देशभक्ति लोककल्याण, न्याय और सत्य की भावना से प्रेरित होती है: कौन देशभक्त और कौन देशद्रोही?

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देशभक्ति लोककल्याण, न्याय और सत्य की भावना से प्रेरित होती है ! देशभक्ति किसी पार्टी या संगठन का घोषणापत्र नहीं है। देशभक्ति कोई गीत या गाना भी नहीं है । देशभक्ति दुर्लभ मूल्यों और गुणों का समुच्चय है ! देशभक्ति तपस्या है । सरलता , सचाई, ईमानदारी, त्याग, निष्ठा जैसे गुण देशभक्ति में समाहित हैं ।समर्पण कोई मामूली बात है? समर्पण में न अहंकार होता है और न ममता! समर्पण तो एक साधना है, सिद्धि है ।

  • राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी

ऐसी पुरानी हवेलियां मैंने देखी थीं ,जिनमें लोहे की ग्रिल में अथवा पत्थर पर पंचमजार्ज की छवि को अंकित किया गया था। वह राजभक्ति थी! दूसरी ओर अंग्रेजी-जमाने में राजभक्ति के विरुद्ध ,जो विद्रोह-भाव से तन कर खड़ी थी, वही थी देशभक्ति! देशभक्ति राजभक्ति अथवा राजसत्ताभक्ति का नाम नहीं है! देशभक्ति सत्ताकेन्द्रों का जय-जयकार नहीं करती !

देशभक्ति लोककल्याण, न्याय और सत्य की भावना से प्रेरित होती है ! देशभक्ति किसी पार्टी या संगठन का घोषणापत्र नहीं है। देशभक्ति कोई गीत या गाना भी नहीं है। देशभक्ति दुर्लभ मूल्यों और गुणों का समुच्चय है ! देशभक्ति तपस्या है। सरलता, सचाई, ईमानदारी, त्याग, निष्ठा जैसे गुण देशभक्ति में समाहित हैं । समर्पण कोई मामूली बात है? समर्पण में न अहंकार होता है और न ममता! समर्पण तो एक साधना है, सिद्धि है। ऐसा समर्पण आज राजनीति में है कहाँ ? जो सत्ता का है, वह देश का कहाँ? हाँ, देशभक्ति शब्द के आवरण में राजनीति का खेल पाखंड है। लोगों की आँखों में धूल झोंकने के लिए।

भक्ति का भात बन गया! क्या सचमुच देशभक्ति का भाव इतना ही सस्ता है ? सब कुछ कहने से ही हो जाता है ? सत्तासंघर्ष के लिये जो दांवपेच होते हैं, वे बड़े घृणित होते हैं, जबकि देशभक्ति समर्पण है , और समर्पण कुछ पाने के लिये नहीं होता ! यदि सत्ता-संघर्ष के लिये देशभक्ति शब्द का इस्तेमाल किया गया तो देशभक्ति शब्द का मूल अर्थ ही बदल जायेगा। देशभक्ति भाव है और वह किसी भी राजनैतिकदल का पेटेंट नहीं हो सकता। ‘राजा परजा जस रुचै सीस देय ले जाय !’ समर्पण करना होगा। निष्कामभाव से !

भक्ति का ही एक प्रकार है- देशभक्ति ! यद्यपि भक्ति शब्द को लेकर ऋषियों, आचार्यों, विचारकों, कवियों ने सहस्रावधि- ग्रन्थ लिखे हैं, किन्तु नारद का भक्तिसूत्र ऐसा ग्रन्थ है, जिसका उल्लेख प्राय: सभी ने किया है। नारद ने भक्ति का लक्षण बतलाते हुए सूत्र दिया -‘सा तु परमप्रेमरूपा अमृतस्वरूपा च ।’ प्रेम समर्पण है । भक्ति प्रेम से और आगे वाला सोपान है-परम । प्रेम में न अहं होता है और न मम ! जिधर देखता हूं उधर तू ही तू है !

देशभक्ति और देशद्रोही; ये दोनों ही शब्द अब राजनैतिक दलों के शिकार हुए हैं । ये दोनों ही शब्द अब राजनैतिक बन चुके हैं । ये दोनों ही शब्द अब अपना मूल अर्थ खोते जा रहे हैं ! आज लोग देशभक्त शब्द का प्रयोग हास्य-व्यंग्य के संदर्भों में कर रहे हैं !

