वायनाड के वीर जनयोद्धा पझसी राजा

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  • रंजना चितल, कथाकार व स्तंभकार

केरल में हरे भरे जंगलों से समृद्ध है वायनाड़ जिला। इस क्षेत्र में कुरूचिया जनजाति निवास करती है। यहां के राजा थे पझसी राजा जिन्होंने सबसे पहले विदेशी आक्रांताओं के विरोध में हथियार उठाए और लगभग नौ वर्षों तक संघर्ष किया और स्वाधीनता के लिए बलिदान दिया।
जब 1793 में कोट्टायम राज्य के क्षेत्र में अंग्रेजों ने कर लगाना शुरू किया तो पझसी राजा ने राजस्व देने से मना कर दिया।

लेफ्टिनेंट कर्नल पौट्रिक ने कहा जब तक पझसी राजा जिंदा है तब तक हममें से किसी का जीवन सुरक्षित नहीं है। अब वे हर हाल में राजा को पकड़कर दंडित करना चाहते थे। योजना अनुरूप अंग्रेज सिपाहियों ने अचानक राजमहल पर हमला किया और लूटपाट मचाई। पझसी राजा जानते थे अंग्रेज जरूर घात करेंगे इसलिए वे परिवार सहित वायनाड़ के वनों में पहुंच गये। राजा ने वायनाड़ में जन सेना बनाई। कुरूचिया और कुरूमर जनजातियां युद्ध कला में पारंगत थी। राजा के साथ तलवकर चंदु और नीली जैसे योद्धा थे।

अंग्रेजों ने कई संधि प्रस्ताव भेजे, राजा बनाने का प्रलोभन दिया। स्वत्व और स्वाभिमान के पर्याय राजा ने इस प्रस्ताव को सिरे से नकार दिया और क्रांति मोर्चे पर चल दिये। 18 मार्च 1797 में पझसी राजा के नेतृत्व में वनवासियों ने वायनाड़ पेरिया दर्रे से जाने वाले ग्यारह सौ सिपाहियों पर हमला किया। मेजर केमरान की इस सैनिक टुकड़ी के टुकड़े-टुकड़े कर दिये।

अंग्रेज सेना की इस पराजय से अंग्रेज भयभीत हो गए बम्बई का गर्वनर जोनाथन डंकन स्वयं स्थिति को देखने के लिए मालाबार पहुंचा। लेफ्टिनेंट कर्नल पैट्रिक और सार्टो रिचेस सभी अपने जीवन को असुरक्षित महसूस कर रहे थे। इसी बीच पझसी राजा ने वायनाड़ के घने जंगलों में वनवासियों को प्रशिक्षित कर अपनी सेना का विस्तार किया।

वर्ष 1800 में बड़ा संग्राम हुआ इस युद्ध के सेनापति कण्णवत शंकरयन, नम्बियार, कुगन नायर और तलवकर चंदु थे। अंग्रेजों ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए वहां छोटे-छोटे किले बनाना शुरू किया। राजा के हमले निरंतर जारी थे। 16 सितंबर 1800 में कर्नल वेलजली ने कर्नल सरयोलिस को पत्र लिखकर भेजा कि हमारे सामने इस समय सबसे बड़ी समस्या पझसी राजा का मुकाबला करना है।

अंग्रेजों ने युद्ध स्तर पर कार्यवाही शुरू की। राजा के सहयोगी, कण्णवत शंकरन , नम्बियार, चट्टपन नम्बियार, कन्नमचेती नम्बियार, चंदू रहमान, कल्लूचमा, कुंडहप्पन को पकड़कर सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई। जनवरी 1801 में मेजर मैक्लोड ने पूरे जिले को शस्त्र रहित करने के आदेश दे दिए।

इस बीच मेजर मैक्लोड ने भूमि संबंधी नया कानून लागू किया। वनवासियों से वनों के अधिकार छीन लिये गये। इसमें सम्पूर्ण क्षेत्र में, जन-जन से विरोध के स्वर गूंजने लगे। अंग्रेजों ने इसे दबाने के लिए 1200 पुलिसकर्मियों का नया दस्ता बुलवाया। जबकि पझसी राजा की सैनिक संख्या काफी कम थी। राजा ने आह्वान किया अपनी महान परंपरा और आस्था का संरक्षण करो इसे बचाओ। राजा के साथ समूचा समाज था, यही लोग भोजन तथा युद्ध सामग्री आदि एकत्र करने में राजा का सहयोग कर रहे थे।

वर्ष 1805 में मलाबार के नये कलेक्टर थामस हर्ने बेवर ने दो अधिसूचननाएं जारी की, एक पझसी राजा को किसी भी प्रकार की सहायता का प्रयत्न राजद्रोह घोषित किया गया। दूसरा पझसी राजा की सूचना देने वाले को तीन हजार पैगोडा (उस समय की प्रचलित मुद्रा) का पुरस्कार दिया जायेगा।

इस पर भी राजा का संघर्ष जारी था। कई मुठभेंड़ हुईं। छापामार युद्ध के पारंगत योद्धा हमला कर वन में पलायन करने में सफल हो जाते थे। 30 नवंबर 1805 को पझसी राजा मैसूर सीमा के पास कांकेर नदी तट पर विश्राम कर रहे थे। तभी कम्पनी की सेना ने उन्हें घेर लिया। भीषण युद्ध हुआ। राजा को जब यह एहसास हो गया कि अब पराजय निश्चित है।

उन्होंने अपनी अंगूठी का हीरा खा लिया और अपना बलिदान दे दिया। कूरूचियाओं ने मानटोड़ी में जिस स्थान पर राजा ने अपने प्राण त्यागे थे वहां एक वृक्ष लगाया। यह वृक्ष पझसी राजा के बलिदान का प्रतीक स्वरूप आज भी जीवंत है।

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