़कियां लाई जाती थीं। यह बात प्रीतिलता को कई दिनों से चुभ रही थी। अंतत: क्लब उड़ाने की योजना बनाई। वह 24 सितम्बर 1932 का दिन था। अंग्रेजों की पार्टी चल रही थी।

प्रीतिलता पोटेशियम सायनाइड व बम लेकर पहुंची। उन्होंने खिड़की से बम फेंका। 13 अंग्रेज घायल हुये। उन्होंने भागने की कोशिश की। उन पर पीछे से गोली दागी गयी। गोली पीठ पर लगी। वे घायल होकर गिर पड़ी। घायल अवस्था में वे नहीं चाहतीं थी कि अंग्रेजों के हाथ उनके शरीर से लगें। उन्होंने सायनाइड भी खा लिया और मौके पर ही वे शरीर छोड़ कर परम ज्योति में विलीन हो गयीं।

Previous articleमुस्लिम आबादी पर कांग्रेस का भ्रम
Next articleआइपीएल 2021: मुंबई की यूएई लेग में लगातार दूसरी हार, केकेआर के सामने रोहित दिखे बेबस

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here