क्यों ? भ्रष्टाचार तथा देशभक्ति साथ-साथ नहीं चल सकते! देशभक्त हूँ कि नहीं? भारत की जनता को लूटे, खसोटे,नोंचे, पीडि़त करे, दु:ख दे! बैंकों से लोन लेकर चुकावे नहीं, भ्रष्टाचार करे। भारत की नदियों में रासायनिक- विष प्रवाहित करे , पर्वतों को काटकर बेचे, जमीन पर कब्जा करे और खानों को निजी स्वार्थ के लिये खाली करे और फिर हाथ में तिरंगा लेकर नारा लगावे-वन्दे मातरम..भारतमाता की जय..।पूछे कि बताओ मैं देशभक्त हूं कि नहीं ? देशभक्त हूँ कि नहीं? निर्बल लोगों को ठगना, वंचित करना देशभक्ति है या देशद्रोह है ? धर्म है या अधर्म है ?
जो इन निर्बल लोगों के भोजन में जहर घोलते हैं , खाद्य पदार्थों में मिलावट करते हैं। जो इनके श्रम का शोषण करते हैं, वे डॉक्टर, जो इनको उपचार से वंचित करते हैं, शिक्षा से वंचित करते हैं, इनकी भूमि हड़पते हैं, जो तस्कर हैं, माफिये हैं, बलात्कारी हैं, भले ही वे इन्हीं के धर्म का आडंबर धारण करते हैं, क्या वे धार्मिक हैं देशभक्त हैं ? या समाजद्रोही हैं,देशद्रोही हैं ?

वे उद्योग, जो कारखाने के रासायनिक-जल को बिना ट्रीटमेंट के यमुना-गंगा में या बोरिंग करके भूगर्भ में छोड देते हैं , वे चाहे किसी भी दल को थैली देते हों , वे देशभक्त हैं या देशद्रोही हैं ? उनके विरुद्ध किसी ने कोई आवाज उठायी ? क्या बैकों में घोटाला करने वालों को मृत्युदंड दिया जाना चाहिये ? क्या बैकों में घोटाला करने वालों की समस्त संपत्ति जब्त की जानी चाहिये ?

इतने बड़े घोटाले देशद्रोह की श्रेणी में क्यों नहीं है? आदमी देशद्रोह क्यों करता है? अपने निजी स्वार्थ साधन के लिए। देशभक्ति और सामाजिकता समष्टि का भाव है। आदमी स्वार्थ के लिए देश और समाज को धोखा देता है। बात स्वार्थ साधना की है। स्वार्थ साधना के लिए आदमी कितने नीचे गिर सकता है, इसे उसके स्वार्थ में समझा जा सकता है। यह स्वार्थ सत्ता, प्रभुता, पद और सम्पदा को प्राप्त करने के रूप में होता है। समष्टि के भाव (देशभक्ति ) और व्यष्टिस्वार्थ के अंतर को पहचानिये, सत्ता की भूख को पहचान लेने की जरूरत है? ध्यान से देखिये, सोचिये कि देशद्रोह ने कहीं देशभक्ति के कपड़े तो नहीं पहन लिए हैं? समर्पण का भाव कहीं दिखा? और पूछता है कि बताओ मैं देशभक्त हूं कि नहीं ?

देशभक्ति क्या है ? इसकी परिभाषा समझने के लिये हमारे सामने स्वतन्त्रता-संग्राम-सेनानी हैं और उस स्वतन्त्रता-संग्राम के नायक हैं । स्वतन्त्रता-आन्दोलन के नायकों का आदर्श हमारे सामने है । लोकमान्यतिलक, गोखले, महात्मा गान्धी, भगतसिंह आजाद , जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस , सरदार पटेल आदि को भिन्न-भिन्न पक्षों में खड़ा करना और उनकी विरासत पर कब्जा करना हास्यास्पद है । उनके रास्ते भिन्न-भिन्न भले ही हों, पर लक्ष्य एक है। वे सभी देशभक्त हैं। समर्पित हैं और वे सभी स्वतन्त्रता के नायक हैं। प्रणम्य हैं । कुत्सित तर्क-वितर्क करके उसे झुठलाया नहीं जा सकता ।

आपकी देशभक्ति इससे प्रमाणित नहीं हो सकती कि आपने किस महापुरुष की विरासत पर व्यर्थ के तर्क देकर कब्जा जमा लिया है। आपने स्वयं क्या किया है ? आपका आचरण क्या है? आपका त्याग और तप ही आपकी देशभक्ति का प्रमाण होगा – ‘नहि कस्तूरिकामोद : शपथेन विभाव्यते ।’ कस्तूरी की सुगन्धि है तो उसके लिये सौगन्ध लेने की जरूरत ही क्या ? प्रमाण लोक है ! देशद्रोह को पुन: परिभाषित करने का अवसर आ गया है ।

जो लोग लोकतन्त्र को इतना ही समझते हैं कि जाति की परिधियां बनाओ ,मजहब की परिधियां बनाओ, प्रान्तीयता का भाव जगाओ, ऐसे मुद्दे उठाओ कि एक जनसमूह दूसरे जनसमूह से विच्छिन्न हो जाय और एक जनसमूह दूसरे जनसमूह के खून का प्यासा बन जाए, तब एक जनसमूह का झंडा उठाकर वोट कमाओ और सत्ता पर कब्जा कर लो । क्या यह अपने देश और लोकतन्त्र के साथ छल नहीं है?क्या इसे देशद्रोह की परिभाषा में शामिल करना उचित नहीं होगा ?

(लेखक साहित्यकार व संस्कृतिविद हैं।)

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