राजभवन से विरोध के बिगुल पर नया विवाद

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  • राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के बीच टकराव की स्थितियां सत्तर के दशक से आती रही हैं

दशकों से सक्रिय राजनीति में रहे सत्यपाल मलिक ने जम्मू कश्मीर, गोवा के बाद अब मेघालय के राज्यपाल पद पर रहते हुए यह जो आरोप लगाए हैं, वह दूसरों के लिए राजनीतिक हथियार बन रहे है। इन आरोपों से राज्यपाल की भूमिका पर भी एक बार फिर बहस शुरू हो गई है।

  • आलोक मेहता, लेखक आई टी वी नेटवर्क (इंडिया न्यूज और आज समाज के संपादकीय निदेशक हैं
    aloakmata7@gmail.com

मेघालय में हुई बादलों की राजनीतिक गडग़ड़ाहट की गूंज ने दिल्ली सहित पूरे देश को चौंका दिया है। यह पहला अवसर है, जबकि संवैधानिक पद पर बैठे महामहिम राज्यपाल ने सत्तारूढ़ दल के एक मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाने के साथ अपनी ही केंद्र सरकार की नीतियों और कदमों का कड़ा विरोध कर दिया है । दशकों से सक्रिय राजनीति में रहे सत्यपाल मलिक ने जम्मू कश्मीर, गोवा के बाद अब मेघालय के राज्यपाल पद पर रहते हुए यह आरोप लगाया कि गोवा की भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार की शिकायत केंद्र सरकार से करने के कारण उनका तबादला मेघालय कर दिया गया।

यही नहीं श्री मलिक ने केंद्र सरकार के नए कृषि कानूनों को भी पूरी तरह अनुचित बताते हुए उनके विरुद्ध चल रहे आंदोलन का समर्थन कर दिया है । इतने गंभीर आरोप और रुख के बाद यह मुद्दा उठना स्वाभाविक है कि लोकतान्त्रिक अभिव्यक्ति के अधिकार के बावजूद अपनी ही सरकार के विरुद्ध आवाज उठाने वाले नेता को नैतिक आधार पर इस पद पर रहना या रखा जाना कितना उचित है ?

केंद्र में सरकारें बदलने के बाद पूर्व में नियुक्त राज्यपालों से मतभेद और उन्हें हटाए जाने अथवा राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के बीच टकराव की स्थितियां सत्तर के दशक से आती रही हैं । संवैधानिक दृष्टि से राज्यपाल केंद्र और राज्य सरकार के बीच संवाद तालमेल और प्रदेश में राजनैतिक अस्थिरता के संकट आने पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । उन्हें राज्य और सरकार का संरक्षक माना जाता है । यही नहीं नियमों के अनुसार यह कहा जाता है कि मंत्री मंडल के सदस्य केंद्र में राष्ट्रपति और राज्य में राज्यपाल की अनुकम्पा पर नियुक्त होते हैं और वे गंभीर आधार होने पर मंत्री को बर्खास्त कर सकते हैं।

प्रदेश सरकार के कामकाज पर नजर रखते हुए वे केंद्र को नियमित रूप से अपनी रिपोर्ट और सलाह भेजते हैं । श्री सत्यपाल मलिक ने जम्मू कश्मीर के राज्यपाल के रूप में पूर्व मुख्यमंत्रियों महबूबा मुफ्ती , ओमार और फारूक अब्दुल्ला के सत्ताकाल में हुई गड़बडिय़ों और भ्रष्टाचार की फाइलें निकालकर कार्रवाई शुरू की। वहीँ उन्हें भी करोड़ों रुपयों की रिश्वत देकर एक उद्योगपति और आर आर एस से जुड़े एक व्यक्ति के आर्थिक हितों से जुड़ी फाइलों की जानकारी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को दी और मोदी द्वारा भी इस काम को नहीं करने की सलाह मिलने पर उन फाइलों को अस्वीकृत कर दिया।

लेकिन गोवा की सरकार के कुछ निर्णयों में भ्रष्टाचार की आशंका की जानकारी भी केंद्र को दी । इसके बाद भी भाजपा और केंद्र द्वारा मुख्यमंत्री पर कार्रवाई नहीं हुई और प्रदेश में सीधे टकराव को रोकने के लिए सरकार ने श्री मलिक का तबादला मेघालय कर दिया। दुखी मन से राज्यपाल अब सार्वजनिक रूप से अपने विरोध को व्यक्त कर रहे हैं। यह केंद्र सरकार और आगामी चुनाव के लिए अभियान में जुटी भाजपा के लिए बेहद दुविधा और संकट जैसा मुद्दा बन गया है । कांग्रेस और अन्य प्रतिपक्षी दलों और किसान संगठनों के लिए एक बड़ा राजनीतिक हथियार बन गया है ।

