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राजनीति में राष्ट्रभाव या राष्ट्रहित के बिन्दु कम हो गए हैं : राष्ट्रीय मुद्दों पर राष्ट्रीय असहिष्णुता घातक

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पूरी दुनिया चीन को घेरने में लगी है लेकिन कुछ राजनीतिक दलों के लोग चीन पर कोई बात नहीं कर रहे । वे बहाने निकालकर केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमला कर रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसका लाभ वह लॉबी उठा रही है जो भारत में प्रगति दर को धीमा करना चाहती है । पिछले सात आठ वर्षों में भारत ने कुछ क्षेत्रों में मानों एक अंगड़ाई ली है।


रमेश शर्मा

भारत की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिला है। यह परिवर्तन है विभिन्न विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा मुद्दे उठाने और सरकार पर हल्ला बोलने वाले विषयों के चयन का। अब राजनीति में राष्ट्रभाव या राष्ट्रहित के बिन्दु कम हो गये हैं और राजनीतिक हित ही महत्वपूर्ण हो गए हैं। राजनीतिक बयानबाजियों में अब सीमा और संयम दोनों टूट रहे हैं। दिनों ऐसे बिन्दुओं पर भी व्यक्तिगत या राजनीतिक हमले किए जाने लगे जो राजनीति से नहीं अपितु राष्ट्रीय हितों या राष्ट्र की साख से जुड़े होते हैं।

राजनैतिक संघर्ष में विन्दुओं के अतिरिक्त दूसरा महत्वपूर्ण विषय होता है समय का। यह भी बहुत महत्वपूर्ण है कि किस समय क्या बात कहनी चाहिए। देश,काल, परिस्थिति को देखकर ही अपनी बात कहने के लिए व्यक्तिगत जीवन में भी सावधानी रखनी चाहिए। फिर तो राजनीति है । यदि कोई ऐसा संकट ह,ै जो राष्ट्र पर है, समाज पर है अथवा मानवता पर है तब व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर पूरे परिवार समाज और राष्ट्र को एक जुट होना चाहिए।


इन दिनों कोरोना काल है। कोरोना का संकट अकेले भारत में नहीं आया है बल्कि पूरी दुनिया में है, पूरी मानवता पर है । इस संकट के मुकाबले के लिए पूरे देश को ही नहीं, पूरी दुनिया को एकजुट होना चाहिए। पूरी दुनिया है भी एकजुट। सब एक दूसरे की सहायता कर रहे हैं । बीच यदि भारत में संकट कुछ कम हुआ था तो भारत ने दुनिया के कई देशों को वैक्सीन भेजी और जब भारत में बढ़ा तो दुनिया के कई देशों ने वैक्सीन भारत भेजी। लेकिन भारत के भीतर कुछ स्वर उठते हैं जिनका आलाप सदैव अलग होता है, विरुद्ध होता है, हमलावर होता है, आरोपात्मक होता है। वे ऐसे विषयों और बातों पर भी अपना विरोध या राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के भाव से मीनमेख निकालते हैं जिनका राजनीति से कोई संबंध नही होता।

यदि हम पिछले कुछ वर्षों की राजनीतिक शैली का विश्लेषण करें तो हम देखेंगे कि जिन बातों पर पूरे देश की राजनीति को एक स्वर में होना चाहिए उन बातों और विषयों को भी सरकार पर हमला करने के लिये चुना गया है। इस तरह की बयानबाजी का उन लोगों को कितना लाभ मिला यह तो वही जान,ें पर इस तरह के बयानों का लाभ उन लोगों को जरूर मिल रहा है जो लोग भारत के विरुद्ध साजिश करते हैं, भारत को कमजोर करना चाहते हैं । ऐसे लोग भारत के भीतर भी हैं और भारत के बाहर भी।

यह सिलसिला आज से लगभग बीस वर्ष पहले गोधरा में निर्दोष कार सेवकों की घेरकर सामूहिक हत्या करने से आरंभ हुआ तो कोरोना संकट तक अनवरत है। वह बटाला हाउस एनकाउन्टर पर कुछ राजनेताओं की टिप्पणी हो, 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद किसी का यह कहना कि अब भारत में रहने लायक वातावरण नही बचा, जेएनयू में एक आतंकवादी के समर्थन में नारे लगाने वालों के समर्थन में राजनेताओं द्वारा दिये गये बयान हों या भारतीय सेना द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक पर सबाल उठाने वाले बयान हों, सबमें लगभग एक ही प्रतिध्वनि रही है।

