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युवा ही मिटा सकते हैं कुप्रथा का कलंक

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  • दहेज के खिलाफ राज्यपाल का धरना

केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने बुधवार को दहेज के विरुद्ध गांधीवादियों के धरने में शामिल होने के बाद कहा है कि विश्वविद्यालयों में डिग्री लेने के पहले छात्रों से इस बात की लिखित सहमति लेनी चाहिए कि वे विवाह के समय दहेज नहीं लेंगे।

  • मोहम्मद साकिब मज़ीद


केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने बुधवार को दहेज के विरुद्ध गांधीवादियों के धरने में शामिल होने के बाद कहा है कि विश्वविद्यालयों में डिग्री लेने के पहले छात्रों से इस बात की लिखित सहमति लेनी चाहिए कि वे विवाह के समय दहेज नहीं लेंगे। यह महत्वपूर्ण सुझाव दहेज की समस्या के गंभीर रूप लेने के मद्देनजर आया है। दहेज प्रथा भारत के हर एक कोने की अनकही दास्तान है। यह एक ऐसी कुप्रथा है जो मजहबों के बंधनों को तोड़ती-मरोड़ती हुई अपना विस्तार करती रही है।

दहेज के कारण महिलओं को हाशिए पर धकेल दिया जाता है, उनके साथ घरेलू हिंसा होती है और कई बार तो यह समस्या मौत का भी कारण बनती है। देश में औसतन हर एक घंटे में एक महिला दहेज संबंधी कारणों से मौत का शिकार होती है। पिछले दिनों विश्व बैंक द्वारा जारी की गई रिपोर्ट चौंकाने वाली है।

रिपोर्ट में ये दावा किया गया कि पिछले कुछ दशकों में, भारत के गाँवों में दहेज प्रथा काफ़ी हद तक स्थिर रही है, लेकिन यह प्रथा बदस्तूर जारी है। जारी किए गए आँकड़ों के मुताबिक 1960 से लेकर 2008 तक ग्रामीण भारत में हुई चालीस हजार शादियों का अध्ययन किया गया। यह शोध भारत के 17 राज्यों पर आधारित है, जहां हिन्दुस्तान की 96 फीसदी आबादी निवास करती है।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत के सभी प्रमुख धर्मों में दहेज प्रथा प्रचलित है। गौर करने वाली बात यह है कि ईसाइयों और सिखों में दहेज में जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई है, इन समुदायों में हिन्दुओं मुसलमानों की तुलना में औसत दहेज में वृद्धि हुई है। इसी तरह 1997 की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रत्येक वर्ष पाँच हजार महिलाएँ दहेज हत्या का शिकार होती हैं, कई मामलों में महिलाओं को जिंदा जलाने की घटना भी सामने आ चुकी है।

हिन्दुस्तान में दहेज को अनैतिक ही नहीं, अवैध भी घोषित किया गया है। दहेज से संबंधित ऐसी घटनाएं आज के दौर में देखने को मिलती जब भारतीय समाज कई मजहबी और सरकारी क़ानूनों का हिस्सा है। इस्लाम धर्म में ‘दहेज देना-लेना हराम’ बताया गया है, लेकिन धर्म को मानने वाले अधिकांश लोग दहेज का शिकार हैं। भारत के संविधान में कई ऐसे कानून उल्लिखित हैं जिसमें दहेज को अपराध माना गया है।

1961 में सबसे पहले ‘दहेज निरोधक कानून’ अस्तित्व में आया, जिसमें दहेज देना और लेना दोनों ही ग़ैरक़ानूनी घोषित किए गए। ‘दहेज निषेध अधिनियम-1961’ के अनुसार दहेज लेने-देने या इसके लेन-देन में सहयोग करने पर 5 वर्ष की कैद और 15,000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है। दहेज के लिए उत्पीडऩ करने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए जो कि पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा सम्पत्ति अथवा कीमती वस्तुओं के लिए अवैधानिक मांग के मामले से संबंधित है, के अन्तर्गत 3 साल की कैद और जुर्माना हो सकता है।

1985 में दहेज निषेध नियमों को तैयार किया गया जिसके अनुसार शादी के समय दिए गए उपहारों की एक हस्ताक्षरित सूची बनाकर रखा जाना चाहिए। हम इन तमाम स्थितियों पर नजऱ डालें तो यह देखने को मिलता है कि हमारा समाज ही इस पूरी प्रक्रिया में लिप्त नजऱ आता है। दहेज जैसी कुप्रथा के खिलाफ न तो कोई आंदोलन जैसा भारी विरोध देखने को मिलता है, न ही किसी राजनीतिक दल के मेनिफेस्टो में इसकी मुख़ालफत करने की बात कही जाती है। दहेज जैसी कुप्रथा को अगर जड़ से ख़त्म करना है तो युवाओं को आगे आना होगा।

भारत में शादी की औसत उम्र 20 से 30 वर्ष है, और यह युवावस्था होती है। अगर शादी करने वाले जोड़े ये ठान लें कि शादी बिना दहेज के करनी है तो कोई भी रोक नहीं सकता। साथ ही भारतीय समाज को चाहिए कि इस प्रथा को कलंक घोषित करे। कानून बनाने और लागू करवाने वालों को भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए दहेज वाली शादियों में शामिल होना बंद करना होगा। सभी संतानों को समान रूप से शिक्षित करें और न तो दहेज की मांग करें, न ही दहेज की मांग करने वालों से रिश्ते की डोर बाँधें।

(लेखक पत्रकारिता के छात्र हैं।)

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