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हमारी धरोहर: प्रथम पूज्य पितामह ब्रह्मा

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  • श्रीकृष्ण जुगनू

संलग्न चित्र में पितामह त्रिमुख दिखाई दे रहे हैं। यह मूर्ति 10 वीं सदी की है और बटेश्वर या विदिशा के समीपवर्ती हिस्से से मिली है। यह मूर्ति निश्चित ही किसी देव प्रासाद में पूजित रही है। मुख और उसकी रचना में श्मश्रु से शिरोभूषण तक के विधान पूरी तरह शास्त्रीय है। मुख पर थकावट नहीं, युवकोचित लावण्य क्या बताता है? यह कि ब्रह्मा का यह रूप पूजनीय था। भुजाओं में बुढ़ापा नहीं है, अंगद जैसे आभूषण सच में शोभाजनक है। ग्रीवा आभरण इतने सुन्दर है कि अनेक शब्द कम पड़ते हैं।

इसमें एकावली और वलयवली में धागा और मनियों का अनूठा प्रयोग आठवीं सदी के आभूषणों से प्रेरित लगता है। इस बात के प्रमाण खोजे जा सकते हैं कि दसवीं सदी के बाद शैवों और वैष्णव मान्यताओं के प्रभाव के कारण मध्य भारत से भी पितामह असहाय से हुए और पुराण कथाओं में वे केवल आर्त प्रजा, देवताओं के साथ कभी शिव तो कभी विष्णु की स्तुति गायक होकर रह गए न कि अन्य देवों की तरह वर दायक। इसके विपरीत, पुराने ग्रंथों में सबसे पहले प्रणाम ही प्रजापति को किया गया है : प्रजापति नत्वा/प्रणम्य आदौ पितामह… सुश्रुत, चरक से लेकर नाट्यशास्त्र तक ने प्रथम रूप में पितामह को प्रणाम किया है।

महाकाव्यों और पुराणकारों ने भी यही किया। प्रत्येक ज्ञान को पितामह प्रोक्त कहा। स्मृतियों ने भी अनुसरण किया! यह वह दौर था जब ‘विनायक जैसे दोष की शांति के लिए पारिवारिक स्तर पर जोरदार उपाय किए जाते थे… और फिर ब्रह्माजी को अन्य देवताओं की स्तुति करने वाला और मिथ्याभाषी तक… इतना लिखा गया कि फिर कभी वह सम्मान नहीं लौट सका। भारत में धार्मिक मान्यताओं के उतार-चढ़ाव के अपने इतिहास हैं लेकिन उनका प्रारूप कहां हैं?

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