हिरण्यकश्यप नहीं प्रहलाद बने

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  • उमंग, उल्लास और खुशियों की नई ऊर्जा का संचार करता है होली का पर्व
  • जन-मन के हृदय में उमंग, उल्लास और खुशियों की नई ऊर्जा का संचार करते हैं। यही वजह है कि त्यौहारों की तैयारी में डूबे जनमन अपना सुख-दुख भूला देता है। ऐसा ही एक त्यौहार है, होली, जो कि फागुन माह का सिरमौर पर्व है। फागुन माह में चारों ओर हलचल मचा देने वाली होली सुख-दुख, छोटे बड़े जात-पांत, ऊॅच-नीच को भूला के एक हो जाने का त्यौहार है।

हमारे देश के किसी भी धर्म के पर्व-त्यौहार हमको हमारी रीति-रिवाज, परम्परा, संस्कार और संस्कृति का ज्ञान कराते हैं। जन-मन के हृदय में उमंग, उल्लास और खुशियों की नई ऊर्जा का संचार करते हैं। यही वजह है कि त्यौहारों की तैयारी में डूबे जनमन अपना सुख-दुख भूला देता है। ऐसा ही एक त्यौहार है, होली, जो कि फागुन माह का सिरमौर पर्व है। फागुन माह में चारों ओर हलचल मचा देने वाली होली सुख-दुख, छोटे बड़े जात-पांत, ऊॅच-नीच को भूला के एक हो जाने का त्यौहार है।

फागुन माह के इस पर्व का नाम आते ही मन मस्तिष्क में राग, रंग, मौज-मस्ती, हंसी-ठिठोली की मनमोहक तस्वीर उभर आती है। सरसो, धनिया, अलसी, सेंभर, पलास के रंग-बिरंगे महकते फूल, आम के बौर और कोयल की कुहु कुहु इस पर्व के आनंद को द्विगुणित कर देते हैं। वर्ष के पूरे ग्यारह माह की भागम-भाग और दौड़-धूप भरी जिंदगी के बाद माह फागुन का पर्व आनंद सागर में हिलोरे लेने का सुख देता है, लेकिन बदलते दौर में आनंद उल्लास के माह फागुन का सिरमौर पर्व होली अब रंग के बजाय हुडदंग का त्यौहार बनते जा रहा है। रंग अबीर, गुलाल से सराबोर होली त्यौहार के आड़ में लोग अश्लील भौंडा और फूहड़ प्रदर्शन करते इसे हुड़दंग का पर्व बनाते जा रहे हैं।

राक्षसी प्रवृत्ति है होली में हुड़दंग

जिस तरह दीवाली दिया और फटाका के बिना रक्षाबंधन रौली और राखी के बिना अधूरा है, उसी तरह रंग-गुलाल के बिना होली की कल्पना नहीं की जा सकती। पर आजकल रंग गुलाल को छोड़ कर लोग डामर, कीचड़, वार्निश आदि को एक-दूसरे के ऊपर पोतते-उछालते, फूहड़ नाच गाना करते दिखाई देते है। अब तो गालीगलौच और गांजा-भांग, षराब का नषा करना ही होली त्यौहार की पहचान बनती जा रही है। यही वजह है कि होली पर्व पर गांव-शहर में होली खेलने वालों से कहीं ज्यादा पुलिस की टुकड़ी डंडे और राइफल, अश्रु गोले से लैस गश्त करती हुई दिखाई देती है।

होली त्यौहार में मांस-मदिरा का सेवन करके मार-धाड़, चोरी-चकारी और असभ्य हरकतों को प्रदर्षित करने वालों लोगों को सक्ती राज के राजपुरोहित स्वर्गीय शिवकुमार चौबेजी राक्षस कुल के तथा सौम्यतापूर्वक फाग गाते रंग-गुलाल खेलते लोगों को देव कुल के इंसान कहते थे। होली पर हुड़दंग करने वालों को सुधर जाने का संदेश देते हुये वे एक पौराणिक कथा बताते थे कि – हिरण्यकश्यप नाम का एक भारी बलसाली असुर राजा था। वो स्वयं को देवी-देवताओं से बड़ा मानता था। उसके राज में देवी-देवताओं का नाम लेने की कल्पना मात्र से प्रजा थरथर कांपती थी, इसके विपरीत हिरण्यकश्यप का बेटा प्रहलाद हमेशा प्रभु स्मरण में लीन रहता था। अपने बेटे की भगवान भक्ति को देख-देख कर रात-दिन वह तिलमिलाते रहते प्रहलाद के भक्ति भाव को खतम करने के प्रयास में जुटा रहता था।

