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वायु से ही हमारी आयु : प्रकृति का लाइव सन्देश

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औषधि मानव तैयार कर सकता है मगर अनमोल प्राणवायु तो पेड़ ही मुफ्त में देते है। हमारी दोहन करने की क्षमता से भी अधिक प्रकृति की क्षमता है किंतु पेड़ काटने वाली विध्वंसकारी विकृति ने हमारे जीवन तंत्र को कमजोर कर दिया परिणामस्वरूप संक्रमण का प्रतिशत बढ़ गया और जीवन का खतरा भी।


गगन चौकसे

प्रकृति का प्राकृतिक संदेश जनमानस के लिए सीधे आ रहा है। कलयुग में आकाशवाणी नही होती है होता है बस ‘रेड अलर्टÓ । हमारी सोच और समझ का दुष्परिणाम अब दुष्प्रभाव अब स्पष्ट रूप से सामने आ गया है। दिल्ली में जब ऑक्सीजन कम हुई थी तब भी हमने पेड़ों का संवर्धन नही किया। हम अनमोल चीजो को क्यो बर्बाद होने देते है ये सवाल बड़ा कड़वा है उतना विचित्र भी है। आम भाषा में कहे तो जो हमे प्राणवायु देता है उसी पेड़ के हम प्राण लेते है। गंगा पवित्र है तारिणी है तो फिर गन्दा क्यो किया जाय? नर्मदा वंदनीय है तो कचरा क्यो डाला जाय और पेड़ की हवा से हमारी जिंदगी कटती है उन्हें क्यो काटा जाय। ये सवाल ही हमारी सोच का रेपिड टेस्ट है जिसके जवाब हमे देने चाहिए। समाज से पूछने चाहिए क्योंकि ये प्रासंगिक ही नही व्यवहारिक भी है।

ऑक्सीजन को तरसता जन जन

पूरे मध्यप्रदेश और खासकर दिल्ली सहित अनेक राज्यो में अस्पताल ऑक्सीजन के लिए न कह रहे है। हमे आज सिलेंडर की जरूरत है मगर घर जाकर तो पेड़ों की प्राकृतिक वायु भी चाहिए। कोविडकाल में अध्यन से ये भी दृष्टिगोचर हुआ कि संक्रमण सीधे फेफड़ों में होता है जो सांस लेने यानी ऑक्सीजन से संचालित होते है। इस शरीर की सबसे पहली और अंतिम आवश्यकता ऑक्सीजन ही है जो प्राणवायु है मगर हमने कभी कल्पना नही की, मंथन नही किया, मनन नही किया कि पेड़ न होंगे तो ये सब कैसे मिलेगा। घरों में सोफा कैसा होगा, बेडरूम कैसा होगा, सोपान कैसा होगा, साजोसामान क्या होगा ये हमारी प्राथमिकता रही मगर प्राणवायु देने वाला पेड़ कहाँ लगेगा ये विचार भी नही आया। परिणाम ये है कि समस्त श्वसन तंत्र को चलाने वाली ऑक्सीजन हमे नसीब नही हो रही और हम दिन प्रतिदिन रोग प्रतिरोधक क्षमता का हनन स्वयं कर रहे है। अस्पताल से ऑक्सीजन और उम्मीद दोनों खत्म हो रही है। औषधि मानव तैयार कर सकता है मगर अनमोल प्राणवायु तो पेड़ ही मुफ्त में देते है। हमारी दोहन करने की क्षमता से भी अधिक प्रकृति की क्षमता है किंतु पेड़ काटने वाली विध्वंसकारी विकृति ने हमारे जीवन तंत्र को कमजोर कर दिया परिणामस्वरूप संक्रमण का प्रतिशत बढ़ गया और जीवन का खतरा भी।

हनन नही सर्जन आवश्यक

इस कोविडकाल की सबसे बड़ी सीख लेकर हम आगे बढ़ सकते है। पिछले वर्ष आवाजाही कम होने के कारण तापमान कम और वातावरण साफ था वजह थी कोरोनॉ कफ्र्यूू। प्रकृति ने हमे मानो ‘नोटिफिकेशनÓ भेजा था कि हम प्रकृति को बर्बाद कर सकते है और हम ही आबाद। हजारों नदिया स्वत: स्वक्ष हो चली थी। आसमान साफ दिखने लगा था और हमारे बिना किये ही प्रकृति का जीर्णोद्धार हो गया था। कुल मिलाकर कहे कि हमे सदा चैन की सांसें देने वाली प्रकृति सदियों बाद चैन की सांस ले रही थी मगर हमने शायद उसे गम्भीरता से फिर भी नही लिया। जरूरी है कि घर घर में हरियाली हो, नीम, बरगद हो या कहे कि जीवन प्रबंधन हेतु हरियाली की स्थान, देखरेख आरक्षित हो। संस्कारो में सृजन हो, दोहन हो लेकिन भक्षण नही। हमारी संस्कृति पेड़ पहाड़ और वनस्पति को पूजने की है। प्राणवायु मुफ्त में देने वाले पेड़ यदि नही होंगे तो क्या जीवन की कल्पना तक नही हो पाएगी। सवाल स्वयं से करना चाहिए। कोरोना की वेक्सीन कोरोना से बचा सकती है मगर प्राणवायु ऑक्सीजन से ही प्राण बचेंगे। इस आपदाकाल में ऑक्सीजन का वजूद तय हो गया अब हमें भी कुछ तय करना होगा क्योंकि हम ऑक्सीजन घर में नही बना सकते किन्तु ऑक्सीजन देने वाले पेड़ को घर में लगा सकते है।

कोरोनोकाल इसका प्रमाण है (लेखक : मोटिवेशनल स्पीकर और स्तंभकार)

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