किसी ने तो सेनाध्यक्ष पर ही अपमानजनक टिप्पणी करने में संकोच न किया। इन विषयों पर जो टिप्पणियां हुईं उससे या तो अपराधियों के हौसले बुलंद हुए या देश विरोधी तत्वों के। हम ताजा कोरोना संकट को ही देखें। यह विश्वव्यापी संकट है इसकी शुरुआत चीन से हुई। पूरी दुनिया चीन को घेरने में लगी है लेकिन कुछ राजनीतिक दलों के लोग चीन पर कोई बात नहीं कर रहे। वे बहाने निकालकर केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमला कर रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसका लाभ वह खास लॉबी उठा रही है जो भारत में प्रगति दर को धीमा करना चाहती है।


पिछले सात आठ वर्षों में भारत ने तीन विषयों में मानों एक अंगड़ाई ली है। एक तो अर्थव्यवस्था की मजबूती, दूसरी सामरिक विषयों मे मजबूती के साथ स्वदेशी उत्पादन और तीसरा अंतरिक्ष जगत में आत्मनिर्भरता। इन विषयों पर दुनिया की विस्तारवादी ताकतों को भारत खटकने लगा। ये ताकतें बराबर भारत के विरुद्ध दुष्प्रचार कर रहीं हैं। वे मुद्दे गढ़ रहीं है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित कर रहीं हैं। जिस तरह की खबरें न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित हुईं, वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित हुईं या टाइम्स मैग्जीन में छपीं।

यह सब उसी योजना का अंग है जो भारत को कमजोर करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चलाई जा रही हंै। आश्चर्य तब होता है जब भारत में और भारत के ही कुछ राजनीतिक दल इस तरह की खबरों को हाथों हाथ लेकर बयानबाजी शुरू कर देते हैं। सरकार को संभलने का या सच्चाई का पता लगाने तक का समय नहीं देते। जब तक सरकार तथ्य का पता करके स्पष्टीकरण जारी करती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। तब वे एक मुद्दे को छोड़कर नया उछाल देते है। जैसा हरिद्वार कुंभ को लेकर कूटरचित तस्वीरें आईं और हल्ला मचाया गया। लेकिन वास्तविकता कुछ और थी। इस वर्ष हरिद्वार के कुंभ में पांडाल खाली पड़े रहे लेकिन तस्वीरों से लगा कि लाखों लोगों की भीड़ है।


कभी खबर छपी कि हरिद्वार कुंभ से लौटे लोगों ने गाँव में महामारी फैला दी, एक और प्रचार किया गया कि बंगाल असम में चुनावों की भीड़ ने कोरोना फैलाय। लेकिन कोई पूछे इन वक्तव्य वीरों से कि क्या महाराष्ट्र में चुनाव हुए थे, दिल्ली में चुनाव हुए थे ? छत्तीसगढ़ में चुनाव हुए थे? इन प्रांतो में तो चुनाव नहीं हुए. पर इन प्रांतों में हालत बंगाल, असम, केरल आदि उन प्रांतों से ज्यादा गंभीर रही जहाँ चुनाव हुए। यदि हम कोरोना की तस्वीर को दुनिया में देखें तो अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, ब्राजील, इटली आदि देशों में स्थिति सर्वाधिक भयावह रही। इन देशों तो कहीं चुनाव नहीं हुए।

इसी तरह, पहले वैक्सीन की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाये गये और बाद में कमी के लिये। जबकि भारत में वैक्सीनेशन की गति दुनिया में दूसरे क्रम पर है। होना यह चाहिए कि इस तरह के संकट पर पूरे देश को एकजुट होना चाहिए। राजनीति राष्ट्र और समाज से ऊपर नहीं होती। भारत पर जब भी विदेशी आक्रमण हुआ या कोई बड़ा आतंकवादी हमला हुआ, पूरा भारत एक रहा। विपक्ष सदैव सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर चला है।

संसद में चाहे अटलजी का बयान हो या सुषमा स्वराज का सबके वक्तव्यों में राष्ट्र सर्वोपरि रहा है। लेकिन आज लगता है कुछ विपक्षी दलों के सामने केवल राजनीति और अपने राजनीतिक हित ही महत्वपूर्ण रह गये हैं । इसलिये प्रतिदिन ऐसी बयानबाजी हो रही है। जो दल ऐसा कर रहे हैं उन्हें यदि विपक्ष में रहते हुए अटलजी या सुषमा स्वराज को अनदेखा करना हो तो करें लेकिन वे अपने ही पूर्वजों का स्मरण कर लें। राजनीति के क्या आदर्श स्थापित किए थे गाँधीजी, किन आदर्शों की चर्चा की थी डॉ. राम मनोहर लोहिया ने। यदि इनकी बातों का ही उनके अनुयायी स्मरण कर लें तो आधी समस्याएं अपने आप दूर हो जाएंगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। )

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