एक दिन हिरण्यकश्यप ने अपनी बहिन होलिका की गोद में प्रहलाद को बैठा कर बड़ी-बड़ी लकडिय़ों से उसे घेरकर आग लगाने का आदेश दिया। दरअसल होलिका को आग में नहीं जलने का वरदान प्राप्त था। यही वजह से हिरण्यकश्यप के मन में विचार आया कि प्रहलाद जल के खाक हो जायेगा, इस घटना को प्रत्यक्ष देखने बड़े-बड़े राक्षसों के साथ ही बड़ी संख्या में आम प्रजा की भीड़ वहां जुट गई। इन सबके सामने लकडिय़ों में आग लगा दी गई। धू-धू करती लकडिय़ों के संग होलिका भी जल कर राख हो गई पर प्रहलाद प्रभुलीला में लीन भजन गाते, हंसते-मुसकराते जीवित मिला । इसे देख कर हिरण्यकश्यप के साथ ही साथ वहां उपस्थित राक्षस नशापान करके प्रजाजन को मारने-पीटने लगे, जबकि उनके विपरीत आम प्रजा भक्त प्रहलाद के बचने की खुशी मनाते रंग-गुलाल में लीन प्रभु भजन करते नाचने, गाने में मस्त थे।

इस पौराणिक कथा से यह बात स्पष्ट उजागर हो जाती है कि होली के दिन हुड़दंग करने वाले लोग राक्षस कुल के होते हैं तथा नशापान से दूर फाग गाते आपस में गले मिलते लोग भगवान कुल के होते हैं। होलिका दहन समाज के कुप्रथा के अंत और बुराई के ऊपर अच्छाई की जीत केा दर्शाती है। यह पर्व इस बात को भी व्यक्त करता है कि परहित और प्रभु सेवा मे रहने वाले लोग प्रहलाद की तरह अजर-अमर हो जाते है तथा बैर भाव रखने वाले, निन्दाचारी-अत्याचारी लोगों का विनाश होलिका की तरह हो जाता है।

इसे भली-भांति जानते हुये भी जो लोग होली के दिन राक्षसों की तरह आचार-विचार रखते हैं और रंगों के त्यौहार को दंगों-हुड़दंगों का त्यौहार के रूप में कलंकित करते हैं, उन्हें ललकारते हुये अंत में कवि अशोक साहिल के शब्दों में कहना होगा कि ”होली पर रंगों की कसम देता हंू तुम्हें, मुझे मजहब के तराजू में न तौला जाये, इंसान रहने की कसम खाई हैं मैने, मुझे हिन्दू या मुसलमान न समझा जाये।

सामाजिक-पर्यावरण प्रदूषण का पर्व न बने होली : सच्चे अर्थों में देखा जाये तो यह पर्व कम खर्चों में ज्यादा सुख देने वाला त्यौहार है। इस दिन लाल, हरा, पीला, गुलाल का एक छोटा सा टीका हर गरीब-अमीर, छोटे-बड़े, ऊंच-नीच के भेदभाव को भूला देने की ताकत से लबरेज होता है। मन में पड़ी गांठें को खोलकर आपसी मनमुटाव को भूला देने वाला यह त्यौहार है। इसी बात को कवि आनंद तिवारी ने छत्तीसगढ़ी भाषा में बखूबी व्यक्त किया है कि ”मया के रंग म मन ल चिभोर ले, अपन अंचरा म मोर गांठ जोर ले, अंतस के सब्बो संसो मिटा जाही, गोठ में थोरिक मदरस ल घोर ले।

मुझे ध्यान है कि पहले हमारे गॉव में बसंत पंचमी के दिन अरंडी की डंगाल को किसी सार्वजनिक स्थान में गाड़ दिया जाता था और घर-घर से बटोरी हुई सूखे पेड़ की लकडिय़ां तथा कण्डों से होली रचाई जाती थी। हमारे कई साथी गोबर से निर्मित भरभौलियां बनाकर होली में जलाते थे। भरभोलियां बनाने के लिए गोबर के छोटे-छोटे लोई बना कर उसके बीच मे छेदा करके सुखा दिया जाता था। उसके बाद उसे सुतली में माला की तरह गूथ दिया जाता था। एक माला मे सात भरभोलिया गुंथा होता था। होलिका दहन के बाद नंगाड़ा बजाते फाग गाने की परम्परा थी।

होली की ऐसी सुंदर परम्परा को बनाकर रखना चाहिये। इस पर्व पर हरे पेड़-पौधों को काटने के बजाय इनकी सुरक्षा होनी चाहिये। इसके विपरीत अब होली त्यौहार की आड़ में जो सामाजिक एवं पर्यावरण प्रदूषण का खेल चल रहा है वह इस सुंदर त्यौहार को कलंकित करता है। अत: इस पर्व पर आगे आकर बहके हुये दिशाहीन लोगों को संदेश देना चाहिये कि ”हरे पेड़ कटने न दे, जलस्तर घटने न दे, भाईचारे को जात-धरम में बंटने न दे, होली पर यहीं पैगाम है, हिन्दू को राम राम, मुस्लिम भाईयों को सलाम है। (लेखक : अतिरिक्त महाप्रबंधक (जनसम्पर्क) छ.ग. राज्य पॉवर होल्डिंग कंपनी)

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