इस विवाद के साथ एक बार फिर राज्यपाल की भूमिकाओं को लेकर गंभीर विचार की आवश्यकता सामने आ रही है । केंद्र और राज्य सरकारों के संबंधों को लेकर गठित सरकारिया आयोग और बाद में संविधान समीक्षा आयोग ने राज्यपाल पद पर दलगत राजनीति से अलग व्यक्ति को रखने की सिफारिशें की थी। लेकिन केंद्र में आई विभिन्न दलों की सरकारों और संसद ने इस सिफारिश को कभी नहीं माना। यों सामान्यत: कहा यही जाता है कि राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति और राज्यपाल पद पर आसीन होते ही व्यक्ति दलीय भावना और हितों से अलग, निष्पक्ष हो जाता है । लेकिन अनुभव यही बताता है कि यह सिद्धांत व्यवहार में लागू नहीं हो पाता।

सत्यपाल मलिक पहले नहीं हैं, हाल के वर्षों में ही रहे कर्नाटक के पूर्व राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने सार्वजनिक रूप से कह दिया था कि वह जीवन भर कांग्रेसी रहे हैं और जनहित तथा भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मूकदर्शक नहीं रह सकते हैं। उनके कार्यकाल में प्रदेश में भाजपा की सरकार थी। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनकड़ तो निरंतर ममता बनर्जी की सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोले हुए हैं। इसमें कोई शक नहीं कि किसी कुर्सी पर बैठते ही क्या किसी व्यक्ति के विचार, दिल -दिमाग रातोंरात चमत्कारिक ढंग से बदल सकते हैं ? दूसरी तरफ यदि सरकारी सेवा में रह चुके वरिष्ठ अधिकारी अथवा सेनाधिकारी को राज्यपाल का पद दिए जाने पर सत्तारूढ़ केंद्र सरकार के पक्ष में उसका पूर्वाग्रह नहीं रहेगा । हर सरकार अपनी पसंद के व्यक्ति को नियुक्त करना चाहती है । विश्वनाथ प्रताप सिंह तो अपनी कांग्रेस पार्टी से विद्रोह के बाद प्रधान मंत्री बने थे , लेकिन वह भी 18 प्रदेशों के राज्यपाल बदलना चाहते थे । तो क्या केवल पूर्व न्यायाधीश अथवा पूर्ण गैर राजनीतिक व्यक्ति को ही राज्यपाल बनाया जाए ? लेकिन तब तो मतभेदों और टकराव के और भी अधिक अवसर और संकट आ सकते हैं ।

इस सन्दर्भ में आजादी के बाद राज्यपाल बने वरिष्ठ नेता स्वतंत्रता सेनानी श्री प्रकाश के निर्णय और विचार का उल्लेख उचित होगा । श्री प्रकाशजी ने अपने अधिकार का उपयोग करते हुए बहुमत न होने के बावजूद तत्कालीन मद्रास राज्य (अब तमिलनाडु ) में कांग्रेस की सरकार बनवा दी और सी राजगोपालाचारी को मनोनीत कर मुख्यमंत्री बना दिया । राजगोपालाचारी विधान सभा का चुनाव भी नहीं लड़े थे ।वह 1952 से 1954 तक मुख्यमंत्री रहे और फिर स्वयं इस्तीफ़ा दे दिया । श्री प्रकाश बाद में 1956 से 1962 तक बम्बई राज्य ( अब महाराष्ट्र और गुजरात ) के राज्यपाल भी रहे ।

लेकिन कुछ विवादों के कारण इतने दुखी थे कि उन्होंने कहा था ‘किसी सम्मानजनक व्यक्ति के लिए राज्यपाल का पद स्वीकारना कठिन होगा। इसलिए राज्यपाल के लिए संवैधानिक रूप से असीमित अधिकार के प्रावधान का सही और गलत उपयोग होने के खतरे बराबर बने रहते हैं । कई बार यह आशंकाएं भी उठती हैं कि राष्ट्रपति शासन लगाकर केंद्र में सत्तारूढ़ दल को लाभ पहुँचाने अथवा खुद कुछ महीने राज करने की इच्छा के कारण राज्य सरकारों को अस्थिर करने और उनसे टकराव लेने की कोशिश भी होती है । इस पृष्ठभूमि में संसद और सुप्रीम कोर्ट को कुछ मुद्दों पर पुराने नियम कानून अधिकार और जिम्मेदारियों पर देर सबेर विचार करना होगा ।

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